Shayari: 'अगर और जीते रहते यही इंतेज़ार होता', शायरों के कलाम के चंद रंग

Shayari: इंतेज़ार का लुत्‍फ़...Image Credit: Pexels/fotografierende
Shayari: इंतेज़ार का लुत्‍फ़...Image Credit: Pexels/fotografierende

Shayari: शेरो-सुख़न (Urdu Shayari) की दुनिया में हर रंग मौजूद है. इसमें मिलन का जिक्र है, तो जुदाई की बात भी है और इंतेज़ार का चर्चा भी. आप भी महसूस कीजिए इस ख़ूबसूरत कलाम की गहराई को और इसका लुत्‍फ़ उठाइए...

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 17, 2020, 9:47 AM IST
  • Share this:
Shayari: उर्दू शायरी (Urdu Shayari) इश्‍क़ से लबरेज़ कलाम है. इसमें मुहब्‍बत की टीस महसूस होती है, तो ख़ुशी के तराने भी मिलते हैं, तो इंतेज़ार में डूबे दिल की सदा भी इसमें सुनाई देती है. देखा जाए तो शायरों ने हर विषय पर क़लम उठाई है और हर जज्‍़बात को गहराई के साथ पेश किया है. फिर चाहें मुहब्‍बत (Love) की बात हो, वफ़ा का जिक्र हो या फिर इससे जुदा कोई जज्‍़बात (Emotion) ही क्‍यों न हो. शायरी में बहुत ही ख़ूबसूरती के साथ इश्‍क़ और आशिक़ी की बात की गई है. आज हम शायरों के ऐसे ही बेशक़ीमती कलाम से चंद अशआर आपके लिए 'रेख्‍़ता' के साभार से लेकर हाजिर हुए हैं. शायरों के ऐसे कलाम जिसमें इश्‍क़ की मिठास है, तो इंतेज़ार का लुत्‍फ़ भी. आज की इस कड़ी में पेश है 'इंतेज़ार' पर शायरों का नज़रिया और उनके कलाम के चंद रंग. आप भी इसका लुत्‍फ़ उठाइए.

इक रात वो गया था जहां बात रोक के
अब तक रुका हुआ हूं वहीं रात रोक के
फ़रहत एहसास
ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतेज़ार होता


मिर्ज़ा ग़ालिब

न कोई वादा न कोई यक़ीं न कोई उमीद
मगर हमें तो तेरा इंतेज़ार करना था
फ़िराक़ गोरखपुरी

कौन आएगा यहां कोई न आया होगा
मेरा दरवाज़ा हवाओं ने हिलाया होगा
कैफ़ भोपाली

ये भी पढ़ें - Shayari: दिल से निकली आवाज़ है शायरी, आज पढ़ें मुहब्‍बत भरा कलाम

कहीं वो आ के मिटा दें न इंतेज़ार का लुत्फ़
कहीं क़ुबूल न हो जाए इल्तिजा मेरी
हसरत जयपुरी

अब इन हुदूद में लाया है इंतिज़ार मुझे
वो आ भी जाएं तो आए न ऐतबार मुझे
ख़ुमार बाराबंकवी

आधी से ज्‍़यादा शब-ए-ग़म काट चुका हूं
अब भी अगर आ जाओ तो ये रात बड़ी है
साक़िब लखनवी

अब कौन मुंतज़िर है हमारे लिए वहां
शाम आ गई है लौट के घर जाएं हम तो क्या
मुनीर नियाज़ी

कमाल-ए-इश्क़ तो देखो वो आ गए लेकिन
वही है शौक़ वही इंतेज़ार बाक़ी है
जलील मानिकपुरी

ये भी पढ़ें - Shayari: 'तस्वीर-ए-यार को है मेरी गुफ़्तुगू पसंद', पढ़ें इश्‍क़ से लबरेज़ कलाम

फिर बैठे बैठे वादा-ए-वस्ल उस ने कर लिया
फिर उठ खड़ा हुआ वही रोग इंतिज़ार का
अमीर मीनाई

अंदाज़ हू-ब-हू तेरी आवाज़-ए-पा का था
देखा निकल के घर से तो झोंका हवा का था
अहमद नदीम क़ासमी
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज