Shayari: 'कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा', पढ़ें सफ़र पर शायरी

Shayari: 'इस सफ़र में नींद ऐसी खो गई...' Image-Credit/Pixabay
Shayari: 'इस सफ़र में नींद ऐसी खो गई...' Image-Credit/Pixabay

Shayari: शेरो-सुख़न (Urdu Shayari) की दुनिया मुहब्‍बत की दुनिया है. इसमें जिंदगी के सभी रंग मौजूद हैं. फिर चाहें वह इश्‍क़ (Love) का रंग हो या किसी और जज्‍़बात (Emotion) पर क़लम उठाई गई हो...

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 29, 2020, 6:53 AM IST
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Shayari: उर्दू शायरी (Urdu Shayari) में हर विषय को अल्‍फ़ाज़ में पिरोया गया है. जिस तरह इश्‍क़, तन्‍हाई के जज्‍़बातों (Emotions) को इसमें अहमियत मिली है, इसी तरह शायरों ने सफ़र की मुश्किलों और इससे हासिल ख़ुशियों का अपने ढंग से इज़हार किया है. फिर सफ़र जिंदगी का हो या मुहब्‍बत की राहों पर दो दिलों का, इसे बहुत ही दिलकश अंदाज़ में पेश किया गया है. यही वजह है कि कहीं इसमें मुहब्‍बत (Love) का रंग घुला नज़र आता है, तो कहीं शब्‍दों में इसकी थकन झलकती है. इसमें दर्द, ख़ुशी, मायूसी, इकरार और इंकार दिल की हर कैफि़यत को ख़ूबसूरती के साथ पेश किया गया है. आज हम शायरों के ऐसे ही बेशक़ीमती कलाम से चंद अशआर आपके लिए 'रेख्‍़ता' के साभार से लेकर हाजिर हुए हैं. शायरों के ऐसे कलाम जिसमें बात भले ही सफ़र की हो, मगर चर्चा जिंदगी का भी हो. आज की इस कड़ी में पेश है 'सफ़र' पर शायरों का नज़रिया और उनके कलाम के चंद रंग. आप भी इसका लुत्‍फ़ उठाइए.

मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर
लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया
मजरूह सुल्तानपुरी
किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल
कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा


अहमद फ़राज़

अपनी मर्ज़ी से कहां अपने सफ़र के हम हैं
रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं
निदा फ़ाज़ली

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इस सफ़र में नींद ऐसी खो गई
हम न सोए रात थक कर सो गई
राही मासूम रज़ा

सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो
निदा फ़ाज़ली

आवाज़ दे के देख लो शायद वो मिल ही जाए
वर्ना ये उम्र भर का सफ़र राएगांं तो है
मुनीर नियाज़ी

मैं लौटने के इरादे से जा रहा हू मगर
सफ़र सफ़र है मेरा इंतिज़ार मत करना
साहिल सहरी नैनीताली

मुझे ख़बर थी मेरा इंतिज़ार घर में रहा
ये हादसा था कि मैं उम्र भर सफ़र में रहा
साक़ी फ़ारुक़ी

सफ़र में ऐसे कई मरहले भी आते हैं
हर एक मोड़ पे कुछ लोग छूट जाते हैं
आबिद अदीब

ख़ामोश ज़िंदगी जो बसर कर रहे हैं हम
गहरे समुंदरों में सफ़र कर रहे हैं हम
रईस अमरोहवी

है कोई जो बताए शब के मुसाफ़िरों को
कितना सफ़र हुआ है कितना सफ़र रहा है
शहरयार

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ये बद-नसीबी नहीं है तो और फिर क्या है
सफ़र अकेले किया हम-सफ़र के होते हुए
हसीब सोज़
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