Shayari: 'किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल', पढ़ें इश्‍क़ से महकते अशआर...

शायरी: मंज़िल तमाम उम्र मुझे ढूंढ़ती रही...Image:Suzy-Hazelwood/pexels

Shayari: शेरो-सुख़न (Urdu Shayari) की दुनिया इश्‍क़ से लबरेज़ है. इसमें जहां मुहब्‍बत (Love) का रंग घुला हुआ है, वहीं मंज़िल को तलाशते रास्‍तों की बात भी की गई है...

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    Shayari: शायरों की दुनिया मुहब्‍बत की दुनिया है और शेरो-सुख़न (Shayari) की इस दुनिया में हर जज्‍़बात को बेहद ख़ूबसूरती के साथ काग़ज़ पर उकेरा गया है. बात चाहे इश्‍क़ो-मुहब्‍बत (Love) की हो या किसी और मसले पर क़लम उठाई गई हो. शायरी में हर जज्‍़बात (Emotion) को ख़ूबसूरती के साथ तवज्‍जो मिली है और इन्‍हें बेहद सलीके से अल्‍फ़ाज़ में पिरोया गया है. आज शायरों के ऐसे ही बेशक़ीमती कलाम से चंद अशआर आपके लिए पेश हैं. शायरों के ऐसे अशआर जिनमें बात आरज़ू, ख्‍़वाहिश की हो और मंजिल का जिक्र हो. तो आप भी इसका लुत्‍़फ़ उठाइए...

    मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर
    लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया
    मजरूह सुल्तानपुरी

    नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तुजू ही सही
    नहीं विसाल मयस्सर तो आरज़ू ही सही
    फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

    किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल
    कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा
    अहमद फ़राज़

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    उक़ाबी रूह जब बेदार होती है जवानों में
    नज़र आती है उन को अपनी मंज़िल आसमानों में
    अल्लामा इक़बाल

    'फ़ैज़' थी राह सर-ब-सर मंज़िल
    हम जहां पहुंचे कामयाब आए
    फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

    सिर्फ़ इक क़दम उठा था ग़लत राह-ए-शौक़ में
    मंज़िल तमाम उम्र मुझे ढूंढ़ती रही
    अब्दुल हमीद अदम

    उस ने मंज़िल पे ला के छोड़ दिया
    उम्र भर जिस का रास्ता देखा
    नासिर काज़मी

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    वो क्या मंज़िल जहां से रास्ते आगे निकल जाएं
    सो अब फिर इक सफ़र का सिलसिला करना पड़ेगा
    इफ़्तिख़ार आरिफ़
    (साभार/रेख्‍़ता)

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