जयंती विशेष: अब मुफ़्त न देंगे दिल हम अपना, फिराक गोरखपुरी की शायरी का लुत्फ़ लें

जयंती विशेष: अब मुफ़्त न देंगे दिल हम अपना, फिराक गोरखपुरी की शायरी का लुत्फ़ लें
फिराक गोरखपुरी की आज जयंती है

फिराक गोरखपुरी की शायरी (Firaq Gorakhpuri Shayari): फिराक गोरखपुरी के जन्मदिन (Firaq Gorakhpuri Birth Anniversary) पर पढ़ें उनकी चुनिंदा शायरी- मौत का भी इलाज हो शायद, ज़िन्दगी का कोई इलाज नहीं...

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  • Last Updated: August 28, 2020, 3:01 PM IST
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फिराक गोरखपुरी की शायरी (Firaq Gorakhpuri Shayari): आज मशहूर शायर फिराक गोरखपुरी का जन्मदिन है. फिराक साहब कि लेखनी में बगावत की खुशबू आती थी. रघुपति सहाय ऊर्फ फिराक गोरखपुरी की जन्मभूमि भले ही गोरखपुर रही हो पर उनकी कर्मभूमि प्रयागराज रही है.फिराक के शब्द बहुत कुछ आज भी बयां करते हैं "मौत का भी इलाज हो शायद, ज़िदगी का कोई इलाज नहीं" ये लाइने जिन्हें कभी फिराक ने लिखा था उनकी संजीदगी को बयां करती हैं. रघुपति सहाय उर्फ फिराक गोरखपुरी वक्त के तकाजे को पहचानने कि कुवत थी, शायद यही वजह है कि उनका अंदाज-ए-बयां औरों से अलहदा था. आज हम फिराक गोरखपुरी के जन्मदिन (Firaq Gorakhpuri Birth Anniversary) के मौके पर कविताकोश के साभार से आपके लिए लेकर आए हैं फिराक गोरखपुरी कि शायरी....

1.जो बात है हद से बढ़ गयी है
वाएज़ [उपदेशक] के भी कितनी चढ़ गई है

हम तो ये कहेंगे तेरी शोख़ी
दबने से कुछ और बढ़ गई है



हर शय ब-नसीमे-लम्से-नाज़ुक
बर्गे-गुले-तर से बढ़ गयी है

जब-जब वो नज़र उठी मेरे सर
लाखों इल्ज़ाम मढ़ गयी है

तुझ पर जो पड़ी है इत्तफ़ाक़न
हर आँख दुरूद पढ़ गयी है

सुनते हैं कि पेंचो-ख़म निकल कर
उस ज़ुल्फ़ की रात बढ़ गयी है

जब-जब आया है नाम मेरा
उसकी तेवरी-सी चढ़ गयी है

अब मुफ़्त न देंगे दिल हम अपना
हर चीज़ की क़द्र बढ़ गयी है

जब मुझसे मिली 'फ़ि‍राक' वो आँख
हर बार इक बात गढ़ गयी है.

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2. ज़िन्दगी क्या है,ये मुझसे पूछते हो दोस्तों.
एक पैमाँ है जो पूरा होके भी न पूरा हो.

बेबसी ये है कि सब कुछ कर गुजरना इश्क़ में.
सोचना दिल में ये,हमने क्या किया फिर बाद को.

रश्क़ जिस पर है ज़माने भर को वो भी तो इश्क़.
कोसते हैं जिसको वो भी इश्क़ ही है,हो न हो.

आदमियत का तक़ाज़ा था मेरा इज़हारे-इश्क़.
भूल भी होती है इक इंसान से,जाने भी दो.

मैं तुम्हीं में से था कर लेते हैं यादे-रफ्तगां२.
यूँ किसी को भूलते हैं दोस्तों,ऐ दोस्तों !

यूँ भी देते हैं निशान इस मंज़िले-दुश्वार का.
जब चला जाए न राहे-इश्क़ में तो गिर पड़ो.

मैकशों ने आज तो सब रंगरलियाँ देख लीं.
शैख३ कुछ इन मुँहफटों को दे-दिलाक चुप करो.

आदमी का आदमी होना नहीं आसाँ 'फ़िराक़'.
इल्मो-फ़न ,इख्लाक़ो-मज़हब५ जिससे चाहे पूछ लो.

3. कभी पाबन्दियों से छुट के भी दम घुटने लगता है
दरो-दीवार हो जिनमें वही ज़िन्दाँ नहीं होता

हमारा ये तजुर्बा है कि ख़ुश होना मोहब्बत में
कभी मुश्किल नहीं होता, कभी आसाँ नहीं होता

बज़ा है ज़ब्त भी लेकिन मोहब्बत में कभी रो ले
दबाने के लिये हर दर्द ऐ नादाँ ! नहीं होता

यकीं लायें तो क्या लायें, जो शक लायें तो क्या लायें
कि बातों से तेरी सच झूठ का इम्काँ नहीं होता.
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