'रात भी नींद भी कहानी भी', पढ़ें 'फ़िराक़' गोरखपुरी का मुहब्‍बत से लबरेज़ कलाम

'रात भी नींद भी कहानी भी', पढ़ें 'फ़िराक़' गोरखपुरी का मुहब्‍बत से लबरेज़ कलाम
'फ़िराक़' गोरखपुरी के बेशक़ीमती कलाम...

'फ़िराक़' गोरखपुरी (Firaq Gorakhpuri) का असल नाम रघुपति सहाय (Raghupati Sahay) था. उन्‍होंने शायरी को एहसास और जज्‍़बे की ताज़गी दी...

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हुस्‍न-ओ-इश्‍क़ के शायर 'फ़िराक़' गोरखपुरी (Firaq Gorakhpuri) का असल नाम रघुपति सहाय (Raghupati Sahay) था. शायरी में वह 'फ़िराक़' तख़ल्‍लुस रखते थे. उनका जन्‍म 28 अगस्‍त, 1896 को गोरखपुर में हुआ था. शायरी उन्‍हें विरासत में मिली थी. उनके पिता मुंशी गोरख प्रसाद (Munshi Gorakh Prasad) अरबी और फारसी के अच्‍छे जानकार होने के साथ-साथ उर्दू के बड़े शायर भी थे और शायरी में अपना तख़ल्‍लुस 'इबरत' रखते थे. 'फ़िराक़' ने शायरी को एहसास और जज्‍़बे की ताज़गी दी. आज हम 'रेख्‍़ता' के साभार से 'फ़िराक़' गोरखपुरी के बेशक़ीमती कलाम से कुछ ग़ज़ल चुन कर लाए हैं आपके लिए...

 

दूर से पहचान लेते हैं...
बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं
तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं



मेरी नज़रें भी ऐसे क़ातिलों का जान ओ ईमां हैं

निगाहें मिलते ही जो जान और ईमान लेते हैं

जिसे कहती है दुनिया कामयाबी वाए नादानी

उसे किन क़ीमतों पर कामयाब इंसान लेते हैं

निगाह-ए-बादा-गूं यूं तो तेरी बातों का क्या कहना

तेरी हर बात लेकिन एहतियातन छान लेते हैं

तबियत अपनी घबराती है जब सुनसान रातों में

हम ऐसे में तेरी यादों की चादर तान लेते हैं

ख़ुद अपना फ़ैसला भी इश्क़ में काफ़ी नहीं होता

उसे भी कैसे कर गुज़रें जो दिल में ठान लेते हैं

हयात-ए-इश्क़ का इक इक नफ़स जाम-ए-शहादत है

वो जान-ए-नाज़-बरदारां कोई आसान लेते हैं

हम-आहंगी में भी इक चाशनी है इख़्तिलाफ़ों की

मेरी बातें ब-उनवान-ए-दिगर वो मान लेते हैं

तेरी मक़बूलियत की वजह वाहिद तेरी रमज़िय्यत

कि उस को मानते ही कब हैं जिस को जान लेते हैं

अब इस को कुफ़्र मानें या बुलंदी-ए-नज़र जानें

ख़ुदा-ए-दो-जहां को दे के हम इंसान लेते हैं

जिसे सूरत बताते हैं पता देती है सीरत का

इबारत देख कर जिस तरह मानी जान लेते हैं

तुझे घाटा न होने देंगे कारोबार-ए-उल्फ़त में

हम अपने सर तिरा ऐ दोस्त हर एहसान लेते हैं

हमारी हर नज़र तुझ से नई सौगंध खाती है

तो तेरी हर नज़र से हम नया पैमान लेते हैं

रफ़ीक़-ए-ज़िंदगी थी अब अनीस-ए-वक़्त-ए-आख़िर है

तिरा ऐ मौत हम ये दूसरा एहसान लेते हैं

ज़माना वारदात-ए-क़ल्ब सुनने को तरसता है

इसी से तो सर आँखों पर मिरा दीवान लेते हैं

'फ़िराक़' अक्सर बदल कर भेस मिलता है कोई काफ़िर

कभी हम जान लेते हैं कभी पहचान लेते हैं
लुटता जा रहा हूं...
सितारों से उलझता जा रहा हूं

शब-ए-फ़ुर्क़त बहुत घबरा रहा हूं

तेरे ग़म को भी कुछ बहला रहा हूं

जहां को भी समझता जा रहा हूं

यक़ीं यह है हक़ीक़त खुल रही है

गुमां यह है कि धोके खा रहा हूं

अगर मुमकिन हो ले ले अपनी आहट

ख़बर दो हुस्न को मैं आ रहा हूं

हदें हुस्न-ओ-मुहब्बत की मिला कर

क़यामत पर क़यामत ढा रहा हूं

ख़बर है तुझ को ऐ ज़ब्त-ए-मुहब्बत

तेरे हाथों में लुटता जा रहा हूं

असर भी ले रहा हूं तेरी चुप का

तुझे क़ाइल भी करता जा रहा हूं

भरम तेरे सितम का खुल चुका है

मैं तुझ से आज क्यों शरमा रहा हूं

उन्हीं में राज़ हैं गुल-बारियों के

मैं जो चिंगारियां बरसा रहा हूं

जो उन मासूम आंखों ने दिए थे

वो धोके आज तक मैं खा रहा हूं

तेरे पहलू में क्यों होता है महसूस

कि तुझ से दूर होता जा रहा हूं

हद-ए-जोर-ओ-करम से बढ़ चला हुस्न

निगाह-ए-यार को याद आ रहा हूं

जो उलझी थी कभी आदम के हाथों

वो गुत्थी आज तक सुलझा रहा हूं

मुहब्बत अब मुहब्बत हो चली है

तुझे कुछ भूलता सा जा रहा हूं

अजल भी जिन को सुन कर झूमती है

वो नग़्मे ज़िंदगी के गा रहा हूं

ये सन्नाटा है मेरे पांव की चाप

'फ़िराक़' अपनी कुछ आहट पा रहा हूं

 

हिज्र की कहानी भी...
रात भी नींद भी कहानी भी

हाय क्या चीज़ है जवानी भी

एक पैग़ाम-ए-ज़िंदगानी भी

आशिक़ी मर्ग-ए-ना-गहानी भी

इस अदा का तेरी जवाब नहीं

मेहरबानी भी सरगिरानी भी

दिल को अपने भी ग़म थे दुनिया में

कुछ बलाएं थीं आसमानी भी

मंसब-ए-दिल ख़ुशी लुटाना है

ग़म-ए-पिन्हां की पासबानी भी

दिल को शोलों से करती है सैराब

ज़िंदगी आग भी है पानी भी

शाद-कामों को ये नहीं तौफ़ीक़

दिल-ए-ग़म-गीं की शादमानी भी

लाख हुस्न-ए-यक़ीं से बढ़ कर है

उन निगाहों की बद-गुमानी भी

तंगना-ए-दिल-ए-मलूल में है

बहर-ए-हस्ती की बे-करानी भी

इश्क़-ए-नाकाम की है परछाईं

शादमानी भी कामरानी भी

देख दिल के निगार-ख़ाने में

ज़ख़्म-ए-पिन्हां की है निशानी भी

ख़ल्क़ क्या क्या मुझे नहीं कहती

कुछ सुनूं मैं तेरी ज़बानी भी

आए तारीख़-ए-इश्क़ में सौ बार

मौत के दौर-ए-दरमियानी भी

अपनी मासूमियत के पर्दे में

हो गई वो नज़र सियानी भी

दिन को सूरज-मुखी है वो नौ-गुल

रात को है वो रात-रानी भी

दिल-ए-बद-नाम तेरे बारे में

लोग कहते हैं इक कहानी भी

वज़्अ करते कोई नई दुनिया

कि ये दुनिया हुई पुरानी भी

दिल को आदाब-ए-बंदगी भी न आए

कर गए लोग हुक्मरानी भी

जौर-ए-कम-कम का शुक्रिया बस है

आप की इतनी मेहरबानी भी

दिल में इक हूक भी उठी ऐ दोस्त

याद आई तेरी जवानी भी

सर से पा तक सुपुर्दगी की अदा

एक अंदाज़-ए-तुर्कमानी भी

पास रहना किसी का रात की रात

मेहमानी भी मेज़बानी भी

हो न अक्स-ए-जबीन-ए-नाज़ कि है

दिल में इक नूर-ए-कहकशानी भी

ज़िंदगी ऐन दीद-ए-यार 'फ़िराक़'

ज़िंदगी हिज्र की कहानी भी

 
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