पति-पत्नी के रिश्ते में हो बराबरी, इसलिए नया सरनेम अपना रहे कपल्स

पति-पत्नी के रिश्ते में हो बराबरी, इसलिए नया सरनेम अपना रहे कपल्स
अगर पार्टनर के पैरेंट्स को आप की कुछ बातें अच्छी न लगें या फिर आपके व्यवहार से उन्हें परेशानी हो तो इससे आपकी रिलेशनशिप भी प्रभावित हो सकती है.

नाम में इस तरह के बदलाव से प्रशासनिक कार्यों में भी परेशानी आती है. ज्यादातर सरकारी विभाग नामों के इस बदलाव को स्वीकार नहीं करते.

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ट्रेडिशनल शादियों में ज़्यादातर ऐसा होता है जब लड़कियों को शादी के बाद अपना सरनेम बदलकर नाम के साथ पति सरनेम लगाना पड़ता है. लेकिन, आज की युवा पीढ़ी इन बातों से वास्ता नहीं रखती क्योंकि उनके अनुसार एक महिला को शादी करने के कारण अपनी पहचान से समझौता नहीं करना चाहिए. अगर महिला अपना आखिरी नाम नहीं बदलना चाहती तो ये उसकी मर्जी होनी चाहिए.

आजकल युवा दंपति एक समान नाम चुन रहे हैं ताकि वे एक नए परिवार की शुरुआत कर सकें. 31 वर्षीय ताशा मेंट और उनके पति जो मेंट ने मेंट शब्द का चुनाव किया, जिसका मतलब स्पेनिश भाषा में माइंड होता है. दोनों के सरनेम अलग-अलग थे, लेकिन उन्होंने एक दूसरे के प्रति अपने सम्मान को दर्शाने के लिए एक नाम का चयन किया.

अभी आम प्रचलन नहीं है नाम में बदलाव : नामों में इस तरह का परिवर्तन अभी आम प्रचलन में नहीं है. जर्नल ऑफ फैमिली इश्यूज में प्रकाशित एक शोध के अनुसार 2018 में सिर्फ तीन फीसदी पुरुषों ने अपने नाम में बदलाव किया. लेकिन, ये प्रचलन अब बढ़ रहा है क्योंकि पति- पत्नी अब एक- दूसरे को बराबर का दर्जा देने लगे हैं. सीएटल की केलसी डिप्पोल्ड और उनके पति नेट जॉनसन ने दोनों का आखिरी नाम मिलाकर जोहनॉल्ड नाम बनाया. न्यूली नेम्ड नामक कंपनी की संस्थापक कोली क्रिस्टेनसेन ने कहा, ज्यादातर नव दंपति अपने आखिरी की नामों को जोड़कर एक नया नाम बना रहे हैं. उनकी कंपनी ऑनलाइन लोगों को नए नाम का सुझाव देती है. उन्होंने कहा की समाज अब भी नाम में इस तरह की बदलाव को मानने के लिए तैयार नहीं है. साथ में नाम में इस तरह के बदलाव से प्रशासनिक कार्यों में भी परेशानी आती है. ज्यादातर सरकारी विभाग नामों के इस बदलाव को स्वीकार नहीं करते.



कुछ दंपति ही इस नए प्रचलन को बढ़ावा दे रहे हैं. 2015 में गूगल की ओर से किए गए एक कंज्यूमर सर्वे की अनुसार अब महिलाएं शादी की बाद अपने पहले की नाम को ही बरकरार रख रही हैं, लेकिन फिर भी सिर्फ 20 फीसदी महिलाएं ही ऐसा कर रही हैं. वही, सिर्फ 10 फीसदी महिलाएं ही नए नाम का चुनाव कर रही हैं.



प्रशासनिक कार्यों में हो रही परेशानी : 31 वर्षीय एश्ले ने कहा, समाज हमेशा नाम में हो रहे ऐसे परिवर्तन को समर्थन नहीं देता. उन्होंने कहा कि जब उन्होंने अपने आखिरी नाम स्टल और अपने पति के नाम मेयर्स को साथ मिलाकर एक नया नाम बनाया तो ड्राइविंग लाइसेंस का नवीनीकरण कराते समय उन्हें काफी परेशानी का सामना करना पड़ा. कुछ प्रशासनिक लोग अपने सिस्टम को नाम में होने वाले परिवर्तनों को लेकर तैयार नहीं करना चाहते. उनका कहना होता है कि कंप्यूटर सिस्टम और सरकारी आवेदनों में नाम का बदलाव नहीं किया जा सकता.

इसके बाद सभी जगहों पर नाम का परिवर्तन करने में काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है. इवेंट प्लानर सामंथा बेलिंगगर ने कहा, महिलाएं सिर्फ शादी के प्रमाणपत्र की मदद से अपने नाम में परिवर्तन कर सकती हैं, लेकिन पुरुषों को नाम बदलने के लिए अदालत में जाना पड़ता है.
First published: March 24, 2020, 7:48 AM IST
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