आपके महान देश में हर तीसरे मिनट पिट रही है एक औरत

56 फीसदी औरतें घरेलू हिंसा की शिकार
56 फीसदी औरतें घरेलू हिंसा की शिकार

लैंसेट की 2006 की एक रिपोर्ट कहती है कि भारत में शादी और परिवार में घरेलू हिंसा की शिकार होने वाली 84 फीसदी औरतें सार्वजनिक रूप से इसके बारे में बात नहीं करतीं और न ही पुलिस या अन्‍य किसी सामाजिक संस्‍था की मदद लेती हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 23, 2019, 10:40 AM IST
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उसका पति, सास, ससुर सब उसे पीटते और प्रताडि़त करते थे. उसकी दो छोटी बेटियां हैं. लेकिन उसका पति दूसरी शादी करना चाहता है ताकि और दहेज मिल सके. उसे दहेज इसलिए नहीं चाहिए कि वो गरीब और मजबूर है. लड़की का ससुर मद्रास हाईकोर्ट का रिटायर्ड जज है. उनके पास इतना पैसा है कि घर के अंदर भी सीसीटीवी कैमरा लगा हुआ है.

वही कैमरा, जिसकी एक फुटेज पिछले दो दिनों से इंटरनेट पर वायरल हो रही है. उन्‍हें क्‍या पता था, उनके ही घर का कैमरा उनकी करतूतों का पोस्‍टर बन जाएगा. फुटेज में साफ दिख रहा था कि कैसे लड़की का पति, सास, ससुर सब उसे पीट रहे हैं. छोटी बच्‍ची मां के पैरों से लिपटकर उसे बचाने की कोशिश कर रही है. बच्‍चे बेचैन हैं, परेशान हैं मां को ऐसे पिटते देख.

सिंधु शर्मा ने 27 अप्रैल को मद्रास हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज नूटी राममोहन राव, अपने पति और सास के खिलाफ घरेलू हिंसा और प्रताड़ना का मुकदमा दर्ज किया. हाल ही में वीडियो सामने आया है और सिंधु ने मीडिया में बयान भी दिया है. इस बारे में बाकी और डीटेल अब तक लिखी जा चुकी अनेकों खबरों में थोक की मात्रा में इंटरनेट पर मौजूद हैं.



इसलिए अब बात उस सिंधु की नहीं, उन सिंधुओं की करते हैं, जिन्‍होंने इस देश के किसी थाने, किसी अदालत में कोई मुकदमा नहीं दर्ज कराया है. जिनका कोई सीसीटीवी फुटेज सामने नहीं आया है. जिन्‍होंने आज चेहरे पर ज्‍यादा मेकअप लगाया है ताकि वो अपनी आंखों के नीचे पड़े चोट के निशान को छिपा सकें. जिनके चेहरे तो साफ हैं, लेकिन चोट के अनेकों निशान कपड़े के पीछे छिपे हुए हैं. दफ्तर में जिनके मुस्‍कुराते चेहरों को देखकर कोई अंदाजा नहीं लगा सकता कि वो कल रात घर में पति से पिटी थीं. उनके बारे में, जिनका चेहरा, नाम, पता, पहचान कोई नहीं जानता, लेकिन जिनके बारे में विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन का आंकड़ा करता है कि भारत में हर चौथे मिनट पर एक औरत अपने घर में पति या परिवार वालों के हाथों शारीरिक, मानसिक और यौन हिंसा की शिकार होती है. जितनी देर में मैं ये आर्टिकल लिखकर खत्‍म करूंगी, 20 औरतें हिंसा की शिकार हो चुकी होंगी या हो रही होंगी.
सिंधु की कहानी बाहर आने के बाद हम जितने आश्‍चर्य से दांतों में उंगली दबाए फुसफुसाते मुंह इस घटना की चर्चा कर रहे हैं, लग रहा है मानो ये हजारों-लाखों में एक कोई अनोखी बात हो, जो अमूमन नहीं होती. जबकि सच्‍चाई इसके ठीक उलट है. बात बस इतनी सी है कि इसके बारे में कभी कोई बात नहीं होती. आंकड़ों के सामने भी हम बगुला भगत बने आंखें मूंदे रहते हैं. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्‍यूरो का आंकड़ा कहता है कि भारत में हर तीसरे मिनट महिला के साथ कोई-न-कोई हिंसक कार्रवाई हो रही होती है. बीएमसी पब्लिक हेल्‍थ में 2009 में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक उत्‍तर भारत में 16 फीसदी महिलाएं शारीरिक घरेलू हिंसा की शिकार होती हैं. 25 फीसदी महिलाएं यौन हिंसा की शिकार होती हैं, 52 फीसदी महिलाएं मानसिक और भावनात्‍मक हिंसा की शिकार होती हैं और 56 फीसदी महिलाओं के साथ मारपीट की घटनाएं होती हैं. इनमें से 97 फीसदी मामलों में औरतों के साथ शारीरिक, मानसिक, भावनात्‍मक और यौन हिंसा को अंजाम देने वाला व्‍यक्ति उनका पति होता है और कुछ मामलों में पति के साथ उसके परिवार वाले भी शामिल होते हैं.



लैंसेट की 2006 की एक रिपोर्ट कहती है कि भारत में शादी और परिवार में घरेलू हिंसा की शिकार होने वाली 84 फीसदी औरतें सार्वजनिक रूप से इसके बारे में बात नहीं करतीं और न ही पुलिस या अन्‍य किसी सामाजिक संस्‍था की मदद लेती हैं. ऐसे मामलों में निजी पारिवारिक मामला कहकर दबा दिया जाता है. बीबीसी में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक 2013 में भारत में महिलाओं के खिलाफ हिंसा के 309,546 मामले दर्ज किए गए, जिनमें से अकेले 118,886 मामले घरेलू हिंसा के थे.

आंकड़े तो और भी बहुत सारे हैं. सर्वे और डेटा की कमी नहीं है. इतना है कि उसमें घुसने जाएं तो उसी में डूबकर मर जाएं. इसलिए सवाल ये नहीं है कि हमें तथ्‍य नहीं पता है, सवाल ये है कि हम तथ्‍य जानकर भी अंजान बने हुए हैं. आंखें मूंदे हुए हैं. हमें फर्क नहीं पड़ता और जिन्‍हें थोड़ा फर्क पड़ता भी है, वो भी कुछ उखाड़ नहीं पा रहे.

आखिर क्‍यों?

क्‍योंकि प्रॉब्‍लम ये नहीं है कि आदमी पीटता है, प्रॉब्‍लम ये है कि औरतों को पिटना और पिटकर चुप रहना सिखाया गया है. मारना मर्द का इनटाइटलमेंट है और मार खाना औरत का कर्तव्‍य. आदमी दो-चार हाथ लगा दे तो हमारे घरों में औरतों को ये शिक्षा दी जाती है कि अपना ही पति है, मारता है तो क्‍या हुआ, प्‍यार भी तो करता है. मेरी एक दोस्‍त थी. उसके पापा अकसर ही उसकी मम्‍मी पर हाथ उठा दिया करते थे. ये सब मैं भी जानती थी क्‍योंकि वो मेरी बहुत पक्‍की सहेली थी और हम एक-दूसरे से हर बात कहते थे. उसने एक घटना बताई. एक बार वो मां के साथ नानी के घर गई थी. वो बहुत छोटी थी. उसने नानी और मां को बात करते सुना. नानी ने पूछा, बिटिया, त्रिभुवन तुम्‍हारे ऊपर हाथ तो नहीं उठाता. मां ने इनकार में सिर हिलाया और मुंह से कहा, ना.

मां की ये बात मेरी सहेली के दिल में ठहर गई. वो बहुत छोटी थी. इस झूठ का मतलब नहीं जानती थी, लेकिन इतना तो वो भी जानती थी कि मां झूठ बोल रही थीं. उसके पापा तो बच्‍चों के सामने ही मां पर हाथ उठाया करते थे. ये बात उसने बहुत सालों बाद बड़े होने पर मुझसे कही कि मां ने नानी से झूठ बोला था.
इस बात के मर्म को समझ सकें तो शायद बेहतर समझ पाएंगे कि हम ऐसे क्‍यों हैं, जैसेकि हम हैं. अपने से कम बल वाले, कमजोर और वलनरेबल पर अपनी ताकत दिखाना मर्दानगी क्‍यों है. चुप रहना कमजोरी क्‍यों है. औरतों को सहने का पाठ किसने सिखाया, कहां से आया. आखिर ऐसा क्‍यों है, जैसाकि है.

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