इन 5 मुल्कों के 4 ऐतिहासिक फैसलों ने बदली औरतों की ज़िंदगी

दुनिया के पांच देशों ने लैंगिक समानता की तरफ कदम बढ़ाया

अगस्त 2017 में दुनियाभर में औरतों के हक़ में ऐतिहासिक फैसले लिए गए. वे फैसले जो औरतों को केवल औरतें न रखकर उन्हें इंसानी दर्जा देते हैं. ये फैसले लेने वालों में दुनिया के 4 देश भारत, जॉर्डन एवं लेबनान, चिली व नेपाल शामिल हैं.

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दुनियाभर में बहुत सी फेमिनिस्ट, अकादमी, नेता और वकील औरतों की बेहतरी लिए हर दिन संघर्ष कर रहे हैं. दशकों से चली आ रही प्रथाओं ने उनके संघर्ष को रुकने नहीं दिया. अगस्त 2017 में दुनियाभर में औरतों के हक़ में ऐतिहासिक फैसले लिए गए. वे फैसले जो औरतों को केवल औरतें न रखकर उन्हें इंसानी दर्जा देते हैं. ये फैसले लेने वालों में दुनिया के 4 देश भारत, जॉर्डन एवं लेबनान, चिली व नेपाल शामिल हैं. दुनिया के पांच अलग-अलग कोनों में मौजूद इन देशों ने कानूनी बदलाव कर लैंगिक समानता की तरफ मजबूत कदम बढ़ाया.

भारत ने 'तुरंत तीन तलाक' बैन किया, जॉर्डन और लेबनान ने 'रेपिस्ट से शादी' के कानून को खत्म किया, साउथ अमेरिका के देश चिली ने 'अबॉर्शन को लीगल' करार दिया. नेपाल ने 'मासिक धर्म से जुड़े भेदभाव' को गैरकानूनी घोषित किया. भारत, जॉर्डन, लेबनान, नेपाल और चिली की औरतों के पास अब वो कानूनी अधिकार हैं जिनकी वजह से वो कहीं न कहीं अपनी ज़िंदगी को जी नहीं पाईं. कानून में आए ये बदलाव इन पांचों मुल्कों की औरतों के भविष्य को नई दिशा दे रहे हैं.

पढ़ें, भारत, जॉर्डन, लेबनान, नेपाल और चिली में औरतों के हक़ में हुए कानूनी बदलाव.



भारत में  तुरंत तीन तलाक बैन
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने 22 अगस्त 2017 को इस्लाम के कुछ समुदायों में मौजूद एक बार में 'तलाक, तलाक, तलाक' कहकर तलाक लेने की प्रकिया (तलाक-ए-बिद्दत) को असंवैधानिक करार दिया. ऐसे अनेकों मामले सामने आए, जिनमें समाज का एक बड़ा तबका ट्रिपल तलाक का नाजायज़ इस्तेमाल करते हुए महिलाओं का शोषण कर रहा था. इस फैसले के बाद कोई मुस्लिम मर्द अपनी पत्नी को ई-मेल, खत, व्हाट्सऐप, फेसबुक या फोन आदि के जरिए तीन तलाक नहीं दे पाएगा.

भारत में 32 साल पहले 1987 में भी सुप्रीम कोर्ट ने शाहबानो की गुहार पर एक ऐसा ही फैसला सुनाया था, जिसने देश के राजनैतिक गलियारों में हलचल मचा दी थी. इंदौर की रहने वाली शाहबानो को उसके पति मोहम्मद खान ने 1978 में तलाक दे दिया था. पांच बच्चों की मां, 62 साल की शाहबानो ने गुजारा भत्ता पाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़कर पति के खिलाफ गुजारे भत्ते का केस जीत भी लिया था.

इन्सटैंट ट्रिपल तलाक़ पर फैसले के बाद केन्द्र सरकार ने भी इसके बाद के हालात पर नजर रखनी शुरू कर दी है. गृह मंत्रालय देश के सारे राज्यों को एडवायजरी जारी करेगा. एडवायजरी में फैसले के बाद क्या हालात हैं, इस पर नजर रखने को कहा जाएगा. राज्य यह भी सुनिश्चित करेंगे कि फैसले के मुताबिक पालन हो. जो लोग इसे लेकर माहौल बिगाड़ने की कोशिश करेंगे, उनके खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की जाएगी.

प्रतीकात्मक तस्वीर
प्रतीकात्मक तस्वीर


चिली में अबॉर्शन को लीगल करार दिया गया
21 अगस्त तक चिली भी दुनिया के उन 6 मुल्कों में शुमार था जहां हर हाल में अबॉर्शन बैन था. अब सिर्फ ऐसे 5 ही मुल्क हैं, जिनमें निकारागुआ, एल सेलवेडोर, द डोमिनिकन रिपब्लिक, माल्टा और वैटिकन सिटी शामिल हैं. 2 अगस्त को चिली के पार्लियामेंट में इस मुद्दे पुर वोटिंग के बाद एक नया संविधान पेश किया गया. इसके तहत उन मामलों में गर्भपात को वैध करार दिया गया, जहां औरत की जिंदगी खतरे में हो. बलात्कार के मामलों में भ्रूण हत्या वहां अभी भी गैरकानूनी है. चिली के वर्तमान राष्ट्रपति मिशेल बाचेलेट
(Michelle Bachelet) पिछले दो साल से इस कानून में बदलाव के लिए काम कर रहे थे.

चिली में अबॉर्शन पर बैन को वहां के पूर्व राष्ट्रपति अगस्तई पिनोचेट (Augusto Pinochet) के आखिरी दिनों में हटा लिया गया था. उन्होंने 1973 में सत्ता में आने के बाद 1989 में देश के पिछले गर्भपात कानून के उलट ये नया कानून बनाया था. अबॉर्शन बैन कानून के मुताबिक, औरत पर उस बच्चे को भी जन्म देने का दबाव था जहां दोनों की जिंदगियां खतरे में हों. वहां गर्भपात कराना आपराधिक मामला था.

एम्नेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक, 2015 में चिली में 33 हजार औरतें और लड़कियां गर्भपात से जुड़ी वजहों से हॉस्पिटल में भर्ती रहीं. 100 से ज्यादा ऐसी औरतें पाई गईं जिन्होंने 2014 में गर्भपात किया.

प्रतीकात्मक तस्वीर (image: alaraby)
प्रतीकात्मक तस्वीर (image: alaraby)


जॉर्डन और लेबनान ने 'रेपिस्ट से शादी' के कानून को खत्म किया
'रेपिस्ट से शादी' करने के कानून को मिडिल ईस्ट और नॉर्थ अमेरिका के तीन देशों ने खत्म किया. इस कानून की वजह से रेपिस्ट, पीड़िता से शादी करके अपराध की सजा से बच निकलता था. अब इसकी कानूनी मान्यता खत्म कर दी गई है. लेबनान के पार्लियामेंट में 16 अगस्त, 2017 को आर्टिकल 522 को खत्म कर दिया, जिसके तहत क्रिमिनल कोड से रेप-मैरिज प्रोविजन हटा दिया गया. एक्टिविस्टों के लगातार दबाव के बाद कानून में बदलाव हुआ. जॉर्डन ने 'रेपिस्ट से शादी' को 1 अगस्त को गैरकानूनी घोषित किया. ट्यूनीशिया ने इस कानून को 26 जुलाई को खत्म किया था.

इन देशों में 'रेपिस्ट से शादी' के कानून का मकसद बलात्कारी को उस दर्द से दो-चार करवाना था जिससे लड़की और उसका परिवार गुजरता है. इसके पीछे धारणा ये भी थी कि पीड़िता को सम्मान और परिवार मिले. लेबनान में, अगर रेपिस्ट अपनी शादी को तीन साल भी निभा ले जाए तो उसे सजा नहीं मिलती थी, लेकिन पीड़िता को बलात्कारी के साथ रिश्ते में बंधकर पूरी ज़िंदगी हर रोज बलात्कार झेलना पड़ता था.

जॉर्डन, लेबनान और ट्यूनीशिया में खत्म हुए 'रेपिस्ट से शादी' के कानून के बाद दुनिया में उम्मीद जागी है कि बहरीन और कुवैत में भी मौजूद इसी तरह के कानून खत्म कर दिए जाएंगे. 'रेपिस्ट से शादी' का (marry-your-rapist) प्रावधान अभी भी दुनिया के कई देशों में मौजूद है, जिसमें अल्जीरिया से लेकर फिलीपींस से तजाकिस्तान तक शामिल हैं.

कुप्रथा छाउपडी (image: getty)
कुप्रथा छाउपडी (image: getty)


नेपाल ने खत्म किया 'पीरियड्स भेदभाव'
चांद पर जाने से लेकर जमीन पर हर वर्ग में लड़कियां बराबरी कर रही हैं. पर सैकड़ों सालों से नेपाल के बहुत से हिस्सों में औरतों पर पीरियड्स के नाम पर जुल्म हो रहा था. दुनिया के अलग अलग देशों में औरतों के हक में हुए कानूनी बदलाव की ओर नेपाल ने भी कदम बढ़ाए. वहां पीरियड्स और डिलीवरी के दौरान औरतें घरों से बाहर रहती थीं. इस प्रथा को छाउपडी (chhaupadi) कहा जाता है. 9 अगस्त को नेपाल के पार्लियामेंट में इस कुप्रथा के खिलाफ सर्वसम्मति से वोट डाले गए.

कानून में हुए बदलाव के बाद पीरियड्स और डिलीवरी के दौरान औरतों को घरों से बाहर निकालने को गैरकानूनी करार दिया गया है. अब जो भी वहां की औरतों पर छाउपडी के लिए दबाव डालेगा, उसे तीन महीने की जेल होगी या 3 हजार रुपए ($30) का जुर्माना लगाया जाएगा.

छाउपडी प्रथा के मुताबिक, औरतों और लड़कियों को पीरियड्स और डिलीवरी के दौरान अशुद्ध समझा जाता है. उन्हें गौशाला में सोने के लिए मजबूर किया जाता है. उन्हें पूजा से जुड़ा हर सामान, आदमी, पशु और खाना भी छूने से मनाही है. कुछ जगहों पर तो औरतों को सिर्फ रूखी रोटी खाने की इजाजत है. घर से दूर रखने की वजह से औरतें और लड़कियां यौन हिंसा की चपेट में आईं. ऐसी जगहों में रहने की वजह से उनमें दस्त, निमोनिया और सांस जैसी बीमारियां बढ़ीं. नई मांओं को घर से बाहर करने की वजह से नवजात शिशुओं की मौत की दर में भी बढ़ोतरी हुई.