ईसर-गौरी देते हैं अखंड सौभाग्यवती का आशीर्वाद, ऐसे होती है गणगौर पूजा

कुंवारी लड़कियां यह व्रत अच्छा वर पाने के लिए करती हैं तो वहीं विवाहित स्त्रियां ये व्रत अपने पति की लंबी उम्र के लिए करती हैं.

News18Hindi
Updated: March 14, 2018, 2:26 PM IST
ईसर-गौरी देते हैं अखंड सौभाग्यवती का आशीर्वाद, ऐसे होती है गणगौर पूजा
ईसर-गौरी
News18Hindi
Updated: March 14, 2018, 2:26 PM IST
16 दिनों तक चलने वाला गणगौर पर्व 2 मार्च से शुरू हो चुका है. 20 मार्च को गणगौर का आखरी दिन है. ये त्योहार चैत्र शुक्ल की तृतीया को मनाया जाता है. इस दिन महिलाएं शिव-गौरी की पूजा कर दोपहर तक व्रत रखती हैं. मान्यता है कि इस दिन भगवान ईसर यानी शिव ने गौरी (पार्वती) को और गौरी ने पूरे स्त्री-समाज को अखंड सौभाग्यवती होने का वरदान दिया था. यह त्यौहार ज्यादातर राजस्थान में मनाया जाता है. इसके अलावा ये त्यौहार गुजरात, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश के कुछ भागों में भी मनाया जाता है.

क्या है गणगौर का महत्व?
गणगौर की पूजा कुंवारी महिलाओं से लेकर विवाहित स्त्रियों तक हर कोई कर सकता है. कुंवारी लड़कियां यह व्रत अच्छा वर पाने के लिए करती हैं तो वहीं विवाहित स्त्रियां ये व्रत अपने पति की लंबी उम्र के लिए करती हैं. विवाहित महिलाएं सोलह श्रृंगार कर सोलह दिन पूरे विधि-विधान से पूजा करती हैं.

पूजा विधि

16 दिनों तक चलने वाली गणगौर पूजा होलिका दहन के बाद वाले दिन से शुरू होती है. सबसे पहले चौकी लगाकर, उस पर स्वास्तिक बनाकर पानी से भरा कलश रखा जाता है. इसके बाद उस पर नारियल और पान के पांच पत्ते रखे जाते हैं. ये कलश चौकी की दाहिनी ओर रखा जाता है.

इसके बाद होली की राख या काली मिट्टी से सोलह छोटी-छोटी पिंडी बनाकर उसे चौकी पर रखा जाता है. इसके बाद गणगौर के गीत गाए जाते हैं. ऐसी पूजा शुरू के सात दिन करने के बाद सातवें दिन शाम को कुम्हार के यहां से गणगौर भगवान और मिट्टी के दो कुंडे लाए जाते हैं. गणगौर के आखिरी दिन तक इनकी विधि विधान से पूजा कर गणगौर भगवान को विसर्जित कर दिया जाता है और गणगौर का उद्यापन किया जाता है.

गणगौर व्रत कैसे करें :-

* चैत्र कृष्ण पक्ष की एकादशी को प्रातः स्नान करके गीले वस्त्रों में ही रहकर घर के ही किसी पवित्र स्थान पर लकड़ी की बनी टोकरी में जवारे बोना चाहिए.

* इस दिन से विसर्जन तक व्रती को एकासना (एक समय भोजन) रखना चाहिए.

* इन जवारों को ही देवी गौरी और शिव या ईसर का रूप माना जाता है.

* जब तक गौरीजी का विसर्जन नहीं हो जाता (करीब आठ दिन) तब तक प्रतिदिन दोनों समय गौरीजी की विधि-विधान से पूजा कर उन्हें भोग लगाना चाहिए.

* गौरीजी की इस स्थापना पर सुहाग की वस्तुएँ जैसे काँच की चूड़ियाँ, सिंदूर, महावर, मेहँदी,टीका, बिंदी, कंघी, शीशा, काजल आदि चढ़ाई जाती हैं.

* सुहाग की सामग्री को चंदन, अक्षत, धूप-दीप, नैवेद्यादि से विधिपूर्वक पूजन कर गौरी को अर्पण किया जाता है.

* इसके पश्चात गौरीजी को भोग लगाया जाता है.

* भोग के बाद गौरीजी की कथा कही जाती है.

* कथा सुनने के बाद गौरीजी पर चढ़ाए हुए सिंदूर से विवाहित स्त्रियों को अपनी माँग भरनी चाहिए.

* कुंआरी कन्याओं को चाहिए कि वे गौरीजी को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करें.

* चैत्र शुक्ल द्वितीया (सिंजारे) को गौरीजी को किसी नदी, तालाब या सरोवर पर ले जाकर उन्हें स्नान कराएं.

* चैत्र शुक्ल तृतीया को भी गौरी-शिव को स्नान कराकर, उन्हें सुंदर वस्त्राभूषण पहनाकर डोल या पालने में बिठाएं

* इसी दिन शाम को गाजे-बाजे से नाचते-गाते हुए महिलाएँ और पुरुष भी एक समारोह या एक शोभायात्रा के रूप में गौरी-शिव को नदी, तालाब या सरोवर पर ले जाकर विसर्जित करें.
पूरी ख़बर पढ़ें
अगली ख़बर