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'नहीं हाले-दिल्ली सुनाने के क़ाबिल, ये क़िस्सा है रोने रुलाने के क़ाबिल'

दिल्ली

दिल्ली

दिल्ली तरफदारों का शहर नहीं है. ये ग़ालिब और मीर का शहर है. फक्कड़ों, सनकियों और खुद्दारों का शहर है. इस शहर ने सम्राट भी देखे हैं और शहंशाह भी देखे हैं.

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दिल्ली शहर गैस चैंबर बन गया है. यहां की हवा ज़हरीली हो गई है. स्मॉग की वजह से सांस लेना मुश्किल हो गया है. केन्द्र सरकार इसके लिए दिल्ली सरकार को ज़िम्मेदार बता रही है और दिल्ली सरकार केन्द्र सरकार को. ये सिलसिला कब तक चलेगा कुछ नहीं पता. शायद जब तक दिल्ली वाले खुद इसका कोई हल ना निकाल लें.

कोई दिल्ली में नहीं रहना चाहता है. विदेशी यहां नौकरी नहीं करना चाहते हैं. कुछ लोग तो मजबूरी में यहां रह रहे हैं. लेकिन कुछ ऐसे भी लोग हैं जो '40 सिगरेट' फूंकते हुए मर जाना पसंद करेंगे लेकिन शहर छोड़ना नहीं. क्योंकि उनके लिए दिल्ली महज़ एक शहर नहीं है. इश्क है. नशा है. एहसास है.

इस शह के नशे को महसूस तो सब करते हैं लेकिन बयां शायरों से बेहतर कौन कर सकता है. शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ की नज़र से दिल्ली देखें तो वे कहते हैं-

इन दिनों गरचे दकन में है बड़ी क़द्र-ए-सुख़न
कौन जाए 'ज़ौक़' पर दिल्ली की गलियाँ छोड़ कर
गरचे (अगर) दकन (दक्षिण) क़द्र-ए-सुख़न (शायरों की कद्र)

जो दिल्ली शहर छोड़कर चले गए उन्हें भी इसका ग़ुरूर रहा कि वो दिल्ली की गलियों में घूमा करते थे. तभी तो हसन नईम लिखते हैं कि-

ऐ सबा मैं भी था आशुफ़्ता-सरों में यकता
पूछना दिल्ली की गलियों से मिरा नाम कभी

मगर शायद की कोई शहर इतना लुटा हो जितना दिल्ली को लूटा गया है. बशीर बद्र दिल्ली की इस बेबसी को अपना दिल बताते हैं-

दिल की बस्ती पुरानी दिल्ली है
जो भी गुज़रा है उस ने लूटा है

लेकिन जनाब ये सब पढ़कर अगर आपको दिल्ली पर तरस आ रहा है तो भूल जाइए, क्योंकि चाहे दिल्ली लुटे या दिल, यहां लोग चीज़ों को हल्के में लेना जानते हैं. ज़ुबैर रिज़वी लिखते हैं-

क्यूँ मता-ए-दिल के लुट जाने का कोई ग़म करे
शहर-ए-दिल्ली में तो ऐसे वाक़िए होते रहे

इस शहर सूरत को स्मॉग ने ढक रखा है. टीवी पर दिन रात गैस चैंबर, ज़हरीली हवा की ख़बरें फ्लैश होती हैं. इसे अल्ताफ़ हुसैन हाली के इस शेर से देखें कि-

तज़्किरा देहली-ए-मरहूम का ऐ दोस्त न छेड़
न सुना जाएगा हम से ये फ़साना हरगिज़
तज़्किरा (बात) देहली-ए-मरहूम (दिल्ली की ख़राब हालत)

हालात इतने बुरे हैं कि PM से लेकर PM 2.5 सब दिल्ली वालों के पीछे पड़ गए हैं. बहादुर शाह ज़फ़र की शाइरी से ये हालात देखें तो-

'नहीं हाले-दिल्ली सुनाने के क़ाबिल,
ये क़िस्सा है रोने रुलाने के क़ाबिल'

दिल्ली का ताल्लुक सिर्फ इस शहर में रहने वालों से नहीं रहा है. दिल्ली उनकी है जो दिल्ली के हैं. लखनऊ के एक शायर हुए हैं मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद. इन्होंने दिल्ली शहर पर एक ग़ज़ल लिखी थी. उस ग़ज़ल को अगर उसे दिल्ली के ज़हरीली हवा से जोड़ा जाय तो तस्वीर कुछ यूं बनती है-

चेहरे पे सारे शहर के गर्द-ए-मलाल है,
जो दिल का हाल है वही दिल्ली का हाल है

उलझन घुटन हिरास तपिश कर्ब इंतिशार
वो भीड़ है के साँस भी लेना मुहाल है

आवारगी का हक़ है हवाओं को शहर में
घर से चराग़ ले के निकलना मुहाल है

बे-चेहरगी की भीड़ में गुम है हर इक वजूद
आईना पूछता है कहाँ ख़द्द-ओ-ख़ाल है

जिन में ये वस्फ़ हो कि छुपा लें हर एक दाग़
उन आइनों की आज बड़ी देख-भाल है

परछाइयाँ क़दों से भी आगे निकल गईं
सूरज के डूब जाने का अब एहतिमाल है

कश्कोल-ए-चश्म ले के फिरो तुम न दर-ब-दर
'मंज़ूर' क़हत-ए-जिंस-ए-वफ़ा का ये साल है

दिल्ली तरफदारों का शहर नहीं है. ये ग़ालिब और मीर का शहर है. फक्कड़ों, सनकियों और खुद्दारों का शहर है. इस शहर ने सम्राट भी देखे हैं और शहंशाह भी देखे हैं. इस शहर से खेलने वालों के लिए मीर ने लिखा है कि-

दिल्ली में आज भीक भी मिलती नहीं उन्हें
था कल तलक दिमाग़ जिन्हें ताज-ओ-तख़्त का

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