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अपनी मर्दानगी पर इतना घमंड है तो एक बार रोकर दिखाओ...

Gillette के नए विज्ञापन का स्क्रीनग्रैब

Gillette के नए विज्ञापन का स्क्रीनग्रैब

कितनी बार कितने पुरुषों ने यह स्‍वीकार किया कि जाने-अनजाने उन्‍होंने भी अपने “मेल प्रिवेलेज” का फायदा उठाया है, कितने प ...अधिक पढ़ें

    मेल शेविंग प्रोडक्‍ट बनाने वाली कंपनी जिलेट का हाल का विज्ञापन कुछ समय से इंटरनेट की दुनिया में कई तरह सवाल, विवाद और बहस का सबब बना हुआ है. MeeToo मूवमेंट को पृष्‍ठभूमि रखकर बना ये विज्ञापन मर्दानगी के उस आइडिया पर सवाल कर रहा है, जिसका जुमला है, “Boys will be boys.”
    “Boys will be boys” का क्‍या मतलब है?

    इसका मतलब समझाने से पहले मैं एक घटना का जिक्र करना चाहूंगी.

    वो 2017 का आइएएस बैच था, जो गुड़गांव के पास मानेसर में एक साल की ट्रेनिंग के लिए आया था. 19 लोगों के बैच में 16 लड़के और 3 लड़कियां थीं. अलग-अलग राज्‍यों और सांस्‍कृतिक परिवेश से ताल्‍लुक रखने के बावजूद सब तकरीबन हमउम्र थे और सब आइएएस होने वाले थे. वो साथ रहते, ट्रेनिंग करते, खाते, घूमते और पार्टियां करते. लड़कों के मुकाबले लड़कियां बहुत कम थीं, लेकिन समूह का हिस्‍सा बनकर खुद को लड़की जैसा न समझतीं, न महसूस करतीं.

    उनका एक व्‍हॉट्सएप ग्रुप भी था, जिसमें जरूरी सूचनाओं से लेकर फोटो, म्‍यूजिक और जोक तक शेयर होते थे. जेंडर की दीवार से ऊपर उठकर 19 लोगों का साथ होना एक सुखद बात थी.

    लेकिन तभी ये हुआ कि 19 में से 16 लोगों ने अपना एक अलग व्‍हॉट्सएप ग्रुप बनाया और उसका नाम रखा- “Boys will be boys.” आइएएस बैच की तीन लड़कियां उस ग्रुप से बाहर थीं.

    इस तरह 16 लड़कों ने उन 3 लड़कियों को बाहर कर अपनी एक अलग दुनिया बना ली, जिसमें वे सेक्सिस्‍ट जोक, पोर्न क्लिप्‍स और लड़कियों की नंगी तस्‍वीरें शेयर करते थे. लड़के कहते थे कि वो अपने साथ की तीन लड़कियों को, अपनी बहनों को, अपनी मां को, अपनी पत्‍नी और प्रेमिका को, अपनी महिला मित्रों को इस नजर से नहीं देखते, लेकिन उसी समय वो अपने व्‍हॉट्सएप ग्रुप में आए औरतों पर बने भद्दे चुटकुलों, मीम्‍स और तस्‍वीरों पर हंस रहे होते थे. वो इस विश्‍वास से हंस रहे होते कि चुटकुलों और नंगी तस्‍वीरों वाली औरतें उनकी जिंदगी की औरतें नहीं हैं.

    कुछ ऐसा ही सोच रहे होंगे, वो सारे मर्द, जो जिलेट के नए विज्ञापन पर ट्विटर पर कंपनी को गालियां दे रहे हैं. कह रहे हैं, “कंपनी ने सारे पुरुषों को अपमानित किया है. उन्‍हें ज्ञान की जरूरत नहीं. वो टॉक्सिक मर्द नहीं हैं.” वो तो सिर्फ “Boys will be boys” टाइप हैं.

    “Boys will be boys” टाइप क्‍या होता है? इसका मतलब है कि ब्‍वॉयज ऐसे ही होते हैं. वो हिंसक होते हैं. गुस्‍सैल होते हैं. वो सड़क पर लड़कियों को छेड़ते हैं. कमेंट करते हैं. वो लड़कियों के शरीर का एक्‍स-रे निकालते हैं. लड़कों की तो बहुत सारी गर्लफ्रेंड होती हैं. वो बहुत सारी लड़कियों के साथ सोते हैं, सो सकते हैं. वो एक ही मैसेज दस लड़कियों को कॉपी-पेस्‍ट करते हैं, जो भी हाथ आ जाए. वो लड़कियों को पटाते हैं क्‍योंकि वो उन्‍हें पटाने की चीज समझते हैं. वो लड़कियों की लेते हैं क्‍योंकि उन्‍हें लेने की चीज समझते हैं. वो लड़कियों के कपड़ों से उन्‍हें तौलते हैं कि इसका चरित्र कैसा है. ये आसानी से देने वाली है या मुश्किल से. वो लड़कियों को स्‍टॉक करते हैं, इमोशनली मैनिपुलेट और एब्‍यूज करते हैं. उनका इगो बहुत बड़ा होता है. उनके लिए रोज नई लड़की के साथ सोना अपने उसी अहम को संतुष्‍ट करना है.

    और इसमें कुछ भी अजीब नहीं है क्‍योंकि लड़के तो ऐसे ही होते हैं.

    लड़कियां ऐसी हों तो कैरेक्‍टरलेस होती हैं. लेकिन ब्‍वॉयज तो ब्‍वायॅज होते हैं.

    लेकिन जिलेट का ये विज्ञापन कह रहा है कि नहीं. ब्‍वॉयज ऐसे नहीं होते, ब्‍वॉयज को ऐसा नहीं होना चाहिए. सड़क चलती लड़की को छेड़ना “कूल” नहीं है. लड़कों का मारपीट करना, हिंसा करना “कूल” नहीं है. मर्दानगी का ये आइडिया “कूल” नहीं है. मर्द ऐसे नहीं होते.

    मैं ये नहीं कह रही कि सारे मर्द ऐसे होते हैं. कि सारे मर्द सड़क चलते लड़कियों पर भद्दे कमेंट करते हैं, भीड़ का फायदा उठाकर छाती पर हाथ मारकर चले जाते हैं, उनकी पोर्न क्लिप बनाकर दोस्‍तों को भेजते हैं, एकांत में अपने पैंट की जिप खोलकर खड़े हो जाते हैं, बिस्‍तर पर जबर्दस्‍ती करते हैं, लड़की का “ना” नहीं सुनते, उनका पीछा करते हैं. लड़की को हासिल न कर पाएं तो उसके बारे में अफवाहें उड़ाते हैं. लड़की को सिर्फ एक सेक्‍स ऑब्‍जेक्‍ट की तरह देखते हैं, उसे हासिल करने के लिए अपने पद, पैसे, ताकत का इस्‍तेमाल करते हैं, इमोशनल झूठ बोलते हैं.

    नहीं, सारे मर्द ऐसा नहीं करते. सारे मर्द इनमें से सारे काम नहीं करते. लेकिन सारे मर्द ये जानते हैं कि मर्द ऐसा करते हैं, कि बहुत सारे मर्द ऐसा करते हैं. लेकिन बहुत कम मर्द इस बात को स्‍वीकार करते हैं कि हां, मर्द ऐसे होते हैं और ऐसा होना बिलकुल कूल नहीं है. सारे मर्द ये जानते हैं कि वो सामाजिक और ऐतिहासिक रूप से फायदे की स्थिति में हैं. सामाजिक मान्‍यताएं, मूल्‍य, विश्‍वास, सत्‍ता, पद, धन-बल सब उनके पक्ष में है. वो बहुत फायदे में हैं और वो उन फायदों का भरपूर फायदा भी उठाते हैं. लेकिन वो ये मानने को राजी नहीं कि वो फायदे में हैं. खासकर हिंदुस्‍तानी हिंदी समाज में तो बिलकुल भी नहीं.

    मीटू मूवमेंट पर कितने मर्दों ने औरतों के पक्ष में लेख लिखे? कितनी बार दफ्तर की मीटिंगों में पुरुषों ने आगे बढ़कर कहा कि “हां, हम प्रिवेलेज्‍ड हैं”, “हम शर्मिंदा हैं कि हम प्रिवेलेज्‍ड हैं.” कितनी बार कितने पुरुषों ने यह स्‍वीकार किया कि जाने-अनजाने उन्‍होंने भी अपने “मेल प्रिवेलेज” का फायदा उठाया है, कि रात में, अंधेरे में, सड़कों पर वो औरत के मुकाबले ज्‍यादा सुरक्षित हैं. कितनी बार कितने पुरुषों ने अपने ही पुरुष मित्र के सेक्सिस्‍ट जोक या तस्‍वीर भेजने पर उसे लताड़ा है. अपनी ही गर्लफ्रेंड की अंतरंग तस्‍वीर या मैसेज अपने दोस्‍तों से शेयर करने वाले अपने मर्द दोस्‍त को शर्मिंदा किया है.

    कोई नहीं करता. जो मर्द खुद ऐसा नहीं करते, वो भी ऐसा करने वाले अपने मर्द दोस्‍तों को आईना नहीं दिखाते. क्‍योंकि दिल के किसी ने किसी कोने में वो भी ये मानते हैं कि “Boys will be boys.”
    और यही सबसे बड़ी त्रासदी है.
    क्‍योंकि मर्द वो नहीं होता, जो रोता नहीं है. 
    मर्द वो होता है, जो रुलाता नहीं है.

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    Tags: Me Too, Patriarchy, Sexual Abuse, Sexual Harassment, Sexual violence, Trending news, Women, Women harassment, World, World news

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