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जानिए कौन थी महाश्वेता देवी, जिन्हें गूगल ने डूडल बनाकर किया है सलाम

News18Hindi
Updated: January 14, 2018, 10:03 AM IST
जानिए कौन थी महाश्वेता देवी, जिन्हें गूगल ने डूडल बनाकर किया है सलाम
महाश्वेता देवी
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Updated: January 14, 2018, 10:03 AM IST
लेखिका और एक्टिविस्ट महाश्वेता देवी की जयंती पर गूगल ने डूडल के जरिये सलाम किया है. 1926 में 14 जनवरी को बंग्लादेश की राजधानी ढाका में जन्मीं महाश्वेता देवी को गूगल ने डूडल के में साड़ी पहने कुछ लिखती नजर आ रही हैं. महाश्वेता ने लेखन के साथ महिलाओं, दलितों और आदिवासियों के अधिकारों के हक के लिए लड़ाईयां लड़ीं.

डूडल में लिखती नज़र आ रहीं महादेवी की तस्वीर ये बता रही है कि वे ना सिर्फ लेखनी में बल्कि पूरी जिंदगी समाज के हर तबके के लिए संघर्ष करती रहीं. वे मूल रूप से बांग्ला की लेखिका थीं. लेखक होने के अलावा वे सामाजिक कार्यकर्ता भी थीं. लेखन के साथ-साथ उन्होंने स्त्री अधिकारों, दलितों तथा आदिवासियों के हितों के लिए व्यवस्था से संघर्ष किया.

उनके लेखन के लिए 1996 में उन्हें देश के सर्वोच्च साहित्य सम्मान 'ज्ञानपीठ पुरस्कार' से सम्मानित किया गया. महाश्वेता के माता-पिता दोनों ही साहित्यकार थे. पिता मनीश घटक एक प्रसिद्ध कवि, लेखक और मां साहित्य की गंभीर अध्येता और समाज सेवा में रुचि रखती थीं.

भारत विभाजन के दौरान जब महाश्वेता देवी का परिवार पश्चिम बंगाल में आकर रहने लगा तो वे उस समय किशोरावस्था में ही थीं. उन्होंने 'विश्वभारती विश्वविद्यालय', शांतिनिकेतन से अंग्रेज़ी में बीए और फिर 'कलकत्ता विश्वविद्यालय' से अंग्रेज़ी में ही एम.ए. किया.

महाश्वेता देवी ने बतौर शिक्षक और पत्रकार के अपना करियर शुरू किया. महाश्वेता देवी ने कम उम्र में ही लिखना शुरू कर दिया था. शुरुआत में उन्होंने विभिन्न छोटी-बड़ी साहित्यिक पत्रिकाओं के लिए लघु कथाएं लिखीं. 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' ने महाश्वेता देवी के किशोर मन को बहुत उद्वेलित कर दिया था. उसके बाद 1943 में भीषण अकाल पड़ा, जिसमें उन्होंने राहत और सेवा कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. अकाल के बाद उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र ‘पीपुल्स वार’ और ‘जनयुद्ध’ की बिक्री भी की.

1947 में उनका विवाह प्रख्यात रंगकर्मी विजन भट्टाचार्य से हुआ. 1948 में उन्होंने बेटे नवारुण भट्टाचार्य को जन्म दिया. महाश्वेता देवी की पहली किताब ‘झांसी की रानी’ 1956 में आई. उसके बाद दूसरी पुस्तक ‘नटी’ 1957 में और फिर ‘जली थी अग्निशिखा’ आई. ये तीनों किताबें 1857 के महासंग्राम पर केंद्रित हैं. उनकी कुछ महत्त्वपूर्ण कृतियों में 'अग्निगर्भ', 'जंगल के दावेदार' और '1084 की मां', 'माहेश्वर' और 'ग्राम बांग्ला' आदि हैं.
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