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मरेंगे तो वहीं जा कर जहां पर ज़िंदगी है, पढ़ें कोरोना महामारी पर गुलजार की यह मार्मिक कविता

गुलजार की कोरोना महामारी पर कविता (Gulzar Poem On Coronavirus Pandemic) : मरेंगे तो वहीं जा कर जहां पर ज़िंदगी है, यहां तो जिस्म ला कर प्लग लगाए थे...

गुलजार की कोरोना महामारी पर कविता (Gulzar Poem On Coronavirus Pandemic) : मरेंगे तो वहीं जा कर जहां पर ज़िंदगी है, यहां तो जिस्म ला कर प्लग लगाए थे...

गुलजार की कोरोना महामारी पर कविता (Gulzar Poem On Coronavirus Pandemic) : मरेंगे तो वहीं जा कर जहां पर ज़िंदगी है, यहां ...अधिक पढ़ें

    गुलजार की कोरोना महामारी पर कविता (Gulzar Poem On Coronavirus Pandemic) : गुलजार साहब मशहूर गीतकार, लेखक और डायरेक्टर हैं. उनकी लिखी कई कविताएं और गीत बॉलीवुड की फिल्मों की जान हैं. गुलजार एक सम्वेधानशील कवि हैं और अक्सर ही सामाजिक मुद्दों पर कविताएं लिखते हैं और बेबाक राय रखने के लिए जाने जाते हैं. गुलजार की कविताओं में प्रेम, दर्द, कसक भरे कई एहसास होते हैं जोकि दिल छू लेते हैं. हाल ही में गुलजार ने कोरोना वायरस महामारी और लॉकडाउन से घबराकर घर लौटने वाले मजदूरों और लोगों की जिंदगी और भावनाओं को बड़े ही संजीदा ढंग से कविता के रूप में उकेरा है. आज हम गुलजार के फेसबुक पेज के साभार से आपके लिए लाए हैं गुलजार साहब की कविता महामारी लगी थी..

    महामारी लगी थी....

    महामारी लगी थी
    घरों को भाग लिए थे सभी मज़दूर, कारीगर.
    मशीनें बंद होने लग गई थीं शहर की सारी
    उन्हीं से हाथ पाओं चलते रहते थे
    वगर्ना ज़िन्दगी तो गाँव ही में बो के आए थे.

    वो एकड़ और दो एकड़ ज़मीं, और पांच एकड़
    कटाई और बुआई सब वहीं तो थी

    ज्वारी, धान, मक्की, बाजरे सब.
    वो बँटवारे, चचेरे और ममेरे भाइयों से
    फ़साद नाले पे, परनालों पे झगड़े
    लठैत अपने, कभी उनके.



    वो नानी, दादी और दादू के मुक़दमे.
    सगाई, शादियाँ, खलियान,
    सूखा, बाढ़, हर बार आसमाँ बरसे न बरसे.

    मरेंगे तो वहीं जा कर जहां पर ज़िंदगी है.
    यहाँ तो जिस्म ला कर प्लग लगाए थे !

    निकालें प्लग सभी ने,
    ‘ चलो अब घर चलें ‘ – और चल दिये सब,
    मरेंगे तो वहीं जा कर जहां पर ज़िंदगी है !

    – गुलज़ार

    Tags: Book, Corona Days, Corona epidemic, Lifestyle

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