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'अब ज़माने को ख़बर कर दो कि 'नीरज' गा रहा है'

आज गोपाल दास नीरज 93 वर्ष के हो गए.

आज गोपाल दास नीरज 93 वर्ष के हो गए.

आज गोपाल दास नीरज 93 वर्ष के हो गए.

    जो झुका है वह उठे अब सर उठाए,
    जो रुका है वह चले नभ चूम आए,
    जो लुटा है वह नए सपने सजाए,
    ज़ुल्म-शोषण को खुली देकर चुनौती,
    प्यार अब तलवार को बहला रहा है.
    अब ज़माने को ख़बर कर दो कि 'नीरज' गा रहा है.
    नीरज ऐसे कवि हैं जिनकी रचनाओं में कविता, कलम और क्रांति एक ही रेखा में मिलती नज़र आती है. एक गीतकार जो विद्रोही भी है, मृदुभाषी है और प्यार भी करता है. जो लोग गोपाल दास नीरज को सुनते आए हैं उन्हें पता है कि गोपाल दास नीरज के लिए श्रोताओं की दीवानग़ी क्या है. हिंदी कविता को ग्लैमराइज करने का जो काम हरिवंश राय बच्चन और गोपाल दास नीरज ने किया है वैसा काम उनसे पहले कोई न कर सका.

    नीरज की रचनाओं में बच्चन का प्रभाव कई बार झलका. एक बार का रोचक प्रसंग याद करते हुए नीरज एक इंटरव्यू में बताते हैं कि एक कवि सम्मेलन में वे बच्चन जी के साथ कविता पढ़ने जा रहे थे. आयोजक ने गाड़ी की व्यवस्था की थी, पर गाड़ी में नीरज के बैठने की व्यवस्था नहीं हो पाई. बच्चन जी ने कहा कि आओ नीरज तुम मेरी गोद में बैठ जाओ. नीरज ने तपाक से जवाब दिया कि आपकी ही गोद में तो बैठा हूं. उनके कहने का मतलब था कि गोपाल दास नीरज इसलिए गोपाल दास नीरज हैं कि बच्चन जी से उनकी रचनाएं प्रभावित हैं. हालांकि बाद में उन्होंने इतना मौलिक लिखा कि उनका क़द ख़ुद ही बढ़ने लगा. मंचो पर वे भी बच्चन जी की तरह ही लोकप्रिय होने लगे.
    हरिवंश राय बच्चन की एक कविता है, 'है अंधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है.' इसी कविता से प्रभावित नीरज की एक कविता है,
    रोशनी पूंजी नहीं है, जो तिजोरी में समाए
    वह खिलौना भी न, जिसका दाम हर गाहक लगाए,
    वह पसीने की हंसी है, वह शहीदों की उमर है
    जो नया सूरज उगाये जब तड़पकर तिलमिलाए,
    उग रही लौ को न टोको
    ज्योति के रथ को न रोको,
    यह सुबह का दूत हर तम को निगलकर ही रहेगा
    जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा.
    यह कविता बच्चन की कविता से प्रभावित होते हुए भी, इतनी मौलिक है कि इसमें नीरज की अलग विधा झलक जाती है.

    विज्ञापन, कविता, फ़िल्म और मंच, कौन सी जगह बची है जहां नीरज ने अपनी रचनाधर्मिता की छाप नहीं छोड़ी है. मंचो पर जो लोग उनके अंदाज़ की नकल भी उतार ले जाते हैं, उन्हें लोग जानने लग जाते हैं. जिस कवि को नीरज के साथ मंच साझा करने का मौक़ा मिल जाता है साहित्य जगत में उसकी कवि के रूप में स्वीकृति हो जाती है.

    गोपाल दास नीरज का जन्म 4 जनवरी 1925 को उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के पुरवली गांव में हुआ था. नीरज जीवन भर मस्त मौला रहे. अपनी शर्तों पर जीने वाले. मंचों पर जवान होते गोपाल दास नीरज की लोकप्रियता दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी. नीरज अपने करियर के शुरुआती दिनों में कविता के साथ-साथ अध्यापन भी करते थे. लेकिन उनकी कविता अध्यापन पर भारी पड़ती थी.

    1966 में रिलीज फ़िल्म नई उमर की नई फसल के लिए गोपाल दास नीरज़ ने कारवां गुज़र गया गीत लिखा. इस गीत से नीरज इतने लोकप्रिय हुए कि उन्हें बॉलीवुड से और ऑफ़र मिलने लगे. सत्तर के दशक की शुरुआत में ही गोपाल दास नीरज ने तीन फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड्स अपने नाम किए. 1970 में रिलीज फ़िल्म चंदा और बिजली का गीत, काल का पहिया घूमे रे भइया, 1971 में पहचान के लिए बस यही अपराध मैं हर बार करता हूं, 1972 में ए भाई! ज़रा देख के चलो के लिए इन्हें सर्वश्रेष्ठ गीतकार का अवार्ड भी मिला. हालांकि साहित्य में कुछ ऐसे व्यक्ति होते हैं जिनकी कृतियां पुरस्कार से ऊपर उठ चुकी होती हैं. नीरज उन्हीं में से एक हैं.

    गोपाल दास नीरज बॉलीवुड के पुराने ज़माने को याद करते हुए कहते हैं कि आज की फ़िल्मों में मेलोडी ग़ायब है. एक अख़बार को दिए गए इंटरव्यू में वे कहते हैं कि फ़िल्मों में फूहड़ता परोसी जा रही है. अब गीतों का क्लासिकल पहलू ग़ायब हो गया है. फ़िल्म जगत सब्जेक्ट के संकट से जूझ रहा है.


    1991 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया. इसी साल उन्हें साहित्य वाचस्पति की उपाधि से भी सम्मानित किया गया. 1994 में उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें यश भारती के पुरस्कार से सम्मानित किया. 1995 में डॉक्टर ऑफ़ लेटर्स का सम्मान इन्हें आगरा विश्वविद्यालय से मिला. उपाधियों से नीरज का गहरा रिश्ता रहा है.

    गीत सम्राट, गीत गंधर्व, गीत कौस्तुभ, गीत ऋषि जैसे न जाने कितने उपाधियों से उन्हें सम्मानित किया गया है. इसके अलावा नीरज देश-विदेश में सैकड़ों बार कविता सुनाने के लिए आमंत्रित किए गए है. छायावादी प्रभाव के गीतकारों में सबसे अधिक प्रभावी स्तंभ कवियों के बाद नीरज ही रहे हैं. उनकी कविताएं इतनी सरल और प्रभावी हैं कि सहज ही पाठकों को बांध लेती है.

    यह हवा यह रात, यह
    एकांत, यह रिमझिम घटाएं,
    यूं बरसती हैं कि पंडित
    मौलवी पथ भूल जाएं
    बिजलियों से मांग भर लो
    बादलों से संधि कर लो
    उम्र-भर आकाश में पानी ठहर पाता नहीं है।
    सेज पर साधें बिछा लो
    आंख में सपने सजा लो,
    प्यार का मौसम शुभे!
    हर रोज़ तो आता नहीं है.

    गोपाल दास नीरज को यूं ही गीत ऋषि नहीं कहा जाता. उन्होंने हिंदी साहित्य के उत्थान के लिए ख़ुद को तपाया है. हिंदी में उन्होंने उर्दू की ग़ज़ल के सापेक्ष गीतिका को इस तरह स्थापित किया कि ग़ज़ल और गीतिका में भेद कर पाना ही कठिन हो गया. ग़ज़ल उर्दू की विधा है. हिंदी ज़ुबान में उर्दू के शब्दों को बहर में बिठाया जाता है. बहर का अलग व्याकरण होता है. गोपाल दास नीरज ने उसी व्याकरण पर गीतिका की शुरुआत की. जिसके बाद ग़ज़ल और गीतिका में एक-दूसरे के संपूरक हो गए. जापानी कविता की विधा हाइकु में भी स्तरीय लेखन का काम गोपाल दास नीरज के लिखने के बाद ही शुरू हुआ. एक हाइकु देखिए-
    ओस की बूंद
    फूल पर सोई जो
    धूल में मिली.

    गोपाल दास नीरज अपने अलग मिज़ाज की वजह से बॉलीवुड में ज़्यादा दिन नहीं टिके. नई उमर की नई फसल, प्रेम पुजारी, मेरा नाम जोकर, तेरे मेरे सपने, कन्यादान, शर्मीली, गैंबलर, चंदा और बिजली, छुपा रुस्तम, फ़रेब, सेंसर, जाना न मुझसे दूर जैसी फ़िल्मों में गीत लिखने के बाद बॉलीवुड को छोड़ दिया. वजह यही थी कि संगीतकारों का गीतों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाना उन्हें कम पसंद था.

    मेरा कुर्ता सिला दुखों ने
    बदनामी ने काज निकाले,
    तुम जो आँचल ओढ़े उसमें
    नभ ने सब तारे जड़ डाले,
    मैं केवल पानी ही पानी तुम केवल मदिरा ही मदिरा
    मिट भी गया भेद तन का तो मन का हवन कहां पर होगा ?
    मैं पीड़ा का राजकुंवर हूं तुम शहज़ादी रूप नगर की
    हो भी गया प्यार हम में तो बोलो मिलन कहाँ पर होगा ?
    साहित्य और सिनेमा में रिश्ता भी तो कुछ इसी तरह का है. अभाव से वैभव अक्सर नाराज़ ही रहता है.

    गोपाल दास नीरज ने अब तक 17 से अधिक किताबें लिखीं हैं जिनमें दर्द दिया है, प्राण गीत, आसावरी, गीत जो गाए नहीं, कारवां गुज़र गया, बादलों से सलाम लेता हूं, चर्चित रहे. गोपाल दास नीरज के लिखे गीत इंसानियत से कुछ इस तरह ओत-प्रोत हैं कि उनमें परस्पर भाईचारे की अनुगूंज सुनाई देती है. साहित्यकार का काम समाज को चौकन्ना रखने का भी होता है. उन्होंने समाज को चौकन्रा भी किया. तभी तो उन्होंने लिखा-
    ऐ भाई! जरा देख के चलो, आगे ही नहीं पीछे भी.
    दायें ही नहीं बायें भी, ऊपर ही नहीं नीचे भी.
    ऐ भाई!
    इस गाने का इस्तेमाल कई बार विज्ञापनों में भी किया गया.

    हिंदी कविता के प्रसिद्ध कवि कुमार विश्वास उनके बारे में कहते हैं कि गोपाल दास नीरज पुरस्कारों से ऊपर उठ चुके हैं. अब उनके नाम पर पुरस्कार बांटने का समय आ गया है. नीरज हर मुद्दे पर बोलते रहे हैं. अभी जब लोग असहिष्णुता के मसले पर सम्मान लौटा रहे थे तब नीरज ने कहा था कि अदीबों का यों सियासत करना बेहद दुखद है. अदीब मतलब साहित्यकार होता है.

    आज गोपाल दास नीरज 93 वर्ष के हो गए. जीवन के इतने वसंत देखने के बाद भी उनका रुतबा कम नहीं हुआ है. लोग उन्हें मंचो पर बुलाने के लिए आज भी तरसते रहते हैं. उनका स्टारडम हमेशा क़ायम रहे..स्वास्थ्य सही रहे..हमारी यही कामना है...ज़माने को हमेशा ख़बर रहे कि नीरज गा रहा है..

    Tags: Hindi gazal

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