हरिशंकर परसाई के वो व्यंग्य जिन्होंने समाज को आयना दिखाया

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Updated: August 22, 2019, 4:39 PM IST
हरिशंकर परसाई के वो व्यंग्य जिन्होंने समाज को आयना दिखाया
सामाजिक विसंगतियो के प्रति गहरा सरोकार रखने वाला ही लेखक सच्चा व्यंगकार हो सकता है और परसाई ने इसे प्रमाणित कर के दिखाया

सामाजिक विसंगतियो के प्रति गहरा सरोकार रखने वाला ही लेखक सच्चा व्यंगकार हो सकता है और परसाई ने इसे प्रमाणित कर के दिखाया

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ये महीना हरिशंकर परसाई का है. इसी महीने में वो जन्में और इसी महीने में उनकी मृत्यु हो गई. परसाई के व्यंग्य समाज को जितना हंसाते थे उतना ही नंगा भी करते थे. हमारी खोखली राजनीतिक और सामाजिक तानेबाने को परसाई ने बहुत ही करीब से पकड़ा, उन्हें अपने शब्दों की जाल में फंसाया और फिर 'ठिठुरता गणतंत्र', 'आवारा भीड़ के खतरे', 'एक गोभक्त से भेंट' जैसी कालजयी व्यंग्यों की रचना की.

हरिशंकर परसाई का जन्म 22 अगस्त 1924 को मध्य प्रदेश के इटारसी के पास जमाली में हुआ. गांव से शुरुआती शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे नागपुर चले आए. 'नागपुर विश्वविद्यालय' से उन्होंने हिंदी में एम. ए किया और कुछ दिनों तक पढ़ाया. इसके बाद उन्होंने स्वतंत्र लेखन की शुरुआत की. उन्होंने जबलपुर से साहित्यिक पत्रिका 'वसुधा' का प्रकाशन भी किया, परंतु मुनाफा न होने के कारण इसे बंद करना पड़ा. परसाई कहते थे, 'सामाजिक अनुभव के बिना सच्चा और वास्तविक साहित्य लिखा ही नहीं जा सकता'. सामाजिक विसंगतियो के प्रति गहरा सरोकार रखने वाला ही लेखक सच्चा व्यंगकार हो सकता है और परसाई ने इसे प्रमाणित कर के दिखाया.

परसाई की रचनाओं को पढ़कर महसूस होता है कि हमारा समाज, जिसे आज हम क्रूर और उन्मादी का विशेषण देते हैं वह शायद पैदा ही इन विशेषणों के साथ हुआ था. वरना 28-30 साल पहले लिखी गई ये पंक्तियां आज भी इतनी प्रासंगिक कैसे हो सकती हैं.

पढ़िए परसाई के लिखे ऐसे ही कुछ व्यंगों को-

'अगर चाहते हो कि कोई तुम्हें हमेशा याद रखे, तो उसके दिल में प्यार पैदा करने का झंझट न उठाओ. उसका कोई स्केंडल मुट्ठी में रखो. वह सपने में भी प्रेमिका के बाद तुम्हारा चेहरा देखेगा.'

'सफेदी की आड़ में हम बूढ़े वह सब कर सकते हैं, जिसे करने की तुम जवानों की भी हिम्मत नहीं होती'

'इस कौम की आदी ताकत लड़कियों की शादी करने में जा रही है.'
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'बेइज्जती में अगर दूसरे को भी शामिल कर लो तो आदी इज्जत बच जाती है.'
'जो कौम भूखी मारे जाने पर सिनेमा में जाकर बैठ जाये, वह अपने दिन कैसे बदलेगी?'

'अमरीकी शासक हमले को सभ्यता का प्रसार कहते हैं. बम बरसते हैं तो मरने वाले सोचते हैं, सभ्यता बरस रही है'
'जनता जब आर्थिक न्याय की मांग करती है, तब उसे किसी दूसरी चीज में उलझा देना चाहिए, नहीं तो वह खतरनाक हो जाती है. जनता कहती है हमारी मांग है महंगाई बंद हो, मुनाफाखोरी बंद हो, वेतन बढ़े, शोषण बंद हो, तब हम उससे कहते हैं कि नहीं, तुम्हारी बुनियादी मांग गोरक्षा है. बच्चा, आर्थिक क्रांति की तरफ बढ़ती जनता को हम रास्ते में ही गाय के खूंटे से बांध देते हैं. यह आंदोलन जनता को उलझाए रखने के लिए है'

'स्वतंत्रता-दिवस भी तो भरी बरसात में होता है. अंग्रेज बहुत चालाक हैं. भरी बरसात में स्वतंत्र करके चले गए. उस कपटी प्रेमी की तरह भागे, जो प्रेमिका का छाता भी ले जाए. वह बेचारी भीगती बस-स्टैंड जाती है, तो उसे प्रेमी की नहीं, छाता-चोर की याद सताती है. स्वतंत्रता-दिवस भीगता है और गणतंत्र-दिवस ठिठुरता है'

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First published: August 22, 2019, 4:39 PM IST
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