पुण्यतिथि: हरिशंकर परसाई, जिनके व्यंग्य समाज को जितना हंसाते थे, उतना ही नंगा भी करते थे

हम आज भी उसी स्थिति को जी रहे हैं, जिसे परसाई ने जिया. हम आज भी उन्हीं मुद्दों पर लिख रहे हैं, जिन पर परसाई ने किताबें लिख डाली. हम लगातार उन्हीं मुद्दों और परिस्थितियों के दलदल में धंसते जा रहे हैं,जिनमें धंसकर परसाई दुनिया से चल बसे, वो भी आज ही के दिन यानी 10 अगस्त,. लेकिन वो साल 1995 का था

Prerana Kumari | News18Hindi
Updated: August 10, 2019, 1:25 PM IST
पुण्यतिथि: हरिशंकर परसाई, जिनके व्यंग्य समाज को जितना हंसाते थे, उतना ही नंगा भी करते थे
परसाई की रचनाओं को पढ़कर महसूस होता है कि हमारा समाज, जिसे आज हम क्रूर और उन्मादी का विशेषण देते हैं वह शायद पैदा ही इन विशेषणों के साथ हुई थी
Prerana Kumari | News18Hindi
Updated: August 10, 2019, 1:25 PM IST
'मैं देख रहा हूं कि नई पीढ़ी अपने ऊपर की पीढ़ी से ज्यादा जड़ और दकियानूसी हो गई है. दिशाहीन, बेकार, हताश, नकारवादी, विध्वंसवादी बेकार युवकों की यह भीड़ खतरनाक होती है. इसका प्रयोग महत्वकांक्षी खतरनाक विचारधारा वाले व्यक्ति और समूह कर सकते हैं. इस भीड़ का उपयोग नेपोलियन, हिटलर और मुसोलिनी ने किया था. यह भीड़ धार्मिक उन्मादियों के पीछे चलने लगती है. यह भीड़ किसी भी ऐसे संगठन के साथ हो सकती है जो उनमें उन्माद और तनाव पैदा कर दे. फिर इस भीड़ से विध्वंसक काम कराए जा सकते हैं. यह भीड़ फासिस्टों का हथियार बन सकती है. हमारे देश में यह भीड़ बढ़ रही है. इसका उपयोग भी हो रहा है. आगे इस भीड़ का उपयोग सारे राष्ट्रीय और मानव मूल्यों के विनाश के लिए, लोकतंत्र के नाश के लिए करवाया जा सकता है'

इन पंक्तियों को पढ़कर कौन कह सकता है कि इन्हें 28 साल पहले लिखा गया. और इसे लिखने वाले हिंदी साहित्य के सबसे लोकप्रिय व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई थे. आमतौर पर एक व्यंग्यकार की कलम से ऐसे तीखे और चाबुक सरीक नुकीले शब्द कहां निकलते हैं. पर परसाई ने व्यंग्य को मनोरंजन की परंपरागत परिधि से उबारकर समाज के जरूरी और व्यापक प्रश्नों से जोड़ा. उनके व्यंग्य समाज को जितना हंसाते थे उतना ही नंगा भी करते थे. हमारी खोखली राजनीतिक और सामाजिक तानेबाने को परसाई ने बहुत ही करीब से पकड़ा, उन्हें अपने शब्दों की जाल में फंसाया और फिर 'ठिठुरता गणतंत्र', 'आवारा भीड़ के खतरे', 'एक गोभक्त से भेंट' जैसी कालजयी व्यंग्यों की रचना की.

'जनता जब आर्थिक न्याय की मांग करती है, तब उसे किसी दूसरी चीज में उलझा देना चाहिए, नहीं तो वह खतरनाक हो जाती है. जनता कहती है हमारी मांग है महंगाई बंद हो, मुनाफाखोरी बंद हो, वेतन बढ़े, शोषण बंद हो, तब हम उससे कहते हैं कि नहीं, तुम्हारी बुनियादी मांग गोरक्षा है. बच्चा, आर्थिक क्रांति की तरफ बढ़ती जनता को हम रास्ते में ही गाय के खूंटे से बांध देते हैं. यह आंदोलन जनता को उलझाए रखने के लिए है' - एक गोभक्त से भेंट

'स्वतंत्रता-दिवस भी तो भरी बरसात में होता है. अंग्रेज बहुत चालाक हैं. भरी बरसात में स्वतंत्र करके चले गए. उस कपटी प्रेमी की तरह भागे, जो प्रेमिका का छाता भी ले जाए. वह बेचारी भीगती बस-स्टैंड जाती है, तो उसे प्रेमी की नहीं, छाता-चोर की याद सताती है. स्वतंत्रता-दिवस भीगता है और गणतंत्र-दिवस ठिठुरता है' - ठिठुरता लोकतंत्र

परसाई की रचनाओं को पढ़कर महसूस होता है कि हमारा समाज, जिसे आज हम क्रूर और उन्मादी का विशेषण देते हैं वह शायद पैदा ही इन विशेषणों के साथ हुआ था. वरना 28-30 साल पहले लिखी गई ये पंक्तियां आज भी इतनी प्रासंगिक कैसे हो सकती हैं. आज भले ही हम ये कहते फिरते हैं कि इस सरकार में अल्पसंख्यक, दलित डर के साये में जी रहे हैं, लेकिन असलियत तो यह है कि समाज का यह तबका कब डर के साये में नहीं जी रहा था?  हम आज भी उसी स्थिति को जी रहे हैं, जिसे परसाई ने जिया. हम आज भी उन्हीं मुद्दों पर लिख रहे हैं, जिन पर परसाई ने किताबें लिख डाली. हम लगातार उन्हीं मुद्दों और परिस्थितियों के दलदल में धंसते जा रहे हैं,जिनमें धंसकर परसाई दुनिया से चल बसे, वो भी आज ही के दिन यानी 10 अगस्त. लेकिन वो साल 1995 का था.



जीवन परिचय
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हरिशंकर परसाई का जन्म 22 अगस्त 1924 को मध्य प्रदेश के इटारसी के पास जमाली में हुआ. गांव से शुरुआती शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे नागपुर चले आए. 'नागपुर विश्वविद्यालय' से उन्होंने हिंदी में एम. ए किया और कुछ दिनों तक पढ़ाया. इसके बाद उन्होंने स्वतंत्र लेखन की शुरुआत की. उन्होंने जबलपुर से साहित्यिक पत्रिका 'वसुधा' का प्रकाशन भी किया, परंतु मुनाफा न होने के कारण इसे बंद करना पड़ा. परसाई कहते थे, 'सामाजिक अनुभव के बिना सच्चा और वास्तविक साहित्य लिखा ही नहीं जा सकता'. सामाजिक विसंगतियो के प्रति गहरा सरोकार रखने वाला ही लेखक सच्चा व्यंगकार हो सकता है और परसाई ने इसे प्रमाणित कर के दिखाया.

परसाई की कुछ मशहूर रचनाएं

कहानीसंग्रह - हँसते हैं रोते हैं, जैसे उनके दिन फिरे, भोलाराम का जीव

उपन्यास- रानी नागफनी की कहानी, तट की खोज, ज्वाला और जल

मशहूर निबंध संग्रह- 'तब की बात और थी', 'भूत के पांव पीछे', 'बेईमानी की परत', 'पगडंडियों का जमाना', 'सदाचार का ताबीज', 'वैष्णव की फिसलन', 'विकलांग श्रद्धा का दौर', 'माटी कहे कुम्हार से', 'शिकायत मुझे भी है' और अन्त में, 'हम इक उम्र से वाकिफ हैं' शामिल हैं

देश का ये गलाफाड़ विकास असल में कितना गूंगा है, ये आपको परसाई की रचनाओं से रूबरू होकर ही पता चलेगा. परसाई हमारे समाज के लिए एक प्रकाश पुंज हैं, जिसकी रोशनी में इसका क्रूर स्वरूप साफ-साफ देखा जा सकता है.

जाते-जाते परसाई की कलम से लोकतंत्र में 'जनता' की परिभाषा जान लीजिए

लोकतंत्र की वो परिभाषा तो आपके जुबान पर अभी भी आसीन होगी- वो तंत्र जिसमें 'जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा शासन' स्थापित किया जाता है, उसे लोकतंत्र कहते हैं. लेकिन जनता की परिभाषा कौन बताता है. परसाई कहते हैं 'जनता कच्चा माल है. इससे पक्का माल विधायक, मंत्री आदि बनते हैं, पक्का माल बनने के लिए कच्चे माल को मिटना ही पड़ता है' 

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First published: August 10, 2019, 12:31 PM IST
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