आज है भाद्र मास की हरतालिका तीज, जानें तीज के नियम, पूजा विधि और कथा

हरतालिका तीज का व्रत भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया को किया जाता है. इस साल यह 12 सितंबर को है.

News18Hindi
Updated: September 12, 2018, 7:16 AM IST
आज है भाद्र मास की हरतालिका तीज, जानें तीज के नियम, पूजा विधि और कथा
प्रतीकात्मक तस्वीर
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Updated: September 12, 2018, 7:16 AM IST
हरतालिका तीज हिंदू धर्म के बड़े व्रतों में से एक है. सुहागिनों के महापर्व के रूप में प्रचलित हरतालिका तीज भाद्रपद, शुक्ल पक्ष की तृतीया के दिन मनाया जाता है. इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए निर्जला और निराहार व्रत करती हैं. कहा जाता है कुवांरी लड़कियां अगर यह व्रत करें तो उन्हें भगवान शिव जैसा पति मिलता है.

इस दिन शिव-पार्वती की पूजा होती है. माना जाता है कि माता पार्वती और शिव अपनी पूजा करने वाली सभी सुहागिनों को अटल सुहाग का वरदान देते हैं.

इस दिन नदी किनारे की रेत से शंकर-पार्वती बनाए जाते हैं. उनके ऊपर फूलों का मंडप सजाया जाता है. यह निर्जल व्रत है, जिसमें व्रत करने वाली महिलाएं बिना कुछ खाए-पिए व्रत रहती हैं. दूसरे दिन सुबह नदी में शिवलिंग और पूजन सामग्री का विसर्जन करने के साथ यह व्रत पूरा होता है.

हरितालिका तीज के नियम

यह व्रत निर्जला किया जाता है. यानी कि एक पूरा दिन और अगली सुबह सूर्योदय तक महिलाएं जल ग्रहण नहीं कर सकती है. माना जाता है कि इस व्रत को जब भी कोई लड़की या महिला एक बार शुरू कर देती है, तो हर साल उसे पूरे नियमों के साथ ये व्रत रखना पड़ता है. इसे बीच में छोड़ नहीं सकती.

इस व्रत में महिलाएं नए कपड़े पहनकर संवरती हैं और सोलह श्रृंगार करती हैं और कई सारी महिलाएं एक साथ मिलकर रातभर पूजा और भजन करती हैं.

जिस घर में इस व्रत की पूजा की जाती है, वहां इसका खंडन नहीं किया जाता.  एक बार घर में पूजा शुरू हो जाए तो उस घर में हर साल व्रत की पूजा पूरे विधि-विधान से होती है.
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पूजन विधि
हरितालिका तीज में पूजन के लिए काली मिट्टी से शिव, पार्वती और गणेश की प्रतिमा बनाई जाती है. उसके बाद फुलेरा बनाकर उसे सजाया जाता है और इसके अंदर चौकी रखकर उसपर रंगोली बनाई जाती है.  रंगोली पर केले के पत्ते रखकर शिव, पार्वती की प्रतिमा रखी जाती है. इसके बाद कलश की हल्दी और कुमकुम के साथ गणेश की प्रतिमा की पूजा की जाती है.इसके बाद शिव और गोरी की पूजा करके संपूर्ण श्रृंगार किया जाता है और हरितालिका तीज की व्रत कथा का पढ़ी जाती है.

पूजा की कथा
एक बार देवी पार्वती ने हिमालय पर कठोर तप किया. वे शिव जी को मन ही मन अपना पति मान चुकी थीं. उनसे शादी करना चाहती थीं. उनके पिता व्रत का उद्देश्य नहीं जानते थे और बेटी के कष्ट से दुखी थे. नारद मुनि ने आकर गिरिराज से कहा कि आपकी बेटी के कठोर तप से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु उनसे विवाह करना चाहते हैं. उनकी बात सुनकर पार्वती के पिता ने अपनी सहमति दे दी. उधर, नारद मुनि ने भगवान विष्णु से जाकर कहा कि गिरिराज अपनी बेटी का विवाह आपसे करना चाहते हैं. विष्णु ने विवाह के लिए सहमति दी.

गिरिराज ने पुत्री को बताया उनका विवाह विष्णु के साथ तय कर दिया गया है. उनकी बात सुनकर पार्वती विलाप करने लगीं. फिर अपनी सहेली को बताया की वे तो शिवजी को अपना पति मान चुकी हैं और उनके पिता उनका विवाह श्री विष्णु से तय कर चुके हैं. पार्वती ने अपनी सखी से कहा कि वह उनकी सहायता करे, उन्हें किसी गोपनीय स्थान पर छुपा दे अन्यथा वे अपने प्राण त्याग देंगी. पार्वती की बात मान कर सखी उनका हरण कर घने वन में ले गई और एक गुफा में उन्हें छुपा दिया. वहां एकांतवास में पार्वती ने और भी अधिक कठोरता से भगवान शिव का ध्यान करना प्रारंभ कर दिया. पार्वती ने रेत का शिवलिंग बनाया इसी बीच भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया को हस्त नक्षत्र में पार्वती ने रेत का शिवलिंग बनाया और निर्जला, निराहार रहकर, रात्रि जागरण कर व्रत किया.

उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने दर्शन देकर वरदान मांगने को कहा. पार्वती ने उन्हें अपने पति रूप में मांग लिया. शिव जी वरदान देकर वापस कैलाश पर्वत चले गए. इसके बाद पार्वती जी अपने गोपनीय स्थान से बाहर निकलीं. पिता बेटी के घर से चले जाने के बाद से बहुत दुखी थे. वे भगवान विष्णु को विवाह का वचन दे चुके थे और उनकी बेटी ही घर में नहीं थी. चारों ओर पार्वती की खोज चल रही थी. पार्वती ने व्रत संपन्न होने के बाद समस्त पूजन सामग्री और शिवलिंग को गंगा नदी में प्रवाहित किया और अपनी सखी के साथ व्रत का पारण किया. तभी गिरिराज उन्हें खोजते हुए वहां पहुंच गए. उन्होंने पार्वती से घर त्यागने का कारण पूछा. पार्वती ने बताया कि मैं शिवजी को अपना पति स्वीकार चुकी हूं. शिवजी से मेरा विवाह करेंगे, तो मैं घर चलूंगी. पिता ने पार्वती का हठ स्वीकार कर धूमधाम से उनका विवाह शिवजी के साथ कराया.

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