क्या आपको भी घर से बाहर निकलने में डर लगता है? कहीं एगोराफोबिया तो नहीं

क्या आपको भी घर से बाहर निकलने में डर लगता है? कहीं एगोराफोबिया तो नहीं
(फोटो साभार: pexels/Nandhu Kumar)

एगोराफोबिया (Agoraphobia) के विकास में जैविक और मनोवैज्ञानिक दोनों ही कारण शामिल हैं. ज्यादातर लोगों में एक या एक से अधिक पैनिक अटैक के बाद यह विकसित होता है, जिससे उन्हें एक और पैनिक अटैक होने की चिंता होती है और उन जगहों से बचना पड़ता है, जहां यह फिर से हो सकता है.

  • Last Updated: August 6, 2020, 6:34 AM IST
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घर से बाहर निकलना एगोराफोबिया से ग्रसित लोगों के लिए एक भयानक अनुभव हो सकता है. इन्हें लोगों के बीच सुरक्षित महसूस करने में दिक्कत होती है. कोरोनो वायरस महामारी के दौरान अधिकांश लोग घर के अंदर ही रह रहे हैं लेकिन यह एगोराफोबिया के समान नहीं है. एक एंग्जाइटी डिसऑर्डर के रूप में एगोराफोबिया पैनिक अटैक्स की शुरुआत कर सकता है और दैनिक जीवन पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है. यह जानना जरूरी है कि आखिरी एगोराफोबिया क्या है और इसके क्या लक्षण हैं? साथ ही कैसे पता करें कि क्या व्यक्ति इससे पीड़ित है और उपचार के लिए क्या कर सकते हैं?

एगोराफोबिया क्या है?



एगोराफोबिया एक ऐसी जगह या स्थिति में होने का एक बड़ा डर है, जहां व्यक्ति को लगता है कि बचना मुश्किल होगा या जहां वह एक पैनिक अटैक के बारे में चिंतित है. myUpchar से जुड़े एम्स के डॉ. उमर अफरोज का कहना है कि किसी चीज या जगह से कभी-कभी डरना या उसे लेकर चिंतित होना आम बात होती है लेकिन जब डर की वजह से व्यक्ति घर से बाहर निकलने, बाहरी दुनिया में जाना या किसी विशेष स्थान पर जाना बंद कर देते हैं तो यह एगोराफोबिया के लक्षण हो सकते हैं.
द डायग्नोस्टिक एंड स्टैटिस्टिकल मैनुअल ऑफ मेंटल डिसऑर्डर के हालिया वर्जन के अनुसार, वह स्थान और परिस्थितियां जो अक्सर एंग्जाइटी को ट्रिगर करती हैं :

  • सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करना

  • खुले स्थानों में होना

  • दुकानों या सिनेमाघरों जैसी जगहों में होना

  • लाइन में खड़ा होना या भीड़ में होना

  • घर के बाहर अकेले रहना
    एंग्जाइटी डिसऑर्डर वाले लोग लगातार खुद की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहते हैं और उन्हें हर समय पैनिक अटैक का डर रहता है. कुछ लोग खुद का एक तरीका, एक जगह या एक घेरा विकसित कर लेते हैं और अपने इस खुद के बनाए सुरक्षा घेरे से बाहर निकलना उनके लिए मुश्किल होता है.


इन लक्षणों को नजर अंदाज न करें

मुख्य लक्षण है कि यदि व्यक्ति का घर से बाहर निकलने में डर महसूस करें या किसी विशेष स्थान के बारे में सोचने या वहां जाने पर चिंता व तनाव महसूस करें. अन्य लक्षणों में शरीर का कांपना, सांस लेने में परेशानी, दिल की धड़कन तेज होना, ज्यादा पसीना आना, चक्कर आना, जी मिचलाना, दस्त लगना, पैनिक या एंग्जाइटी अटैक का डर शामिल हैं.

इन कारणों से होते हैं एगोराफोबिया के शिकार

एगोराफोबिया के विकास में जैविक और मनोवैज्ञानिक दोनों ही कारण शामिल हैं. ज्यादातर लोगों में एक या एक से अधिक पैनिक अटैक के बाद यह विकसित होता है, जिससे उन्हें एक और पैनिक अटैक होने की चिंता होती है और उन जगहों से बचना पड़ता है, जहां यह फिर से हो सकता है. कुछ विशेषज्ञों के मुताबिक भीड़ से डर लगने का कारण है कि मस्तिष्क का जो क्षेत्र डर को नियंत्रित करता है, उससे संबंधित किसी प्रकार की समस्या होती है, तब एगोराफोबिया होता है. हालांकि, अन्य कारकों में अवसाद, कभी शारीरिक या यौन उत्पीड़न का शिकार होना, कुछ अन्य प्रकार के एंग्जाइटी डिसऑर्डर जैसे ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर हो या फिर सोशल फोबिया शामिल हैं.

ऐसे होता है इलाज

एगोराफोबिया का इलाज करने के सर्वोत्तम तरीकों में जीवनशैली में बदलाव, उपचारों और कुछ दवाओं का संयोजन शामिल हैं.

ब्रीदिंग और रिलैक्सेशन एक्सरसाइज : धीमी, गहरी सांस लेना वेगस नर्व को उत्तेजित कर सकता है, जो तब पैरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम को सक्रिय करेगा और शांत महसूस करने में मदद करेगा. पैनिक अटैक होने की स्थिति में यह एक सबसे अच्छे तरीकों में से एक है.

मेडिटेशन : मेडिटेशन शरीर और उसके आसपास मौजूद माहौल में पूरी तरह से मौजूद होने की गुणवत्ता में सुधार करते है, तनाव को कम कर सकता है और अनिश्चितता या नियंत्रण की कमी की भावनाओं को दूर करने में मदद कर सकता है.

डाइट और एक्सरसाइज : उन पदार्थों से बचें जो चिंता को बढ़ा सकते हैं जैसे शराब, नशीली दवाओं का इस्तेमाल और अत्यधिक कैफीन का सेवन. साथ ही अस्वस्थ खाद्य पदार्थों जैसे प्रोसेस्ड मीट, सोडा के सेवन से बचें. नियमित व्यायाम भी तनाव को कम करने में मदद करता है और कुछ लोगों को एंग्जाइटी डिसऑर्डर का प्रबंधन करने में मदद करता है.

दवाएं : ऐसी कई दवाएं हैं जो डॉक्टर एगोराफोबिया के इलाज के लिए दे सकते हैं. छोटे बच्चों को ज्यादातर मामलों में एंटीडिप्रेसेन्ट्स और एंटी एंग्जाइटी दवाएं दी जाती है. कम डोज के साथ शुरुआत करते हैं जो कि सेरोटोनिन नाम के केमिकल को धीरे-धीरे मस्तिष्क में बढ़ा देती हैं. myUpchar से जुड़े एम्स के डॉ. अनुराग शाही का कहना है कि सेरोटोनिन मूड को अच्छा करने में मदद करने वाला हार्मोन है. जब इसका मस्तिष्क में स्तर बढ़ जाता है तो व्यक्ति को अच्छा महसूस होता है. (अधिक जानकारी के लिए हमारा आर्टिकल, फोबिया क्या है, इसके लक्षण, कारण, इलाज और दवा पढ़ें।) (न्यूज18 पर स्वास्थ्य संबंधी लेख myUpchar.com द्वारा लिखे जाते हैं। सत्यापित स्वास्थ्य संबंधी खबरों के लिए myUpchar देश का सबसे पहला और बड़ा स्त्रोत है। myUpchar में शोधकर्ता और पत्रकार, डॉक्टरों के साथ मिलकर आपके लिए स्वास्थ्य से जुड़ी सभी जानकारियां लेकर आते हैं।)

अस्वीकरण : इस लेख में दी गयी जानकारी कुछ खास स्वास्थ्य स्थितियों और उनके संभावित उपचार के संबंध में शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए है। यह किसी योग्य और लाइसेंस प्राप्त चिकित्सक द्वारा दी जाने वाली स्वास्थ्य सेवा, जांच, निदान और इलाज का विकल्प नहीं है। यदि आप, आपका बच्चा या कोई करीबी ऐसी किसी स्वास्थ्य समस्या का सामना कर रहा है, जिसके बारे में यहां बताया गया है तो जल्द से जल्द डॉक्टर से संपर्क करें। यहां पर दी गयी जानकारी का उपयोग किसी भी स्वास्थ्य संबंधी समस्या या बीमारी के निदान या उपचार के लिए बिना विशेषज्ञ की सलाह के ना करें। यदि आप ऐसा करते हैं तो ऐसी स्थिति में आपको होने वाले किसी भी तरह से संभावित नुकसान के लिए ना तो myUpchar और ना ही News18 जिम्मेदार होगा।

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