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Online Class & Health: पढ़ाई के लिए नाकाफी साबित होती ऑनलाइन क्‍लासेज क्‍या बच्‍चों को बना रही हैं बीमार?

Online Class & Health: पढ़ाई के लिए नाकाफी साबित होती ऑनलाइन क्‍लासेज क्‍या बच्‍चों को बना रही हैं बीमार?

ऑनलाइन क्‍लास की वजह से बच्‍चों का स्‍क्रीन टाइम बहुत अधिक हो गया. जिसकी वजह से बहुत साने बच्‍चों को आई साइट विजुअल की प्रॉब्‍लम हो गई. लगातार स्‍क्रीन की तरफ देखने या लगातार जूम क्‍लासेज अटैंड करने के बाद बच्‍चों में एग्‍जर्सन और फटिग की समस्‍या देखी जा रही है.

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Sehat Ki Baat: इस बात से शायद ही किसी को इंकार नहीं होगा कि ऑनलाइन क्‍लासेज बच्‍चों की पढ़ाई के लिए न केवल नाकाफी हैं, बल्कि उसका नकारात्‍मक असर हमारे बच्‍चों के दिमाग पर पड़ने लगा है. अब तक, बच्‍चे चंद घंटे स्‍कूल में रहकर जो सीखते थे, उसका दस फीसदी ज्ञान बच्‍चों को ऑनलाइन क्‍लासेज के जरिए नहीं मिल पा रहा है. ऑनलाइन क्‍लासेज किस तरह हमारे बच्‍चों को मानसिक और शारीरिक तौर पर बीमार बना रही हैं, इन सवालों का जवाब जानने के लिए हमने बात की मैक्स स्मार्ट सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल की वरिष्‍ठ बाल मनोचिकित्‍सक डॉ.कोमल मंशानी से.

डॉ. कोमल मंशानी के अनुसार, दुनिया में कोई भी चीज ऐसी नहीं है, जिसके फायदे और नुकसान न हों. इसी तरह, ऑनलाइन क्‍लासेज के भी अपने फायदे और नुकसान हैं. कोरोना महामारी के हाताल में जिस तरह की परिस्थितियां हमारे सामने थी, उन परिस्थि‍तियों में ऑनलाइन क्‍लासेज का इकलौता विकल्‍प ही हमारे सामने बचा था. ऑनलाइन क्‍लासेज की बदौलत बच्‍चों की पढ़ाई का शेड्यूल बना और हम स्थिरता की तरफ बढ़े. ऑनलाइन क्‍लासेज का एक फायदा यह भी रहा कि हायर स्‍टडीज करने वाले बच्‍चों को अपना स्‍पेस मिला. ऑनलाइन क्‍लासेज ने ही बच्‍चों को अपनी स्‍पीड के अनुसार अलग-अलग स्‍टाइल से पढ़ाई करने का मौका दिया.

एकेडमिक तक सीमित नहीं है स्‍कूल की पढ़ाई
वरिष्ठ बाल मनोचिकित्सक डॉ. कोमल मनशानी के अनुसार, स्कूल में पढ़ाई के दो महत्वपूर्ण पहलू हैं, पहला शैक्षणिक और सामाजिक पहलू. ऑनलाइन पढ़ाई शैक्षणिक पहलू तक सीमित हो जाती है, जबकि स्‍कूल में सामाजिक पहलू को बड़ी गंभीरता से पढ़ाया जाता है. स्‍कूल में बच्‍चा अपने हमउम्र बच्‍चों के साथ बातचीत के साथ-साथ टीचर्स से बातचीत करना सीखता है. स्‍कूल बच्‍चों को ग्रूम करता है कि कैसे रहना चाहिए, कैसे बात करनी चाहिए, कैसे बैठना है वगैरह. बच्‍चों को सिखाया जाता है कि पियर इंटरेक्शन कैसे करना है, बाउंड्रीज क्‍या होती हैं, किससे कितनी बात करनी चाहिए. एक दूसरे से कैसे कॉपरेट करना चाहिए, एक दूसरे की कैसे हेल्‍प करनी चाहिए आदि. यह सारे कॉन्‍टेंट ऑनलाइन क्‍लासेज प्रोवाइड नहीं कर पाई. चाहे अकादमिक में बच्‍चा मोटिवेट होकर पढ़ भी ले पर ऑनलाइन क्‍लास यह सब्‍सटीट्यूट नहीं कर सकते हैं.

ऑनलाइन फ्रीडम को संभाल नहीं पाए बच्‍चे
वरिष्‍ठ बाल मनोचिकित्‍सक डॉ.कोमल मंशानी के अनुसार, ऑनलाइन क्‍लासेज में मिली फ्रीडम को बच्‍चे अच्‍छी तरह से संभाल नहीं पाए. दरअसल, मोटिवेशन और सेल्फ डिसिप्लिन ऑनलाइन क्‍लासेज की पहली शर्त होती है. आजकल ज्‍यादातर पैरेंट्स की शिकायत होती है कि उनका बच्‍चा ऑनलाइन क्‍लासेज के दौरान कैमरा ऑफ कर खेलने लगता है या वह बहुत अधिक लेथार्जिक रहता है. इस तरह की सभी समस्‍याओं के सिर्फ एक ही कारण है और वह है मोटिवेशन और सेल्फ डिसिप्लिन की कमी. इसी वजह से बच्‍चों का ध्‍यान क्‍लास एक्टिविटी से हटने लगता है और धीरे धीरे वे पढ़ाई के प्रति अपनी रुचि खोते जाते हैं.

शारीरिक और मानसिक रूप से देखी गईं ये समस्‍याएं
डॉ.कोमल मंशानी के अनुसार, ऑनलाइन क्‍लास की वजह से बच्‍चों का स्‍क्रीन टाइम बहुत अधिक हो गया. जिसकी वजह से बहुत साने बच्‍चों को आई साइट विजुअल की प्रॉब्‍लम हो गई. लगातार स्‍क्रीन की तरफ देखने या लगातार जूम क्‍लासेज अटैंड करने के बाद बच्‍चों में एग्‍जर्सन और फटिग की समस्‍या देखी जा रही है. बहुत से बच्‍चे पीठ में दर्द की शिकायत लेकर आ रहे हैं. इसके अलावा, माउस या की-पैड के लगातार इस्‍तेमाल से आर्म रि‍लेटेड समस्‍या देखी जा रही हैं. इन सब का असर बच्‍चों को न केवल शारीरिक रूप से, बल्कि मानसिक रूप से भी झेलना पड़ रहा है. नतीजतन बच्‍चों में निराशा (फ्रस्‍टेशन) और बेचैनी की की समस्‍या सामान्‍य होती जा रही है.

Tags: Health tips, Online classes, Sehat ki baat

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