होम /न्यूज /जीवन शैली /स्टडी का दावा- अल्जाइमर का पता लगाने के लिए ब्‍लड टेस्‍ट सबसे अच्‍छा तरीका

स्टडी का दावा- अल्जाइमर का पता लगाने के लिए ब्‍लड टेस्‍ट सबसे अच्‍छा तरीका

नई स्टडी अमेरिका के विस्कॉन्सिन रजिस्ट्री फॉर अल्जाइमर प्रिवेंशन के एक स्वतंत्र समूह ने की है. (.Image : Canva)

नई स्टडी अमेरिका के विस्कॉन्सिन रजिस्ट्री फॉर अल्जाइमर प्रिवेंशन के एक स्वतंत्र समूह ने की है. (.Image : Canva)

अल्जाइमर रोग 'भूलने का रोग' है. इस बीमारी में इंसान को याददाश्त की कमी होना, निर्णय न ले पाना, बोलने में दिक्कत आना है ...अधिक पढ़ें

हाइलाइट्स

अल्‍जाइमर के लक्षण दिखने से पहले ही इसकी पहचान और इलाज किया जा सकेगा.
आमतौर पर 60 साल की उम्र के बाद अल्‍जाइमर डिजीज के लक्षण लोगों में दिखाई देते हैं.

Blood Tests Are Best At Detecting Alzheimer’s Disease : अल्‍जाइमर डिजीज पहचानने का सबसे अच्‍छा तरीका ब्‍लड टेस्‍ट को माना जा रहा है.  ब्‍लड टेस्‍ट की मदद से अल्‍जाइमर को शुरुआती स्‍टेज में ही पहचानने में मदद मिलेगी. यही नहीं, एक अन्‍य ब्‍लड टेस्‍ट की मदद से रिलिवेंट ट्रिटमेंट के असर का भी पता लगाया जा सकेगा. इस बात का खुलासा नेचर मेडिसिन में छपे एक नए शोध में किया गया है. ANI की रिपोर्ट के मुताबिक मरीज में अल्‍जाइमर के लक्षण नहीं दिखने पर भी फॉस्‍फो-टीएयू 231 और एबी 42/40 जैसे मल्टिपल बायोमार्कर की मदद से अल्‍जाइमर्स डिजीज पैथोलॉजी की पहचान शुरुआती स्‍टेज में जा सकती है. यह स्टडी यूएसए, विस्कॉन्सिन रजिस्ट्री फॉर अल्जाइमर प्रिवेंशन (WRAP) के एक ग्रुप ने की थी.

ये भी पढ़ें: सर्दियों के मौसम में कई बीमारियों का इलाज है लहसुन, जानें इसके फायदे

क्‍या कहते हैं शोधकर्ता?
गोथेनबर्ग विश्वविद्यालय के शोधकर्ता डॉ. निकोलस एश्टन ने बताया कि अल्‍जाइमर रोग की पहचान और बीमारी के बढ़ने की प्रगति पर नजर रखने के लिए ये ब्‍लड टेस्‍ट बेस्‍ट विकल्‍प हो सकता है. इसके क्लिनिकल ट्रायल का भी अलग अलग रोल हो सकता है. उन्‍होंने बताया कि इस शोध में पता चला है कि अल्‍जाइमर का पता लगाने के लिए फॉस्फो-टीएयू217 को विशिष्ट रूप से क्लिनिकल सेटिंग और ट्रायल सेटिंग, दोनों में रोगियों की निगरानी के लिए एक बेहतरीन परीक्षण के रूप में इस्‍तेमाल किया जा सकता है.

क्‍या है अल्‍जाइमर की बीमारी?
अल्जाइमर रोग ‘भूलने का रोग’ है. इस बीमारी के लक्षणों में याददाश्त की कमी होना, निर्णय न ले पाना, बोलने में दिक्कत आना है. इसकी वजह से सामाजिक और पारिवारिक समस्याओं की गंभीर स्थितियों से मरीज गुजरने लगता है. आमतौर 60 वर्ष की उम्र के आसपास होने वाली इस बीमारी का फिलहाल कोई स्थायी इलाज नहीं है. इसे सिर्फ दवाइयों के जरिए कंट्रोल किया जा सकता है. इलाज के जरिए इस बीमारी की रफ्तार को कम किया जा सकता है.

Tags: Health, Lifestyle, Mental health, Trending news

विज्ञापन

टॉप स्टोरीज

अधिक पढ़ें