इलेक्ट्रोफिजियोलॉजी: ईवीएस टेस्ट के लिए इन बातों का जरूर रखें ख्याल

इलेक्ट्रोफिजियोलॉजी: ईवीएस टेस्ट के लिए इन बातों का जरूर रखें ख्याल
हृदय की जांच के लिए पीठ, छाती और पैरों पर पैड लगाए जाते हैं. इसके बाद ब्लड प्रेशर की जांच की जाती है.

हृदय रोग (Heart Disease) के अंतर्गत आने वाले रोगों में रक्त वाहिका रोग जैसे कोरोनरी धमनी रोग, धड़कनो में होने वाली समस्या आदि शामिल हैं.

  • Myupchar
  • Last Updated : November 20, 2020, 7:12 am IST
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    इलेक्ट्रोफिजियोलॉजी टेस्ट (ईवीएस) एक प्रकार की जांच प्रक्रिया है, जिसमें हृदय (Heart) की विद्युत प्रणाली की जांच की जाती है. इसमें यह पता लगाया जाता है कि व्यक्ति बेहोशी या थकान क्यों महसूस कर रहा है. इसके अतिरिक्त मरीज के दिल की धड़कन तेज क्यों है. यह टेस्ट एंजियाग्राफी से थोड़ा अलग है. myUpchar के अनुसार, हृदय रोग के अंतर्गत आने वाले रोगों में रक्त वाहिका रोग जैसे कोरोनरी धमनी रोग, धड़कनो में होने वाली समस्या आदि शामिल हैं. आइए जानते हैं इस टेस्ट के बारे में और इसे करवाते समय किन बातों की सावधानियां रखनी चाहिए.

    ऐसे किया जाता है इलेक्ट्रोफिजियोलॉजी टेस्ट



    जिस दिन जांच के लिए बुलाया जाता है, उसके एक दिन पहले आधी रात से कुछ खाने-पीने के लिए मना किया जाता है. जांच करने से पहले पेट खाली होना जरूरी होता है, अन्यथा रिपोर्ट प्रभावित हो सकती है.

    यदि आप किसी तरह की दवाई ले रहे हैं तो इस बारे में डॉक्टर से पता करें कि क्या जांच के दिन सुबह आप दवाई ले सकते हैं या नहीं. वैसे ज्यादातर मामलों में दवाई को कुछ घूंट पानी के साथ लिया जा सकता है, लेकिन ध्यान रहे शरीर में ज्यादा पानी की मात्रा नहीं जाना चाहिए.

    जांच के समय बाजू में आईवी लगाई जाती है, जिसके द्वारा व्यक्ति को रिलैक्स करने के लिए कुछ दवाएं दी जाती हैं. जांच के दौरान मरीज कुछ घबराहट महसूस कर सकता है इसलिए उनके बीपी को संतुलित करने के लिए भी दवाएं दी जाती हैं.

    हृदय की जांच के लिए पीठ, छाती और पैरों पर पैड लगाए जाते हैं. इसके बाद ब्लड प्रेशर की जांच की जाती है. इलेक्ट्रोफिजियोलॉजी टेस्ट के दौरान बीपी नियंत्रित होना बेहद जरूरी है. यदि जांच के समय बीपी अनियंत्रित होता है तो ऐसे में गंभीर समस्या हो सकती है और जांच रोकने भी पड़ सकती है.

    डॉक्टर बाजू में एनेस्थीसिया का इंजेक्शन देकर हाथो को सुन्न कर देते हैं, इस प्रक्रिया में हल्की सी चुभन महसूस होगी, लेकिन बहुत ज्यादा पीड़ा नहीं होगी. इसके बाद रक्त नली में एक मुलायम व पतली सी ट्यूब डालकर हृदय तक पहुंचाई जाएगी. इस ट्यूब को कैथीटर कहते हैं, जिसमें आगे की तरफ कैमरा लगा होता है, जिसकी मदद से स्क्रीन पर हृदय को साफ देखा जा सकता है. डॉक्टर इन तस्वीरों के माध्यम से दिल की गतिविधियों का अवलोकन करते हैं.

    इसके बाद कुछ तार इस ट्यूब के माध्यम से अंदर डाली जाती है, जिससे पीठ में दर्द महसूस हो सकता है. इसमें व्यक्ति दिल की धड़कनों की फड़फड़ाहट भी महसूस कर सकता है. जांच के दौरान डॉक्टर लगातार स्क्रीन पर देखते हैं. इसमें दिल के नसों से लेकर सारी स्थितियों का पता लग जाता है. जांच हो जाने के बाद ट्यूब हटा ली जाती है.

    जांच के बाद रखें खास ख्याल

    जांच के बाद डॉक्टर द्वारा कम से कम 8 घंटे के आराम के लिए कहा जाता है. इस दौरान हिलना डुलना व उठना मना होता है.

    जांच के बाद कुछ जरूरी दवाइयां दी जाती हैं और इस दौरान खाने-पीने में कोई मनाही नहीं होती है.

    जांच के बाद कोशिश करें कि अकेले घर न जाकर, अपने मित्र या परिवार के किसी सदस्य के साथ घर जाना चाहिए.

    myUpchar के अनुसार, हृदय को स्वस्थ्य रखने का सबसे सही तरीका है जीवनशैली में बदलाव. जो लोग ऐसा कर पाते हैं, वे हृदय संबंधी समस्याओं और सर्जरी से दूर रहते हैं.अधिक जानकारी के लिए हमारा आर्टिकल, हृदय रोग पढ़ें.न्यूज18 पर स्वास्थ्य संबंधी लेख myUpchar.com द्वारा लिखे जाते हैं. सत्यापित स्वास्थ्य संबंधी खबरों के लिए myUpchar देश का सबसे पहला और बड़ा स्त्रोत है. myUpchar में शोधकर्ता और पत्रकार, डॉक्टरों के साथ मिलकर आपके लिए स्वास्थ्य से जुड़ी सभी जानकारियां लेकर आते हैं.