इश्क का कोई मैनुअल नहीं होता, जिसे पढ़कर कायदे सीख सकें

इश्क का कोई मैनुअल नहीं होता, जिसे पढ़कर कायदे सीख सकें
ग़म-ए-इश्क में जितना नमक है, ग़म-ए-दिहाड़ी उतनी ही फीकी मालूम होती है.

ग़म-ए-इश्क में जितना नमक है, ग़म-ए-दिहाड़ी उतनी ही फीकी मालूम होती है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 13, 2017, 4:16 PM IST
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ग़म-ए-इश्क में जितना नमक है, ग़म-ए-दिहाड़ी उतनी ही फीकी मालूम होती है. आयताकार हॉल में सम-तापमान पर चलता एसी और जमे हुए चेहरे बरबस उस धूपधुली सुबह की याद दिलाते हैं, जो प्रेमी के साथ बिताई थी. तब दो-टकिया नौकरी को लानतें भेजी जाती हैं, प्रेम के साथ खतो-खिताबत होती है. इन सबके बावजूद अगर तुलना करें तो काम कुछ कम ग्लैमरस होकर भी प्यार से कहीं ज्यादा नर्म और मानवीय है.

आप तमाम उम्र उस प्रेम के साथ नहीं बिता सकते, जो गुस्से में भड़ाक से मुंह पर दरवाजा बंद कर दे. काम से प्यार कर सकने की और भी कई वाजिब वजहें हों सकती हैं...

मेरी पहली नौकरी के शुरुआती दिन थे. घिसी हुई जींस या कतरी हुई स्कर्ट, सुबह जागने पर जो हाथ आए, वही पहनकर निकल पड़ती. बॉस की कुर्सी का रंग बहुत पसंद आया तो एकाध बार उसकी भी सवारी की. सबने देखा तो लेकिन किसी ने टोका नहीं और फिर मैंने ऐसा कई बार किया.




थोड़े दिनों बाद इंडक्शन प्रोग्राम में नियम बताते हुए एचआर ने मेरा नाम लिया. नई-नकोरी थी लिहाजा किसी उपलब्धि के लिए तो नाम पुकारा नहीं जा रहा था. ध्यान से सुना तो वे मेरी उसी बेअदबी का जिक्र कर रहे थे.

हनीमून फेज़ बीत चुका था लेकिन अब मैं जानती थी कि मुझे कैसे रहना है और क्या पहनकर जाना है. प्यार के साथ ये लग्ज़री नहीं मिलती. वहां कोई प्यार के नियम-कायदों का मैनुअल नहीं देता कि आप घर पर आराम से पढ़कर आएं और उसके ही अनुसार प्यार करें.

दफ्तर में आपसे ‘जैसे आप हैं’, वैसा ही रहने की उम्मीद नहीं की जाती है. सुनने में ये थोड़ा नकली लगता है लेकिन यही मिलावट हमें आधा दिन दफ्तर में बिताने लायक माहौल देती है. कल्पना करें कि आपका बॉस आपसे नाराज होकर आपके मुंह पर थूक दे, या फिर कुलीग कपड़ों से कॉलर उखाड़कर रख दे. प्रेमी के साथ क्या हम यही नहीं होते!



प्यार करते हुए आप एकदम निष्कवच होते हैं. अंदाजा लगाना होता है कि उसे क्या पसंद आएगा. अनकहे को समझना ऐसी दुधारी तलवार है, जिसमें पैर हर हाल में चोटिल होंगे. इसके ठीक उलट, दफ्तर में पैरों के पास रखी डस्टबिन भी बदलवानी हो तो ई-मेल करना या कहना होता है- यहां कोई अनकहे को समझने की कोशिश या दिखावा भी नहीं करता. ऐसे ही दफ्तर के फीडबैक भी, इश्क की उम्मीदों से कहीं ज्यादा ईमानदार और बिना लाग-लपेट होते हैं.

नहाकर तौलिए को बिस्तर पर सुला देना हो या फिर चपर-पचर की आवाज करते हुए बात करना- प्यार हमें इतना अमानवीय बना देता है कि हम चाहते हैं कि कोई हमें इन बुरी आदतों के साथ भी खूब-खूब चाहे. काम की जगह पर परफॉर्मेंस या कई दूसरे कारणों के आधार पर आपसे प्यार कम या ज्यादा हो सकता है.

गणित के सवाल करने की बजाए सेल्युलर जेल में वक्त काटना पसंद करते हों तो भी एक बार सोचें. कोई भी काम इश्क में खुश रहने से ज्यादा मुश्किल नहीं.
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