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गठिया और ऑटोइम्यून बीमारियों का कारण बन सकता है वायु प्रदूषण- स्टडी

प्रदूषण के कणों के संपर्क को पहले ही स्ट्रोक, ब्रेन कैंसर, गर्भपात और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जोड़ा जा चुका है. (फोटो-canva)

प्रदूषण के कणों के संपर्क को पहले ही स्ट्रोक, ब्रेन कैंसर, गर्भपात और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जोड़ा जा चुका है. (फोटो-canva)

Air pollution linked to autoimmune diseases: इटली की यूनिवर्सिटी ऑफ वेरोना (University of Verona) के रिसर्चर्स ने पाया है कि वायु प्रदूषण (Air pollution) के कारण रूमेटोइड गठिया (rheumatoid arthritis) हो सकती है. वहीं वायु प्रदुषण के कारण क्रॉन्स और अल्सरेटिव कोलाइटिस (Crohn’s and ulcerative colitis) जैसे सूजन आंत्र रोग (inflammatory bowel disease) का खतरा 20% अधिक हो जाता है, तो वहीं ल्यूपस (lupus) जैसे कनेक्टिव टिशू डिजीज का 15% ज्यादा खतरा हो जाता है.

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Air pollution linked to autoimmune diseases: वायु प्रदूषण के साइड इफेक्ट्स कई तरह से सामने आते रहे हैं. अब एक नई स्टडी में सामने आया है कि वायु प्रदूषण के लंबे समय तक संपर्क में रहने से ऑटोइम्यून बीमारी का खतरा बढ़ सकता है. आपको बता दें कि प्रदूषण के कणों के संपर्क को पहले ही स्ट्रोक, ब्रेन कैंसर, गर्भपात और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जोड़ा जा चुका है. 2019 में प्रकाशित एक वैश्विक समीक्षा (Global) ने निष्कर्ष निकाला कि शरीर की लगभग हर कोशिका (Cell) गंदी हवा से प्रभावित हो सकती है. अब इटली की यूनिवर्सिटी ऑफ वेरोना (University of Verona) के रिसर्चर्स ने पाया है कि वायु प्रदूषण (Air pollution) के हाई लेवल का लंबे समय तक संपर्क रूमेटोइड गठिया (rheumatoid arthritis) के लगभग 40% अधिक जोखिम से जुड़ा है.

वायु प्रदुषण के कारण क्रॉन्स और अल्सरेटिव कोलाइटिस ( Crohn’s and ulcerative colitis) जैसे सूजन आंत्र रोग (inflammatory bowel disease) का खतरा 20% अधिक हो जाता है, तो वहीं ल्यूपस (lupus) जैसे कनेक्टिव टिशू डिजीज का 15% ज्यादा खतरा हो जाता है. इस स्टडी का निष्कर्ष ‘आरएमडी ओपन (RMD Open)’ जर्नल में प्रकाशित किया गया है. आपको बता दें कि ऑटोइम्यून डिजीज में रुमेटाइड गठिया, मल्टीपल स्केलेरोसिस और ल्यूपस के सबसे आम रूप के साथ-साथ अल्सरेटिव कोलाइटिस जैसे इंफ्लेमेंट्री बॉवेल डिजीज शामिल हैं.

कैसे हुई स्टडी
इस स्टडी के लिए रिसर्चर्स ने नेशनल इटैलियन फ्रैक्चर रिस्क डेटाबेस से 81 हजार 363 लोगों की मेडिकल सूचनाएं हासिल की. ये आंकड़ें 3500 से अधिक डॉक्टरों ने जून 2016 से नवंबर 2020 के बीच उपलब्ध कराए. इसअवधि के दौरान लगभग 12% को ऑटोइम्यून बीमारी का पता चला था. स्टडी में प्रत्येक रोगी को उनके आवासीय पोस्टकोड के माध्यम से निकटतम वायु गुणवत्ता निगरानी स्टेशन से जोड़ा गया था.

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रिसर्चर्स ने इस दौरान खासतौर से पर्टिकुलर मैटर यानी पीएम 10 और पीएम 2.5 के दुष्प्रभावों का आकलन करना चाहते थे. ह्यूम हेल्थ के लिए पीएम 10 के लेवल 30 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और पीएम 2.5 के लेवल 20 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर को हाानिकारक माना गया है. प्रतिभागियों में 2016 से 2020 के बीच 9723 यानी करीब 12% लोगों में ऑटोइम्यून डिजीज की पहचान हुई. 2013 से 2019 के बीच पीएम 2.5 का एवरेज लॉन्ग टर्म लेवल 16 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और पीएम 10 का लेवल 25 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रहा.

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स्टडी में क्या निकला
विश्लेषण में पाया गया कि पीएम 2.5 का ऑटोइम्यून डिजीज के रिस्क के बढ़ने से कोई खास लिंक नहीं था, लेकिन पीएम 10 का लेवल प्रति 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर बढ़ने से रिस्क 7% तक बढ़ जाता है. रिसर्चर्स ने पाया कि लंबे समय तक पीएम 10 का लेवल ज्यादा होने का लिंक गठिया जबकि पीएम 2.5 का ज्यादा लेवल गठिया के साथ ही पेट में सूजन या जलन से भी था.

Tags: Air pollution, Health, Health News, Lifestyle

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