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अल्जाइमर का पता लगने से सोशल एक्टिविटी में आती है कमी, इस पर ध्यान देना भी जरूरी - स्टडी

अल्जाइमर का पता लगने के बाद पीड़ित व्यक्ति का सोशल नेटवर्क और सपोर्ट बढ़ता नहीं है. (फोटो-Shutterstock.com)

अल्जाइमर का पता लगने के बाद पीड़ित व्यक्ति का सोशल नेटवर्क और सपोर्ट बढ़ता नहीं है. (फोटो-Shutterstock.com)

एक स्टडी में ये बात सामने आई है कि अल्जाइमर और उससे जुड़ी डिमेंशिया को सार्वजनिक स्वास्थ्य की दृष्टि से प्राथमिकता के तौर पर लिया जाना चाहिए, क्योंकि उसका असर परिवार और समाज पर भी अहम होता है.

आमतौर पर बुढ़ापे में होने वाले भूलने बीमारी अल्जाइमर (Alzheimer) और डिमेंशिया (Dementia) के बारे में वैसे तो ये माना जाता है कि इनका समय से पता लगाना ही मुश्किल होता है, लेकिन अमेरिका की रटगर्स यूनिवर्सिटी (Rutgers University) में की गई एक स्टडी में बताया गया है कि इनके डायग्नोसिस हो जाने के भी अनजाने में निगेटिव इफेक्ट्स होते हैं. इससे सामाजिक गतिविधियों में कमी आती है. इस स्टडी का निष्कर्ष डिमेंशिया एंड कॉग्निटिव जेरीएट्रिक डिसऑर्डर जर्नल में प्रकाशित  हुआ है. इस स्टडी के जरिए इस बात का पता लगाया गया कि अल्जाइमर और उससे जुड़ी डिमेंशिया का सोशल नेटवर्क, जुड़ाव और सपोर्ट पर क्या इफेक्ट पड़ता है.

रटगर्स यूनिवर्सिटी-नेवार्क के डिपार्टमेंट ऑफ सोशल वर्क में असिस्टेंट प्रोफेसर और इस स्टडी के मेन राइटर ताकाशी अमानो (Takashi Amano) ने बताया कि अल्जाइमर और उससे जुड़ी डिमेंशिया को सार्वजनिक स्वास्थ्य की दृष्टि से प्राथमिकता के तौर पर लिया जाना चाहिए. क्योंकि उसका असर परिवार और समाज पर भी अहम होता है. ताकाशी अमानो (Takashi Amano) ने बताया कि हाल के वर्षों में विशेषज्ञों का जोर इस बात पर रहा है कि इस रोग की पहचान जितनी जल्दी हो सके, उतना ही अच्छा होगा, ताकि लॉन्गटर्म इलाज की योजना बनाई जा सके और उसका लाभ मिले. लेकिन, जल्द डायग्नोसिस के यदि फायदे हैं, तो उसके नकारात्मक प्रभाव भी हो सकते हैं, जिससे कि आत्महत्या जैसे जोखिम बढ़ सकते हैं.

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स्टडी में पाया गया कि अल्जाइमर का पता लगने के बाद पीड़ित व्यक्ति का सोशल नेटवर्क और सपोर्ट बढ़ता नहीं है. यह स्थिति खासतौर पर गरीबों के लिए ज्यादा मुसीबत पैदा करती है. इस स्टडी के मुताबिक, अल्जाइमर का डायग्नोसिस होने के बाद पीड़ितों का फोन पर बात करने का समय तथा आमने-सामने का संपर्क कम हो गया. इसके अलावा खेल और सामाजिक गतिविधियों में भी शामिल होने में कमी आई है. बता दें कि अल्जाइमर या डिमेंशिया एक मानसिक विकार (Mental Disorders) है, जिसमें विस्मृति (forgetfulness) के कारण निर्णय लेने में कठिनाई होती है.

स्टडी का स्वरूप
रिसर्चर्स ने नेशनल लेवल किए गए हेल्थ एंड रिटायरमेंट स्टडी के डाटा का इस्तेमाल किया, जिसमें 51 साल और उससे अधिक उम्र के लोगों को शामिल किया गया था. उसके बाद उन्हें 2012, 2014 और 2016 में ट्रैक किया गया. 2014 में जिन लोगों में इस रोग की पहचान हुई, और जिनमें पहचान नहीं हुई, दो साल बाद उनकी गतिविधियों का तुलनात्मक अध्ययन किया गया. इसके निष्कर्ष में पाया गया कि जिन लोगों में अल्जाइमर और उससे संबंधित डिमेंशिया की पहचान हुई थी, उनका सामाजिक संबंध अनजाने में ही प्रभावित हुआ.

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रिसर्चर्स का सुझाव
रिसर्चर्स का कहना है कि इलाज करने वाले डॉक्टर्स और नीति निर्माताओं को डायग्नोसिस के दुष्प्रभावों से भी अवगत रहना चाहिए और उसके निदान की रणनीति पर भी विचार करना चाहिए. इसका रास्ता भी निकाला जाना चाहिए कि किस प्रकार से पीड़ित व्यक्तियों का सामाजिक दायरा या नेटवर्क बढ़ाया जाए. स्टडी के को-राइटर एडम रेनॉल्ड्स (Addam Reynolds) ने बताया कि सामाजिक संबंध हमारे जीवन की गुणवत्ता का एक आवश्यक तत्व है, इसलिए इलाज के साथ ही इस बात पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि पीड़ित व्यक्ति क्वालिटी ऑफ लाइफ को कायम रख सके या उसमें सुधार ला सके.

Tags: Health, Health News, Lifestyle

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