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'डिजिटल नशे' और अवसाद से बचने के लिए रखें डोपामाइन फास्ट- एक्सपर्ट

'डिजिटल नशे' और अवसाद से बचने के लिए रखें डोपामाइन फास्ट- एक्सपर्ट

डोपामाइन फास्ट में वीडियो गेम और तमाम स्क्रीन से दूर रहना होता है. (प्रतीकात्मक फोटो- shutterstock)

डोपामाइन फास्ट में वीडियो गेम और तमाम स्क्रीन से दूर रहना होता है. (प्रतीकात्मक फोटो- shutterstock)

Break Digital Addiction : डोपामाइन (Dopamine) दिमाग में बनने वाला केमिकल है, जो न्यूरोट्रांसमीटर के तौर पर काम करता है. ये खुशी और रिवार्ड की भावनाओं के साथ जुड़ा होता है. इसकी अधिकता भी नुकसानदायक है.

  • News18Hindi
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    Dopamine Fast: आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में हमारे जो सबसे करीब होता है, वो कोई इंसान नहीं, बल्कि हमारा स्मार्टफोन और वर्चुअल वर्ल्ड है. हम सोते-जागते, चलते-फिरते, खाते और यहां तक की रिलैक्स करते समय भी उसी दुनिया का चक्कर लगा रहे होते हैं. कुछ लोगों का मानना है कि इससे हमें खुशी मिलती है. बता दें कि हमारी बॉडी में कुछ ऐसे हॉर्मोंस होते हैं, जो हमें खुश और सकारात्‍मक रखने के लिए जिम्‍मेदार होते हैं. सरल भाषा में कहें तो डोपामाइन (Dopamine) एक ऐसा कैमिकल मैसेंजर है जो दिमाग (Brain) को कई अच्‍छी चीजें करने के लिए मोटिवेट करता है. हालांकि, जानकार इसकी अधिकता को भी खतरनाक बताते हैं.

    दैनिक भास्कर में छपी रिपोर्ट में स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की सायकाइट्रिस्ट एना लेम्बके (Anna Lembke) का कहना है, ‘डोपामाइन (Dopamine) दिमाग में बनने वाला केमिकल है, जो न्यूरोट्रांसमीटर के तौर पर काम करता है. ये खुशी और रिवार्ड की भावनाओं के साथ जुड़ा होता है.’ वो कहती हैं कि जब हम कोई खुशी मिलने वाला काम करते हैं, तो दिमाग थोड़ा डोपामाइन छोड़ता है और हमें अच्छा लगता है पर यह अहसास थोड़ी ही देर रहता है और इसके बाद हैंगओवर की फीलिंग आती है. तो दिमाग फिर से वही काम करने के लिए प्रेरित करता है, कुछ देर इंतजार कर लिया तो यह फीलिंग खत्म हो जाती है.

    क्यों परेशान हैं युवा?
    डॉ. लेम्बके ने आगे बताया कि उन्होंने अपने करियर में टेंशन और डिप्रेशन से ग्रस्त कई पेशेंट्स को देखा है. ये सब अच्छा परिवार, बेहतर शिक्षा, हेल्दी शरीर और सही आर्थिक स्थिति होने के बावजूद परेशान हैं. उनकी समस्या सामाजिक अव्यवस्था और गरीबी नहीं, बल्कि डोपामाइन की अधिकता है.

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    डॉ. लेम्बके ने इसका उदाहरण एक घटना का जिक्र करते हुए दिया, ‘हाल ही में मुझसे एक युवा इलाज कराने आया. उसकी उम्र करीब 20 साल रही होगी. वो टेंशन-डिप्रेशन और कमजोरी से जूझ रहा था. कॉलेज की पढ़ाई छोड़ने के बाद वह अपने माता-पिता के साथ ही रहता लेकिन फिर भी रह-रहकर उसके मन में खुदकुशी के ख्याल आते थे. उसका ज्यादातर वक्त वीडियो गेम खेलने में बीतता. दो दशक पहले ऐसे मरीजों को मैं एंटीडिप्रेसेंट (Antidepressants) यानी डिप्रेशन में दी जाने वाली प्रमुख दवा देती थी, पर इस युवा को मैंने महीनेभर तक वीडियो गेम और तमाम स्क्रीन से दूर रहने यानी डोपामाइन फास्ट (व्रत) की सलाह दी. ’

    डिजिटल नशे से बचने सफल होंगे तो…
    एक्सपर्ट्स बताते हैं कि हमारे दिमाग ने लाखों वर्षों में इस संतुलन को व्यवस्थित किया है. खतरा उस वक्त भी था पर आज डिजिटल नशे (Digital addictions) की लंबी लिस्ट है. टेक्स्टिंग, मैसेजिंग, सर्फिंग, ऑनलाइन शॉपिंग, गैंबलिंग और गेमिंग आदि इसमें शामिल हैं.

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    इन सभी डिजिटल उत्पादों को नशे की लत की तरह डिजाइन किया गया है. रोशनी का माहौल, सेलेब्रिटी की बातें और एक क्लिक पर इनामों की झड़ी हमें खींच ही लेती है. डॉ. लेम्बके बताती हैं, ‘हर कोई गेम नहीं खेलता पर स्मार्टफोन सबके पास है. फोन का कम इस्तेमाल करना बेहद मुश्किल है.’

    Tags: Depression, Health, Health News

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