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सोशल मीडिया फीड्स की तरह, हमारे ब्रेन को भी अपडेट होने में थोड़ा टाइम लगता है - स्टडी

सोशल मीडिया फीड्स की तरह, हमारे ब्रेन को भी अपडेट होने में थोड़ा टाइम लगता है - स्टडी

रिसर्चर का कहना है कि हमारा ब्रेन एक टाइम मशीन की तरह है. ये हमें समय के पीछे भेजने का काम करता रहता है. (प्रतीकात्मक फोटो-shutterstock.com)

रिसर्चर का कहना है कि हमारा ब्रेन एक टाइम मशीन की तरह है. ये हमें समय के पीछे भेजने का काम करता रहता है. (प्रतीकात्मक फोटो-shutterstock.com)

The brain also updates itself : अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया बरकेले (UC Berkeley) के साइंटिस्टों द्वारा की गई इस स्टडी से हमारे ब्रेन में उभरने वाली तस्वीरों का सतत तारतम्य (continuous harmony) बनने और उसके स्थायित्व के बारे में और जानकारी हासिल की जा सकती है. यूसी बर्कले में साइकोलॉजी, न्यूरोसाइंस एंड विजन साइंस के प्रोफेसर और इस स्टडी के सीनियर राइटर डेविड विटनी (David Whitney) ने बताया कि अगर हमारा ब्रेन रियल टाइम अपडेट करने लगे तो ये दुनिया छाया (Shadow), प्रकाश (light) और गतिशीलता (movement ) के उतार-चढ़ाव की दृष्टि से हमेशा संभ्रम (hallucinating) की स्थिति का अहसास करने वाली होगी.

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The brain also updates itself : एक नई स्टडी में पाया गया है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की तरह ही हमारा ब्रेन भी लगातार समृद्ध और दृश्यात्मक उत्तेजनाओं (visual stimuli) को अपलोड करता रहता है. इसी कारण हम रियल टाइम में नवीनतम इमेज देखने के बजाय पुराने इमेज देखते हैं, क्योंकि हमारा ब्रेन करीब 15 सेकंड में रिफ्रेश होता है. अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया बरकेले (UC Berkeley) के साइंटिस्टों द्वारा की गई इस स्टडी से हमारे ब्रेन में उभरने वाली तस्वीरों का सतत तारतम्य (continuous harmony) बनने और उसके स्थायित्व के बारे में और जानकारी हासिल की जा सकती है.

यूसी बर्कले में साइकोलॉजी, न्यूरोसाइंस एंड विजन साइंस के प्रोफेसर और इस स्टडी के सीनियर राइटर डेविड विटनी (David Whitney) ने बताया कि अगर हमारा ब्रेन रियल टाइम अपडेट करने लगे तो ये दुनिया छाया (Shadow), प्रकाश (light) और गतिशीलता (movement ) के उतार-चढ़ाव की दृष्टि से हमेशा संभ्रम (hallucinating) की स्थित का अहसास करने वाली होगी. इस स्टडी का निष्कर्ष साइंस एडवांसेज (Science Advances) जर्नल में प्रकाशित हुआ है.

क्या कहते हैं जानकार
इस स्टडी के मेन राइटर और स्कॉटलैंड के एबरडीन यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान के असिस्टेंट प्रोफेसर और यूसी बर्कले (UC Berkeley) में व्हिटनी लैब (Whitney’s lab) में पोस्टडॉक्टरल फेलो माउरो मनासी (Mauro Manass) ने कहा कि हमारा ब्रेन एक टाइम मशीन की तरह है. ये हमें समय के पीछे भेजने का काम करता रहता है. ये ऐसा है, जैसे हमारे पास एक ऐप है, जो हर 15 सेकंड में हमारे विजुअल इनपुट को एक इंप्रेशन में समेकित करता है ताकि हम रोजमर्रा की जिंदगी को संभाल सकें.

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कैसे हुई स्टडी 
रिसर्चर्स ने इसके लिए उस मैकेनिज्म के आधार पर प्रयोग किए जैसा कि सिनेमा में एक्टर और उनके डबल स्टंट करने वाले के बीच लोगों को आमतौर पर अंतर समझ नहीं आता है. रिसर्च के लिए 100 प्रतिभागियों को शामिल किया गया. उन्हें उनकी उम्र और लिंग के आधार पर चेहरों में बदलाव करके 30 सेकंड के टाइम लैप्स में वीडियो दिखाए गए.

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वीडियो के इमेज में सिर या चेहरे के बाल नहीं दिखाए गए, बल्कि सिर्फ आंख, नाक, ठुड्डी , मुंह और गला दिखाए गए ताकि उन्हें कुछ अनुमान मिल सकें. इसके बाद जब उन्हें चेहरों को पहचानने को कहा गया तो अधिकांश प्रतिभागियों ने उसी फ्रेम को पकड़ा, जो उन्होंने आधे वीडियो में देखा था. न कि फाइनल को, जो कि उनके ब्रेन में अपडेट इमेज था. विटनी ने मुताबिक, इसके आधार पर कोई ये कह सकता है कि हमारा ब्रेन देर से काम करता है.

Tags: Brain, Health, Health News, Lifestyle

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