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स्टैटिन ड्रग्स लेने वाले बुजुर्गों में कम होता है पार्किंसन रोग का खतरा, स्टडी का दावा

स्टैटिन ड्रग्स का इस्तेमाल ब्लड कोलेस्ट्रॉल कम करने, धमनियों में मैल की परत जमने से बचाव और धमनियों को सख्त होने से रोकने के लिए किया जाता है. (फोटो-canva.com)

स्टैटिन ड्रग्स का इस्तेमाल ब्लड कोलेस्ट्रॉल कम करने, धमनियों में मैल की परत जमने से बचाव और धमनियों को सख्त होने से रोकने के लिए किया जाता है. (फोटो-canva.com)

Using statins have lower risk of developing Parkinson's : अमेरिकन एकेडमी ऑफ न्यूरोलॉजी के रिसर्चर्स की अगुआई में हुई एक अहम स्टडी में पाया गया है कि जो बुजुर्ग स्टैटिन ड्रग्स (Statin Drugs) का सेवन करते हैं, उनमें इनका सेवन नहीं करने वालों की तुलना में पार्किसंस रोग होने का खतरा कम होता है.

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Using statins have lower risk of developing Parkinson’s : आमतौर पर बुजुर्गों को होने वाली बीमारी पार्किंसन (Parkinson Disease) की रोकथाम और इलाज (Prevention and Treatment) की दिशा में साइंटिस्ट एक बड़ी उपलब्धि की ओर बढ़ रहे हैं. आपको बता दें कि पार्किंसन में प्रभावित व्यक्ति का शरीर कांपता है, चलने-फिरने में परेशानी होती है और अंगों पर नियंत्रण कमजोर हो जाता है. अमेरिकन एकेडमी ऑफ न्यूरोलॉजी (American Academy of Neurology) के रिसर्चर्स की अगुआई में हुई एक अहम स्टडी में पाया गया है कि जो बुजुर्ग स्टैटिन ड्रग्स (Statin Drugs) का सेवन करते हैं, उनमें इनका सेवन नहीं करने वालों की तुलना में पार्किसंस होने का खतरा कम होता है. दरअसल, स्टैटिन ड्रग्स (Statin Drugs) का इस्तेमाल ब्लड कोलेस्ट्रॉल कम करने, ऐथरोस्क्लरोसिस (atherosclerosis)  यानी धमनियों (आर्टरी) में मैल की परत जमने से बचाव और धमनियों को सख्त होने से रोकने के लिए किया जाता है. इन स्थितियों से बचना इसलिए भी जरूरी हो जाता है, क्योंकि ये हार्ट अटैक और स्ट्रोक के भी कारक बनते हैं.

इस स्टडी के लिए 2,841 लोगों को शामिल किया गया, जिनकी औसत उम्र 76 वर्ष थी.  शुरुआत में इनमें से कोई भी पार्किसंस से पीड़ित नहीं थे. इनमें से 936 लोग (33%) लोग स्टैटिन ड्रग्स ले रहे थे. रिसर्चर्स ने इन सभी प्रतिभागियों को 6 साल तक वार्षिक आधार पर उनकी जांच की कि क्या वे स्टैटिन ले रहे हैं और उनमें पार्किसंस के लक्षण पैदा हुए या नहीं. इस स्टडी का निष्कर्ष ‘न्यूरोलाजी (Neurology)’ जर्नल में प्रकाशित हुआ है.

स्टडी में क्या निकला
स्टडी के अंत में 1,432 लोगों (करीब 50%) में पार्किसंस के लक्षण दिखे, जबकि स्टैटिन लेने वाले 936 लोगों में से 418 (करीब 45%) में 6 सालों में पार्किसंस के लक्षण विकसित हुए. वहीं, स्टैटिन नहीं लेने वाले 1,905 लोगों में से 1,014 (53%) में पार्किसंस के लक्षण दिखे. रिसर्चर्स ने पाया कि उम्र, लिंग तथा धमनियों के लिए स्मोकिंग और डायबिटीज जैसे नुकसानदेह कारकों और पार्किसंस पर उनके असर को भी शामिल किए जाने के बाद स्टैटिन लेने वालों में अगले 6 सालों में पार्किसंस का रिस्क औसतन 16% कम था.

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वहीं, स्टैटिन थेरेपी लेने वाले करीब 79% लोग मध्यम या उच्च तीव्रता वाले स्टैटिन लेते थे. रिसर्चर्स ने ये भी पाया कि उच्च तीव्रता वाले स्टैटिन लेने वालों में स्टैटिन की मध्यम डोज लेने वालों की तुलना में पार्किसंस का खतरा 7% कम था.

क्या कहते हैं जानकार
इस स्टडी के ऑथर और शिकागो स्थित रश यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर (Rush University Medical Center) के साइंटिस्ट शाहराम (Shahram Oveisgharan) ओविसघरन का कहना है कि हमारी स्टडी के नतीजे बताते हैं कि जो लोग स्टैटिन का इस्तेमाल करते हैं, उनमें पार्किसंस से जुड़ी परेशानियों का खतरा कम होता है और ऐसा इसलिए संभव जान पड़ता है कि ये दवाएं ब्रेन की आर्टरी को आंशिक तौर पर सुरक्षा देती होंगी.

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उन्होंने बताया कि हमारी स्टडी का ये परिणाम इसलिए भी उत्साहवर्धक है कि उम्रदराज व्यक्तियों को आमतौर पर पार्किसंस के लक्षण के कारण चलने-फिरने में दिक्कतें होती हैं, जो उन्हें कमजोर बनाते हैं. यह अभी भी लाइलाज बना हुआ है.

Tags: Health, Health News, Lifestyle

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