कोरोना काल में दोगुने हो गए हैं मानसिक रोगी, ये है इसकी सबसे बड़ी वजह

कोरोना काल में दोगुने हो गए हैं मानसिक रोगी, ये है इसकी सबसे बड़ी वजह
पिछले कुछ महीनों से खासकर कोरोना से ठीक हुए मरीज भी अवसाद और तनाव में हैं.

देश के जाने-माने मनोचिकित्सकों (Psychiatrists) का कहना है कि लॉकडाउन (Lockdown) के बाद से अस्पतालों में एंग्जाइटी पैनिक अटैक (Anxiety Panic Attack) के मरीज ज्यादा आ रहे हैं. मरीजों में घबराहट, धड़कनें तेज होना, छाती में दबाव होना, गला बंद होना, सांस लेने में परेशानी, नींद नहीं आना, खूब पसीना आना, बेचैनी इतनी बढ़ना की मौत का डर जैसे सिम्पटम्स नजर आ रहे हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: July 14, 2020, 11:47 AM IST
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नई दिल्ली. देश में लॉकडाउन (Lockdown) के बाद से ही मानसिक रूप से बीमार मरीजों की संख्या बढ़ने लगी है. कोरोना लॉकडाउन (Coronavirus Lockdown) के दौरान मानसिक तौर पर परेशान होकर कई मशहूर लोगों ने सुसाइड (Suicide) किया है. बीते कुछ दिनों में फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत (Sushant Singh Rajput), आईआईटी (IIT) कानपुर के प्रोफेसर प्रमोद सुब्रमण्यम, एम्स (AIIMS) के 25 वर्षीय जूनियर रेजीडेंट डॉ. अनुराग कुमार और 16 साल की टिकटॉक गर्ल सिया कक्कड़ जैसे कई नाम इस सूची में लिए जा सकते हैं.

लॉकडाउन में एंग्जाइटी और अब डिप्रेशन के मरीज बढ़ने लगे
अब एक नई तरह की बीमारी लोगों में देखी जा रही है. मनोचिकित्सकों (Psychiatrists) का मानना है कि पिछले कुछ महीनों से खासकर कोरोना से ठीक हुए मरीज भी अवसाद और तनाव में हैं. वे नींद नहीं आने की शिकायत कर रहे हैं. मानसिक रोगियों का इलाज करने वाले डॉक्टर कहते हैं कि लॉकडाउन से पहले एंग्जाइटी के मरीज ज्यादा थे, लेकिन लॉकडाउन खुलने के बाद डिप्रेशन के मरीजों की संख्या पहले की तुलना में दोगुना हो गई है.

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अब एक नई तरह की बीमारी लोगों में देखी जा रही है.

क्या है दिल्ली के बड़े अस्पतालों का हाल


पूर्वी दिल्ली के पटपड़गंज मैक्स सुपर स्पेशलिटी अस्पताल (Max Super Speciality Hospital) के मनोचिकित्सक डॉ. राजेश कुमार कहते हैं, 'इसको दो तरह से समझने की जरूरत है. सबसे पहले कोविड से पहले की स्थिति को समझते हैं. लोगों को लगता था कि मुझे इंफेक्शन न हो जाए इसलिए बचाव के लिए तरह-तरह के तरीके अपना रहे थे. डर की वजह से लोग वह भी कर रहे थे जो उनको करने की जरूरत नहीं थी. जैसे घर में मास्क लगाना, गाड़ी के अंदर मास्क लगाना, आइसोलेसशन में भी मास्क लगाना. यह भी एक तरह की इंग्जाइटी ही है. इससे हमें बीमारी के लेवल पता चलता है. लोग डर की वजह से अपने ही सगे-संबंधियों से नहीं मिल रहे थे. यह सब बाद में डिप्रेशन तक पहुंच जाता है. अब कोरोना काल यानी अप्रैल-मई की तुलना में जून और जुलाई में डिप्रेशन के मरीज काफी बढ़ गए हैं. साइक्रेटिक ओपीडी में पहले एंग्जाइटी के 30 से 40 प्रतिशत मरीज आते थे वह अब दोगुना हो गए हैं. एंग्जाइटी के केस ही अब डिप्रेशन में बदल गए हैं.'

पोस्ट कोविड मरीजों का ये है हाल
डॉ. राजेश कहते हैं, 'कोविड से पहले डर था कि इंफेक्शन न हो जाए, लेकिन इस बीमारी में थोड़ा अंतर है. इस तरह के मरीजों में अपने पूर्व के अनुभवों से डर लगने लगता है. डॉक्टरों का व्यवहार, अपने आंख के सामने लोगों को मरते देखना आदि इस तरह के लक्षण आदमी में पैनिक अटैक कर देता है. बीमारी फिर से न हो जाए इसका भी डर लगता है. क्वारंटीन में रहने के कारण कुछ लोग अवसाद में रहने लगते हैं.

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कोविड से उबरने वाले मरीजों के लिए कई तरह के सुझाव दिए जा रहे हैं.


ऐसे मरीजों के उपचार में क्या सावधानी बरतें
-फैमिली सपोर्ट हो.
-हमें उनकी बातों को सुनना चाहिए.
-पीड़ित 20 से 30 बार एक ही तरह की बात बोल सकता है, घबराएं नहीं.
-एक्सरसाइज या किसी और एक्टिविटी में शामिल करें.
-निगेटिव समाचार से बचना चाहिए.
-मनोवैज्ञानक या मनोचिकित्सकों से लगातार संपर्क में रहना चाहिए.

क्या कहते हैं देश के बड़े मनोचिकित्सक
देश के जाने-माने मनोचिकित्सक डॉ. समीर पारिख कहते हैं, 'पिछले कुछ महीनों से अस्पतालों में एंग्जाइटी पैनिक अटैक (Anxiety Panic Attack) के मरीज ज्यादा आ रहे हैं. मरीजों में घबराहट, धड़कनें तेज होना, छाती में दबाव होना, गला बंद होना, सांस लेने में परेशानी, नींद नहीं आना, खूब पसीना आना, बेचैनी इतनी बढ़ना की मौत का डर जैसे सिम्पटम्स नजर आ रहे हैं. इस तरह के लक्षण मनोरोगियों के ही हो सकते हैं. यह पूरी तरह से मनौवैज्ञानिक समस्या है. इस तरह के लोगों को साइकेट्रिक इलाज की जरूरत है.'

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पिछले कुछ महीनों से अस्पतालों में एंग्जाइटी पैनिक अटैक के मरीज ज्यादा आ रहे हैं.


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किस वर्ग के लोग ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं
समाज शास्त्र एवं मनोविज्ञान को जानने वाले विशाल कुमार कहते हैं, 'लॉकडाउन और पोस्ट लॉकडाउन से उत्पन्न परिस्थितियों ने लोगों की मनोस्थिति को बुरी तरह प्रभावित किया है. बीत रहा समय हम सब के लिए एक चुनौतीपूर्ण वक्त है. विशेषतौर से उन लोगों के लिए ज्यादा असुरक्षित है जो किसी न किसी मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से पहले से ही पीड़ित हैं. अगर हम इन पीड़ितों के प्रोफाइल की समीक्षा करते हैं तो यह निष्कर्ष पाते हैं कि ज्यादातर लोग मध्यम वर्ग या उच्च वर्ग के परिवारों के हैं.'

विशाल कहते हैं. 'हमारी वर्तमान सामाजिक व्यवस्था में 30 से 45 के बीच की उम्र के मध्यम और उच्च वर्ग के जायदातर लोग असाधारण रूप से बहुत कुछ हासिल करने की महत्वाकांक्षा से भरे होते हैं. साथ ही उनका जीवन संघर्ष और जिम्मेदारियों से वाला होता है. ऐसे में कोई भी बदलाव जो उनके जीवन में रुकावट डालता है वो उन्हें भावनात्मक तौर पर कमजोर करता है और जीवन में अवसाद लेकर आता है.'
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