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    बच्‍चों में होने वाली जन्‍मजात बीमारी है स्पाइना बाइफिडा, जानिए क्‍या है इलाज

    स्पाइना बाइफिडा में रीढ़ की हड्डी और मेरुदंड सही तरह नहीं बन पाते. (सांकेतिक तस्वीर)
    स्पाइना बाइफिडा में रीढ़ की हड्डी और मेरुदंड सही तरह नहीं बन पाते. (सांकेतिक तस्वीर)

    गर्भावस्था (Pregnancy) के दौरान हुई लापरवाही के कारण शिशु जन्म दोष स्पाइना बाइफिडा (Spina Bifida) का शिकार हो सकता है. इस जन्‍मजात बीमारी के कारण बच्चा चलने-फिरने से लाचार हो जाता है.

    • Last Updated: November 15, 2020, 6:19 AM IST
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    हर माता-पिता (Parents) एक स्वस्थ बच्चे की कामना करते हैं और उसके लिए किसी तरह के जतन में कमी नहीं रखते हैं. कहीं न कहीं गर्भावस्था (Pregnancy) के दौरान हुई लापरवाही के कारण शिशु जन्म दोष स्पाइना बाइफिडा (Spina Bifida) का शिकार हो सकता है. जन्मजात होने वाली बीमारी स्पाइना बाइफिडा के कारण बच्चा चलने-फिरने से लाचार हो जाता है. myUpchar से जुड़े डॉ. प्रदीप जैन का कहना है कि स्पाइना बाइफिडा में रीढ़ की हड्डी और मेरुदंड सही तरह नहीं बन पाते हैं. इस दोष को न्यूरल ट्यूब दोष की श्रेणी में शामिल किया गया है. यह ट्यूब भ्रूण की एक संरचना होती है जो शिशु के मस्तिष्क और मेरुदंड के रूप विकसित होती है.

    वैज्ञानिक बच्चे के परिवार में चली आ रही किसी स्वास्थ्य समस्या, वातावरण और मां के शरीर में फोलिक एसिड की कमी आदि कारकों को इसकी वजह मानते हैं. साथ ही गर्भावस्था के दौरान दौरे पड़ने की दवा लेने से बच्चे को न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट होने की आशंका ज्यादा होती है. यही नहीं जिन महिलाओं का ब्लड शुगर नियंत्रित नहीं रहता, उनके होने वाले शिशु को स्पाइना बाइफिडा का खतरा रहता है. महिला के गर्भवती होने से पहले मोटापा भी शिशु में न्यूरल ट्यूब दोष से जुड़ा होता है.



    स्पाइना बाइफिडा तीन तरह का होता है. 1. स्पाइना बाइफिडा अकल्टा, 2. मेनिनगोसील और 3. माइलोमेनिनगोसील. बीमारी की गंभीरता, आकार, प्रकार, स्थान और जटिलताओं के आधार पर यह अंतर होता है. जन्म या उसके बाद स्पाइना बाइफिडा से पीड़ित शिशु में कई लक्षण दिखाई देते हैं, जिसमें पैरों में लकवा पड़ना, मल और मूत्र असंयमितता, त्वचा की संवेदनशीलता की कमी, दौरे पड़ना, पैरों और कूल्हों के आकार में विकृति और रीढ़ की हड्डी का मुड़ जाना आदि शामिल हैं. स्पाइना बाइफिडा में तंत्रिका तंत्र में भी संक्रमण का जोखिम रहता है.
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    इसका इलाज भी रोग की गंभीरता पर निर्भर करता है. अगर इसका प्रकार स्पाइना बाइफिडा अकल्टा है तो इसमें इलाज की जरूरत नहीं होती है. यह काफी हल्के प्रभाव के होते हैं. इनमें भ्रूण के बनते समय मेरुदंड और उसके आसपास संरचनाएं बच्चे के शरीर के अंदर रहती हैं, लेकिन रीढ़ की हड्डी का निचला हिस्सा ठीक तरीके से नहीं बन पाता है.

    अन्य प्रकार के स्पाइना बाइफिडा में सर्जरी की आवश्यकता पड़ती है जो कि जन्म से पहले या जन्म के बाद हो सकती है. 24वें सप्ताह की गर्भावस्था के पहले होने वाली सर्जरी से स्पाइना बाइफिडा को ठीक किया जाता है. इस ऑपरेशन में डॉक्टर मां के गर्भाशय को खोलकर बच्चे के मेरुदंड को ठीक कर देते हैं. इससे जन्म संबंधी दोष का खतरा कम हो जाता है. हालांकि इस प्रक्रिया में ज्यादा खतरा होता है. बच्चा जल्द पैदा होने की समस्याएं भी अधिक होती हैं. जन्म के बाद की सर्जरी में मेनिनगोसील की सर्जरी में मेनिन्जेस को सही स्थान पर पहुंचाया जाता है और खुली हुई कोशिकाओं को बंद कर दिया जाता है. इस स्थिति में बच्चे का मेरुदंड सामान्य तरीके से बढ़ता है, जिसके कारण तंत्रिताओं को नुकसान पहुंचाए बिना झिल्ली को आसानी से हटाया जा सकता है. अन्य प्रकार के माइलोमेनिनगोसील में भी सर्जरी की जरूरत होती है. इसमें डॉक्टर मेरुदंड और अन्य उतकों को बच्चे के शरीर के अंदर कर देते हैं और मांसपेशियों व त्वचा को ढक देते हैं.

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    स्पाइना बाइफिडा से बचाव मुश्किल है, लेकिन गर्भावस्था के दौरान फोलिक एसिड और समय पर टेस्ट करवाने से इस समस्या से काफी हद तक बचा जा सकता है. फोलिक एसिड और अन्य विटामिन लेने से इस जन्म दोष का खतरा कम हो जाता है.

    अधिक जानकारी के लिए हमारा आर्टिकल, स्पाइना बाइफिडा क्या है, इसके प्रकार, इलाज, लक्षण और बचाव पढ़ें।

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