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Covid-19 की तीसरी लहर का खतरा और टीकाकरण तेज करने की आवश्यकता

देश में वैक्सीनेशन का टूटा रिकॉर्ड (रॉयटर्स)

देश में वैक्सीनेशन का टूटा रिकॉर्ड (रॉयटर्स)

28 जून तक भारत में टीके की 32,36,63,297 खुराक दी गई. इसका मतलब है कि टीके की कुल खुराक के मामले में हमने अमेरिका को भी पीछे छोड़ दिया. दिलचस्प बात यह है कि भारत में टीकाकरण इस साल 16 जनवरी को शुरू हुआ, जबकि अमेरिका में पिछले साल 14 दिसंबर से ही टीकाकरण चल रहा है.

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    नई दिल्ली . 28 जून तक भारत में टीके की 32,36,63,297 खुराक दी गई. इसका मतलब है कि टीके की कुल खुराक के मामले में हमने अमेरिका को भी पीछे छोड़ दिया. दिलचस्प बात यह है कि भारत में टीकाकरण इस साल 16 जनवरी को शुरू हुआ, जबकि अमेरिका में पिछले साल 14 दिसंबर से ही टीकाकरण चल रहा है. हालिया विनाशकारी दूसरी लहर और सार्वजनिक स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे पर इसके प्रभाव को देखते हुए यह कोई मामूली उपलब्धि नहीं है. हालांकि, योग्य कुल आबादी की तुलना में टीकाकरण की रफ्तार अभी भी कम है.
    स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने भारत में तीसरी लहर की चेतावनी दी है. कुछ लोगों का अनुमान है कि भारत में यह अब से 6 से 8 हफ्ते के अंदर आ सकती है, जबकि कुछ का कहना है कि यह सितंबर-अक्टूबर में आएगी. तीसरी लहर का समय और गंभीरता वायरस के म्यूटेशन और ट्रांसमिशन, मानव व्यवहार और टीकाकरण के स्तर पर निर्भर करेगा. समय के बारे में ध्यान दिए बिना, तीसरी लहर और संभवतः कुछ और आ सकती है, इसके लिए सरकार, नागरिकों, सामाजिक संगठन, ऑर्गनाइजेशन और उद्योग समेत सबको तैयार रहने की ज़रूरत है.

    टीकाकरण ही एकमात्र हथियार

    हमें दुनियाभर में आने वाले समय में महामारी का सामना करने के आवश्यकता होगी और हमारे पास टीकाकरण ही एकमात्र हथियार है. कोविड-19 वैक्सीन का संक्रमण और ट्रांसमिशन स्थान और वायरस के प्रकार के अनुसार अलग है, लेकिन यह जान बचाने में कारगर है. साक्ष्य बताते हैं कि टीका लगवा चुके लोगों को अस्पतपाल में भर्ती होने की ज़रूरत नहीं पड़ती, यहां तक कि उन्हें भी जिन्होंने टीके की सिर्फ एक खुराक ही लगवाई है. बिना किसी सुरक्षा से, आंशिक सुरक्षा हमेशा बेहतर होती है. कई मामलों में यह ज़िंदगी और मौत के बीच का अंतर है.

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    टीकाकरण की धीमी रफ्तार और डेल्टा का नया वेरिएंट चिंता की बात
    भारत के लिए टीकाकरण की धीमी रफ्तार और डेल्टा का नया वेरिएंट चिंता की बात है. हमें इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि अब तक 0 से 18 साल के लोगों का टीकाकरण शुरू ही नहीं हुआ है. टीकाकरण की रफ्तार को तेज़ किए बिना हर्ड इम्यूनिटी तक पहुंचना संभव नहीं है. रफ्तार बढ़ाना महत्वपूर्ण है खासतौर पर उन लोगों के लिए जो निजी संस्थानों में टीकाकरण का खर्च नहीं उठा सकते.

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    सरकार द्वारा मुहैया कराए जाने वाले मुफ्त टीकाकरण तक पहुंच दूर-दराज के गांव और शहरी स्लम एरिया में रहने वालों के लिए अब भी चुनौतीपूर्ण है. टेक्नोलॉजी का कम इस्तेमाल, टीकाकरण के प्रति झिझक, जागरुकता की कमी आदि कई ऐसी चुनौतियां है जिनसे निपटने की ज़रूरत है.

    सार्वजनिक स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे को बढ़ाने की ज़रूरत
    टीकाकरण की प्रभावशीलता अवधि तय करने को लेकर काम चल रहा है, भविष्य में आने वाली लहरों को ध्यान में रखते हुए हमें तेज़ और असरदार टीकाकरण अभियान चलाने के लिए अपने सार्वजनिक स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे को बढ़ाने की ज़रूरत है. ऐसे बुनियादी ढांचे और प्रक्रिया से भविष्य में बूस्टर डोज के लिए तेज़ और असरदार कवरेज मिल सकती है, जिसकी अलग-अलग समय अंतराल में ज़रूरत हो सकती है.
    इस लड़ाई में एक अहम पहलू है फ्रंटलाइन हेल्थ वर्कर्स की क्षमता बढ़ाना, जो सीधे कम्यूनिटी में काम करते हैं. आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, , मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता (ASHA) और सहायक नर्स दाई (ANM) कोविड-19 की लड़ाई के नायक रहे हैं. उन्होंने टीकाकरण के लिए जमीनी स्तर पर लोगों को शिक्षित किया, आश्वासन दिया और संगठित करके बड़े पैमाने पर टीकाकरण सुनिश्चित किया. यह बहुत अहम है कि उनकी क्षमता को बढ़ाया जाए और लोगों को एकजुट या संगठित करने के लिए ज़रूरी ज्ञान से वह लैस रहें.

    टीका लगवाएं और दूसरों को प्रेरित करें
    सामान्य स्थिति में लौटने का एकमात्र तरीका है टीकाकरण. और जब तक सभी को टीका न लग जाए कोई सुरक्षित नहीं है. यह सही समय है कि हम सब टीका लगवाएं और अपने आसपास के सभी लोगों को ऐसा करने के लिए प्रेरित करें.

    अनिल परमार, वाइस प्रसिडेंट,
    क्म्यूनिटी इनवेस्टमेंट, यूनाइटेड वे मुंबई

    (नोट - ये लेखक के अपने निजी विचार हैं.)

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