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आईवीएफ (IVF) तकनीक के जरिए बनना चाहते हैं माता-पिता, जरूर जान लें ये बातें

IVF तकनीक का इस्तेमाल करते समय कुछ बातों की सावधानी रखें. Image Credit/Pexels Andreas Wohlfahrt

आईवीएफ तकनीक (IVF Technology) को अपनाने से पहले पूरी तरह से संतुष्ट हो जाना चाहिए. गर्भ नहीं ठहर पाने के पीछे आमतौर पर खराब जीवन शैली (Lifestyle), तनाव, अनियमित डाइट, गलत आदतों के कारण प्रजनन संबंधी शारीरिक समस्याएं हो सकती हैं.

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    देश में कई ऐसे लोग हैं, जिनमें प्रजनन से संबंधित कई शारीरिक समस्याएं (Reproductive Physical Problems) होती हैं. ऐसे लोग आमतौर पर खराब जीवन शैली (Lifestyle), तनाव, अनियमित डाइट, गलत आदतों के कारण प्रजनन संबंधी शारीरिक समस्याओं के शिकार होते हैं. ऐसे में आईवीएफ तकनीक (IVF Technology) के जरिए माता-पिता बनने का सुख भोग सकते हैं, लेकिन तकनीक का इस्तेमाल करते समय भी कुछ बातों की सावधानी रखनी होती है. अगर आप भी आईवीएफ तकनीक के जरिए माता-पिता बनना चाहते हैं, तो इन बातों को जरूर जान लेना चाहिए-

    • myUpchar से जुड़े डॉ. विशाल मकवाना के अनुसार आईवीएफ तकनीक को अपनाने से पहले पूरी तरह से संतुष्ट हो जाना चाहिए कि प्रजनन की समस्या क्या है. गर्भ नहीं ठहर पाने के पीछे कई शारीरिक कारण हो सकते हैं, जैसे हार्मोन से जुड़ी समस्या, ट्यूब में संक्रमण या शारीरिक संबंध बनाने में असमर्थता आदि. इन सभी को उचित मेडिकल चेकअप करवा लेना चाहिए. इसके बाद ही आईवीएफ तकनीक को अपनाना चाहिए.


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    • आईवीएफ तकनीक अपनाने से पहले मेल फर्टिलिटी टेस्ट भी करवा लेना चाहिए. इसके जरिए पुरुषों में संतानोत्पत्ति की क्षमता की जांच की जाती है. मेल फर्टिलिटी टेस्ट से पुरुषों में शुक्राणु की जांच की जाती है. अगर पुरुष की जांच ठीक आ जाए, उसके बाद ही आईवीएफ तकनीक अपनानी चाहिए.

    • आईवीएफ तकनीक को अपनाना तब सही होता है, जब महिला के ट्यूब में ब्लॉकेज हो. कुछ मामलों में पीसीओएस की स्थिति में भी आईवीएफ का विकल्प अपनाया जाता है. दरअसल, पीसीओएस महिलाओं के शरीर में हार्मोन के असंतुलन और अंडा निषेचित नहीं होने की स्थिति कहलाती है. महिलाओं में पीसीओएस की शारीरिक समस्या को आईयूआई और आईवीएफ तकनीक से ठीक किया जा सकता है.

    • myUpchar से जुड़े डॉ. विशाल मकवाना के अनुसार आईवीएफ तकनीक की प्रक्रिया तीन तरह की होती है- नेचुरल, मिनिमल और कनवेंशनल. नेचुरल आईवीएफ कुदरती अंडे के जरिए किया जाता है न कि स्टिमुलेशन के जरिए तैयार किए गए महिला के अंडाणु से. यह प्रक्रिया उन महिलाओं के लिए सही होती है, जो बहुत ज्यादा इलाज या दवा आदि के खर्च से बचना चाहती हैं. वहीं मिनिमल स्टिमुलेशन आईवीएफ में दवा के जरिए स्वस्थ अंडाणु तैयार किए जाते हैं. इस तकनीक में खर्च थोड़ा बढ़ जाता है. तीसरी तरह की आईवीएफ तकनीक पारंपरिक तरीके से की जाती है, जिसे कनवेंशनल आईवीएफ कहा जाता है, जिसमें अंडाणु और वीर्य को विशेष माहौल में मिलाया जाता है, जिसमें निषेचन की संभावना काफी ज्यादा होती है और प्रजनन की संभावना काफी बढ़ जाती है.


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    • जब महिला का अंडाणु तैयार हो जाता है तब इसमें स्पर्म इंजेक्ट किया जाता है. आईसीएसआई तकनीक के जरिए वीर्य के संपर्क में अंडाणु को लाया जाता है. इसी प्रक्रिया के जरिए भ्रूण तैयार होने लगता है. आईवीएफ तकनीक में भ्रूण की निगरानी की प्रक्रिया बेहद खास होती है. अंडा निकालने के 48 घंटे बाद कम से कम दो तीन सेल्स होने चाहिए. 72 घंटे या तीन दिन के बाद यह संख्या 7-10 होनी चाहिए. पांचवे दिन भ्रूण ब्लास्टोसिस्ट स्टेज में पहुंच जाता है. इसे टेस्ट ट्यूब सेंटर में पूरी तरह से निगरानी में किया जाता है. अगर भ्रूण हस्तांतरित करने की प्रक्रिया सही तरह से हो जाती है तो गर्भधारण में ज्यादा से ज्यादा 15 दिन का समय लगता है. 15 दिन के बाद प्रेग्नेंसी टेस्ट के जरिए यह पता लगाया जा सकता है कि आईवीएफ की प्रक्रिया सफल हुई है या नहीं.


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