जानें ऑटोइम्यून बीमारियां क्या होती हैं और उनका इलाज कैसे होता है?

जानें ऑटोइम्यून बीमारियां क्या होती हैं और उनका इलाज कैसे होता है?
ऑटोइम्यून बीमारी क्या है जानें

आनुवंशिकता (Genetics) ऑटोइम्यून बीमारियों (Autoimmune Diseases) में अहम भूमिका निभाती है. अगर आपके परिवार में किसी को भी किसी तरह की ऑटोइम्यून बीमारी है तो आपको भी इस तरह का कोई रोग हो सकता है...

  • Last Updated: August 18, 2020, 11:14 AM IST
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हमें हानिकारक सूक्ष्मजीवों और बीमारियों से बचाने की जिम्मेदारी हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) की होती है. हमें किसी भी तरह के संक्रमण से बचाने के लिए इम्यून सिस्टम लगातार काम करता है. हमारे शरीर का इम्यून सिस्टम शरीर में प्रवेश करने वाले किसी भी बाहरी तत्व के खिलाफ लड़ता है. लेकिन कई बार यह गलती से शरीर की अपनी कोशिकाओं पर भी हमला कर देता है, इस स्थिति को ऑटोइम्यून डिजीज कहा जाता है.

अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (NIH) के मुताबिक करीब 100 तरह की ऑटोइम्यून बीमारियों की पहचान हो चुकी है. इनमें से कुछ बहुत ही आम ऑटोइम्यून बीमारियों के नाम हैं – रूमेटॉइड आर्थराइटिस, टाइप 1 डायबिटीज, सोरायसिस और ल्यूपस आदि.



हालांकि, ऑटोइम्यून बीमारियों का असली कारण क्या है, इस बारे में अभी तक कोई ठोस जानकारी नहीं है. कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि रोगाणुओं (बैक्टीरिया और वायरस) की वजह से यह बीमारी हो सकती है. कुछ लोगों का जीन ही ऐसा होता है कि उनमें ऑटोइम्यून बीमारियां पनपने लगती हैं.
हाल ही में ऑस्ट्रेलिया के बेकर हार्ट एंड डायबिटीज इंस्टीट्यूट में एक स्टडी हुई है. इस स्टडी के अनुसार बचपन में हमारे जीन किस तरह से प्रतिक्रिया देते हैं और उन जीन्स में मौजूद भिन्नताओं के कारण भविष्य में किसी व्यक्ति में ऑटोइम्यून बीमारियां हो सकती हैं.

ऑटोइम्यून बीमारियों के बारे में चलिए और जानते हैं -

ऑटोइम्यून बीमारियां क्या होती हैं?

जब हमारे शरीर का इम्यून सिस्टम हमारी स्वस्थ कोशिकाओं पर हमला कर देता है तो इसे ऑटोइम्यून डिजीज कहा जाता है. किसी भी बाहरी (वायरस, बैक्टीरिया) हमले से हमें बचाने के लिए हमारा इम्यून सिस्टम एंटीबॉडी बनाता है, लेकिन कई बार इसमें गड़बड़ी के चलते यह स्वस्थ कोशिकाओं को बाहरी तत्व समझकर उन पर भी हमला कर देता है. हालांकि, जब किसी व्यक्ति को ऑटोइम्यून बीमारियां होती हैं तो उनका शरीर ऑटो एंटीबॉडी बनाना शुरू कर देता है जो अपने ही टिश्यू के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करती हैं.

ऑटोइम्यून बीमारी हमारे शरीर के किसी भी उत्तक पर हमला कर सकती है, फिर चाहे वह खून (ल्यूपस), त्वचा (सोरायसिस), मासपेशियां (मायोसाइटिस), जोड़ (रूमेटॉइड आर्थराइटिस), थायरॉइड जैसी एंडोक्राइन ग्लैंड (ऑटोइम्यून थायरॉइड) और पैंक्रियाज (डायबिटीज टाइप 1) ही क्यों ना हों. इससे अंग क्षतिग्रस्त हो सकते हैं, उनके कामकाज में परिवर्तन हो सकता है और किसी अंग में असमान्य रूप से वृद्धि भी हो सकती है.

ऑटोइम्यून बीमारियों के लक्षण क्या हैं?

हर ऑटोइम्यून बीमारी के लक्षण वह जिस अंग को प्रभावित कर रही है, उसके अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं. हालांकि, सभी ऑटोइम्यूज बीमारियों में ये कुछ लक्षण हो सकते हैं -

  • जोड़ों में दर्द और सूजन

  • थकावट

  • बुखार

  • चकत्ते

  • बेचैनी


ऑटोइम्यून बीमारियों के लक्षण भी सभी लोगों में एक समान उम्र में नहीं दिखते. यह लक्षण बचपन में ही दिख सकते हैं, जवानी या फिर बुढ़ापे की ओर बढ़ती उम्र में नजर आ सकते हैं. उदाहरण के लिए रूमेटॉइड आर्थराइटिस के लक्षण आमतौर पर 30-55 वर्ष की आयु में दिखते हैं. ल्यूपस से ग्रस्त मरीजों में इसके लक्षण 16 से 55 वर्ष की आयु में नजर आते हैं.

ऑटोइम्यून बीमारियों का खतरा किन लोगों को है?

ऑटोइम्यून बीमारियों में आनुवंशिकता अहम भूमिका निभाती है. अगर आपके परिवार में किसी को भी किसी तरह की ऑटोइम्यून बीमारी है तो आपको भी इस तरह का कोई रोग हो सकता है. हालांकि, आनुवंशिक कारकों के साथ ही कुछ पर्यावरणीय कारण भी इसमें भूमिका निभा सकते हैं.

पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में ऑटोइम्यून बीमारियों का खतरा अधिक होता है. इसकी वजह उनमें मौजूद दो एक्स गुणसूत्र (क्रोमोसोम) हैं. सेक्स हार्मोन में होने वाले बड़े बदलाव जैसे गर्भावस्था और मैनोपॉज की वजह से भी ऑटोइम्यून बीमारियां हो सकती हैं.

ऑटोइम्यून बीमारियों की पहचान कैसे होती है और इलाज क्या है?

ऑटोइम्यून बीमारी की पहचान आसान नहीं होती है. आपमें ऑटोइम्यून बीमारी का पता लगाने के लिए डॉक्टर आपकी पूरी मेडिकल हिस्ट्री के बारे में जानेंगे, फिजिकल एग्जामिनेशन करेंगे और खून में ऑटोएंटीबॉडीज का पता लगाने के लिए ब्लड टेस्ट भी करेंगे.

ऑटोइम्यून बीमारियों का कोई भी इलाज उपलब्ध नहीं है. डॉक्टर आपको जीवनशैली में बदलाव के साथ ही लक्षणों के आधार पर कुछ दवाएं दे सकते हैं. इनमें दर्दनिवारक दवाएं, सूजनरोधी दवाएं और इम्यूनोसप्रेसेंट्स हो सकते हैं. जिन लोगों को चलने-फिरने में भी दिक्कत हो रही हो, उनको डॉक्टर फिजिकल थैरेपी की सलाह दे सकते हैं. जिन्हें कुछ तत्वों की कमी (टाइप-1 डायबिटीज में इंसुलिन) हो जाती है, उन्हें डॉक्टर कुछ सप्लीमेंट लेने की सलाह दे सकते हैं. (अधिक जानकारी के लिए हमारा आर्टिकल, ऑटोइम्यून बीमारियां क्या होती हैं, इनके लक्षण, कारण, बचाव, इलाज और डॉक्टर पढ़ें।) (न्यूज18 पर स्वास्थ्य संबंधी लेख myUpchar.com द्वारा लिखे जाते हैं। सत्यापित स्वास्थ्य संबंधी खबरों के लिए myUpchar देश का सबसे पहला और बड़ा स्त्रोत है। myUpchar में शोधकर्ता और पत्रकार, डॉक्टरों के साथ मिलकर आपके लिए स्वास्थ्य से जुड़ी सभी जानकारियां लेकर आते हैं।)

अस्वीकरण : इस लेख में दी गयी जानकारी कुछ खास स्वास्थ्य स्थितियों और उनके संभावित उपचार के संबंध में शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए है। यह किसी योग्य और लाइसेंस प्राप्त चिकित्सक द्वारा दी जाने वाली स्वास्थ्य सेवा, जांच, निदान और इलाज का विकल्प नहीं है। यदि आप, आपका बच्चा या कोई करीबी ऐसी किसी स्वास्थ्य समस्या का सामना कर रहा है, जिसके बारे में यहां बताया गया है तो जल्द से जल्द डॉक्टर से संपर्क करें। यहां पर दी गयी जानकारी का उपयोग किसी भी स्वास्थ्य संबंधी समस्या या बीमारी के निदान या उपचार के लिए बिना विशेषज्ञ की सलाह के ना करें। यदि आप ऐसा करते हैं तो ऐसी स्थिति में आपको होने वाले किसी भी तरह से संभावित नुकसान के लिए ना तो myUpchar और ना ही News18 जिम्मेदार होगा।

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