प्रेग्नेंट महिलाओं और बच्चों के लिए खतरनाक है हेपटाइटिस-ई संक्रमण, जानिए क्या है ये बीमारी

प्रेग्नेंट महिलाओं और बच्चों के लिए खतरनाक है हेपटाइटिस-ई संक्रमण, जानिए क्या है ये बीमारी
हेपटाइटिस-ई का संक्रमण सबसे ज्यादा गर्भवती महिलाओं को प्रभावित करता है.

आज पूरी दुनिया में हर वर्ष लगभग दो करोड़ से भी अधिक लोग हेपिटाइटिस-ई संक्रमण (Hepatitis-E infection) के शिकार होते हैं. इससे प्रभावित गर्भवती महिलाओं से बच्चे में वायरस (Virus) फैलने से बच्चे की मृत्यु के केस ज्यादा सामने आते हैं.

  • Last Updated: July 7, 2020, 10:00 AM IST
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हेपटाइटिस-ई (Hepatitis E) का संक्रमण सबसे पहले 1978 में कश्मीर की घाटियों में फैला था. इस संक्रमण (Infection) से लीवर के खराब होने की बात सामने आई थी. इसका सबसे ज्यादा प्रभाव गर्भवती महिलाओं (Pregnant women) और नवजात शिशुओं पर पड़ता है. आज पूरी दुनिया में हर वर्ष लगभग दो करोड़ से भी अधिक लोग हेपिटाइटिस-ई संक्रमण (Hepatitis-E infection) के शिकार होते हैं. इससे प्रभावित गर्भवती महिलाओं से बच्चे में वायरस (Virus) फैलने से बच्चे की मृत्यु के केस ज्यादा सामने आते हैं. myUpchar से जुड़े डॉ. आयुष पाण्डेय के अनुसार इस वायरस के कारण लीवर (Liver) में सूजन हो जाती है. इस बीमार का कारण है दूषित भोजन और पानी.

ऐसे फैलता है हेपिटाइटिस-ई संक्रमण
हेपिटाइटिस-ई का संक्रमण इंसानों के मल मूत्र के द्वारा फैलता है. अगर साफ-सफाई का ध्यान नहीं रखा गया तो हेपिटाइटिस-ई के संक्रमण के बढ़ने का खतरा होता है. स्वच्छ जल पीने के साथ-साथ खाने-पीने में भी साफ-सफाई रखनी चाहिए. हाथ की सफाई भी रखना जरूरी होता है. इसके लक्षण पता लगने में एक सप्ताह से 1 महीने का समय लग सकता है. इनमें बुखार आना, थकान लगना, उल्टी होना, चक्कर आना, पेट में दर्द, भूख कम लगना और आंखों में पीलापन होना आदि लक्षण नजर आते हैं. ऐसा कोई भी लक्षण नजर आए तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए और अपनी जांच करानी चाहिए.
हेपिटाइटिस-ई भी एक आरएनए वायरस


हेपिटाइटिस-ई का वायरस एक आरएनए वायरस है. इस वायरस के चार जीनोटाइप होते हैं. इनमें से जीनोटाइप-1 वायरस के मामले ही पूरे एशिया में सामने आए थे. गर्भावस्था के दौरान यह वायरस अधिक प्रभावित करता है.

हेपिटाइटिस-ई से भी बिगड़ जाता है इम्युन सिस्टम
गर्भवती महिलाओं पर तीसरे महीने में यह संक्रमण ज्यादा बुरा असर डाल सकता है. इस संक्रमण की वजह से कई बार गर्भवती महिला के पेट में ही बच्चे की मृत्यु हो जाती है. यह वायरस गर्भवती महिलाओं से बच्चे में होने की आशंका 50 फीसदी तक होती है. गर्भावस्था के दौरान हेपिटाइटिस-ई के संक्रमण के होने पर बच्चे और मां की रोग प्रतिरोधक क्षमता पर बुरा असर पड़ता है. इसके अलावा गर्भवती महिला का हार्मोनल सिस्टम भी गड़बड़ा सकता है.

लीवर के फेल होने पर ट्रांसप्लांट
हेपिटाइटिस-ई वायरस से संक्रमित होने पर 15 से 20 प्रतिशत लोगों की मृत्यु हो जाती है. इस वायरस से संक्रमित 15 से 60 प्रतिशत मरीजों में लिवर फेल होने की आशंका अधिक रहती है. इसके लिए लीवर फेल होने पर लिवर तुरंत ट्रांसप्लांट किया जा सकता है. इसके लिए मरीज के घर के ही किसी सदस्य की अनुमति पर स्वेच्छा से दान देने वाले का लीवर मरीज में ट्रांसप्लांट किया जा सकता है, लेकिन इस ट्रांसप्लांट की सुविधा उस अस्पताल में होना बेहद ही जरूरी है, जहां मरीज का इलाज चल रहा हो, क्योंकि लीवर ट्रांसप्लांट के लिए ज्यादा समय तक प्रतीक्षा नहीं की जा सकती है. इससे मरीज की मृत्यु हो जाती है.

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ऐसे रखें सावधानी
गर्भावस्था में महिलाओं को अपना इम्यून सिस्टम मजबूत करने वाली खाद्य सामग्री का सेवन अधिक करना चाहिए. इसके अलावा अपने आस-पास साफ सफाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए. खुले में शौच करने से बचना चाहिए और भ्रूण के विकसित होने की प्रक्रिया के दौरान ज्यादा से ज्यादा हिमोग्लोबिन बढ़ाने वाले आहार, फल और हेल्दी फूड का सेवन करना चाहिए. myUpchar से जुड़े डॉ. आयुष पाण्डेय के अनुसार इस बीमारी से जुड़ा कोई भी लक्षण नजर आने पर डॉक्टरों से जांच करवाना चाहिए और टेस्ट करवाना चाहिए. हेपिटाइटिस-ई का टेस्ट खून के नमून से होता है.

अधिक जानकारी के लिए हमारा आर्टिकल, हेपटाइटिस टेस्ट कैसे और क्यों किया जाता है, उसके रिजल्ट का क्या मतलब है पढ़ें।

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