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World Rabies Day 2020: रेबीज के खिलाफ भारत की लड़ाई क्यों है अहम, जानें कैसे बनें इसका हिस्सा

मिर्च, हल्दी, चूना, जैसी उत्तेजना पैदा करने वाली चीजों को घाव पर लगाना अनावश्यक है और यह नुकसानदायक हो सकता है इसलिए इससे बचना चाहिए.

रेबीज (Rabies) वायरस अब तक के सबसे घातक वायरस में से एक है और जानवरों के काटने (Animal Bite) के माध्यम से इंसानों में फैलता है.

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    एक वायरल संक्रमण जिसकी प्रकृति जूनोटिक यानी पशुजन्य है, वह इंसान के केंद्रीय तंत्रिका तंत्र और फिर मस्तिष्क को टार्गेट करता है, और तब तक घातक होता है जब तक व्यक्ति को पोस्ट-एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस (पीईपी) न दिया जाए- यही रेबीज (Rabies) है. रेबीज वायरस अब तक के सबसे घातक वायरस में से एक है और जानवरों के काटने (Animal Bite) के माध्यम से इंसानों में फैलता है. एक बार जब व्यक्ति संक्रमण की चपेट में आ जाता है और लक्षण दिखाई देने लगते हैं तो इस बीमारी की प्रगति को रोका नहीं जा सकता है और मृत्यु लगभग निश्चित ही होती है.

    वर्ल्ड रेबीज डे (World Rabies Day) हर साल 28 सितंबर को मनाया जाता है और इस दौरान अंतर्राष्ट्रीय संगठन और सरकारें इस घातक लेकिन निरोध्य (वो बीमारी जिसकी रोकथाम की जा सके) बीमारी के बारे में विश्व स्तर पर जागरूकता फैलाने के लिए एक साथ हाथ मिलाती हैं. रेबीज के खिलाफ यह मिशन भारत के लिए भी महत्वपूर्ण और अत्यधिक प्रासंगिक है, क्योंकि जैसा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने बताया है रेबीज के कारण होने वाली वैश्विक मौतों का लगभग 36 प्रतिशत हिस्सा अकेले भारत में है.

    रेबीज के खिलाफ भारत की जंग
    साल 2014 में विश्व स्वास्थ्य संगठन के बुलेटिन में प्रकाशित एक संपादकीय में कहा गया है कि लगभग एक दशक से भारत में रेबीज की घटना उच्च स्तर पर बनी हुई है और इसमें किसी तरह की गिरावट का कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिख रहा है. यह गंभीर स्थिति रेबीज के खिलाफ सामान्य जागरुकता की कमी के अलावा रोकथाम के उपाय जैसे- उचित पीईपी की कमी, अनियंत्रित कैनाइन (कुत्ते की) आबादी, कुत्तों का अपर्याप्त टीकाकरण, एंटी-रेबीज वैक्सीन की अनियमित सप्लाई और प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाओं में इम्यूनोग्लोबुलिन की अनियमित आपूर्ति के बारे में जागरूकता की कमी के कारण है.

    जर्नल ऑफ कम्यूनिकेबल डिजीज में साल 2006 में प्रकाशित एक अध्ययन इस बात पर प्रकाश डालता है कि भारत में रेबीज के बारे में जागरूकता की कमी कितनी व्यापक है. इस अध्ययन के परिणामों में कहा गया है कि भारत में केवल 70 प्रतिशत लोग ऐसे हैं जिन्होंने रेबीज के बारे में सुना है, सिर्फ 30 प्रतिशत लोग ऐसे हैं जो जानते हैं कि जानवरों के काटने के बाद घावों को अच्छी तरह से धोना जरूरी होता है और केवल 60 प्रतिशत लोगों को जानवरों के काटने के बाद उचित प्रोफिलैक्सिस और एक आधुनिक सेल-कल्चर से प्राप्त वैक्सीन मिल पाती है. अध्ययन में यह भी पाया गया कि रेबीज के लिए उचित प्राथमिक चिकित्सा और पीईपी का पालन करने के बजाय, अध्ययन में भाग लेने वाले ज्यादातर लोगों ने घाव पर देसी चीजें जैसे- मिर्च, हल्दी, चूना, मिट्टी का तेल या हर्बल पेस्ट जैसी चीजें लगाईं.

    भारतीय राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC),ने बताया कि अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप द्वीप समूह को छोड़ दें तो रेबीज पूरे भारत में साल भर तक रहने वाली समस्या है और यह इस तथ्य का भी उल्लेख करता है कि इंसान के मामलों में 96 प्रतिशत मृत्यु दर और बीमारी कुत्तों के काटने से जुड़ी हुई है. इसके अलावा देश में बिल्ली, भेड़िया, गीदड़, नेवला और बंदरों के काटने या खरोंचने की घटनाओं के भी सबूत मिले हैं, लेकिन बैट रेबीज को निर्णायक रूप से रिपोर्ट नहीं किया गया है. रेबीज से उत्पन्न होने वाली इस अपरिसिमत बीमारी के बोझ को पूरा करने के लिए, NCDCऔर WHO ने 2013 में राष्ट्रीय रेबीज नियंत्रण कार्यक्रम (NRCP) की स्थापना की.

    राष्ट्रीय रेबीज नियंत्रण कार्यक्रम और रेबीज प्रोफिलैक्सिस
    ट्रॉपिकल मेडिसिन एंड इंफेक्शियस डिजीज नाम की पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, कैनाइन यानी कुत्तों के काटने वाली रेबीज को पूरी तरह से रोकने का एकमात्र तरीका यही है- भारत में मानव रेबीज के मामलों का सबसे बड़ा कारण- कि कुत्तों की एक बड़ी आबादी का सामूहिक टीकाकरण किया जाए. राष्ट्रीय स्वास्थ्य पोर्टल में उल्लेख किया गया है कि इस तरह के सामूहिक टीकाकरण, जनसंख्या सर्वेक्षण और कुत्तों की निगरानी और इस आबादी का उचित प्रबंधन NRCP की रणनीति का प्रमुख हिस्सा है.

    जब मानव घटक की बात आती है, तो NRCP की रणनीति में मानव रेबीज की घटनाओं पर मजबूती से निगरानी रखना, बीमारी और प्रोफीलैक्सिस के बारे में बेहतर जागरूकता फैलाना, हेल्थ प्रफेशनल्स को उचित प्रशिक्षण देना ताकि वे रेबीज इम्यूनोग्लोबुलिन को मरीज को सही तरीके से देना सीख पाएं. रेबीज प्रोफिलैक्सिस को लेकर राष्ट्रीय दिशा निर्देशों में, एनआरसीपी ने निम्नलिखित प्राथमिक चिकित्सा और प्रोफिलैक्सिस चरणों की सिफारिश की है:

    • किसी भी गर्म-खून वाले (हॉट-ब्लडेड) जानवर जैसे-कुत्ते, बिल्ली, भेड़िया, सियार, आदि द्वारा काटे जाने या खरोंचे जाने के तुरंत बाद पोस्ट-एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस या पीईपी की शुरुआत कर देनी चाहिए. यदि कुत्ते या बिल्ली द्वारा काटा गया हो तो उस जानवर को भी करीब 10 दिनों तक निगरानी में रखा जाना चाहिए फिर चाहे उसे पहले टीकाकरण दिया गया हो या नहीं.

    • चूंकि रेबीज वायरस जानवर के काटने या खरोंच के माध्यम से मानव शरीर में प्रवेश करता है, इसलिए बेहद महत्वपूर्ण है कि जानवरों के सभी लार (उसमें मौजूद वायरस भी) को घाव वाले हिस्से से अच्छी तरह से साफ किया जाए और इसके लिए साबुन और पानी से, पोविडिन-आयोडिन या इसी तरह के अन्य पदार्थों से कम से कम 15 मिनट के लिए अच्छी तरह से घाव को धोएं. रेबीज वायरस को मारने और शरीर से हटाने में यह कदम महत्वपूर्ण है.

    • मिर्च, हल्दी, चूना, जैसी उत्तेजना पैदा करने वाली चीजों को घाव पर लगाना अनावश्यक है और यह नुकसानदायक हो सकता है इसलिए इससे बचना चाहिए.

    • घाव को अच्छी तरह से धोने और सुखाने के बाद, पोविडोन-आयोडीन जैसे एंटीसेप्टिक एजेंट्स का इस्तेमाल करें.

    • घाव को बंद करने की सिफारिश नहीं की जाती है और जब तक कि बिल्कुल आवश्यक न हो, तब तक घाव में टांका लगाने से बचें.

    • रेबीज इम्यूनोग्लोबुलिन को जितनी जल्दी हो सके गहराई में और जानवर द्वारा काटने वाली जगह पर मौजूद घाव के आसपास वाली जगह पर मौजूद वायरस को बेअसर करने के लिए लगाना चाहिए. घाव में सेप्सिस होने से रोकने के लिए टेटनस इंजेक्शन और एंटीबायोटिक का एक कोर्स भी लिया जाना चाहिए. अधिक जानकारी के लिए हमारा आर्टिकल रेबीज के लक्षण, कारण, इलाज के बारे में पढ़ें.न्यूज18 पर स्वास्थ्य संबंधी लेख myUpchar.com द्वारा लिखे जाते हैं. सत्यापित स्वास्थ्य संबंधी खबरों के लिए myUpchar देश का सबसे पहला और बड़ा स्त्रोत है. myUpchar में शोधकर्ता और पत्रकार, डॉक्टरों के साथ मिलकर आपके लिए स्वास्थ्य से जुड़ी सभी जानकारियां लेकर आते हैं.


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