Holi 2021Poetry: मन के भावों के रंग जब उड़ने लगे, तब बन कर कविता वो शब्दों को रंगने लगे…

Holi 2021: शब्दों में जब घुलता है भावों का रंग बनती है कविता और सराबोर होता है खुशी से मन. Image/shutterstock

Holi 2021: शब्दों में जब घुलता है भावों का रंग बनती है कविता और सराबोर होता है खुशी से मन. Image/shutterstock

Holi Poetry: मन जब भावों से ओतप्रोत होने लगता है तब इससे रंगों की तरह अलग-अलग तरह के भाव फूटने लगते हैं और जब ये भाव कागज पर शब्दों की शक्ल में उतरते हैं तो फिर मनती है कविता की होली. तभी तो सदियों से होली के उत्सव में कविताएं (Poems) और छंद अपना रंग भरते रहे हैं जो न तो किसी युग में उतरा है और न ही फीका पड़ा है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 27, 2021, 1:18 PM IST
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Holi Poetry:  होली (Holi) मन के उल्लास का उत्सव है. इसका खुमार ही ऐसा होता है कि यह हर किसी को अपने रंग में रंग डालता है, फिर चाहे वह जनमानस हो,कलाकार हो या कवि. कवि और कविता (Poem) का तो इससे जैसे एक अटूट और अनूठा सा नाता है, जो सदियों (Centuries) से अपने रंग से लोगों के दिलों को भिगोता चला आ रहा है. होली पर पद्य (Poetry) का रंग न तो किसी सदी में उतरा है और न ही फीका पड़ा है. रंगों के इस उत्सव में प्रेयसी को रिझाने के लिए अगर प्रेमी गीतों और कविताओं का सहारा लेते आए हैं, तो संत और उपासक भी अपने आराध्य की भक्ति के रंग में ऐसे रंगें कि उनके शब्दों में घुला भावों का रंग पदो और छंदों में उतर आया है. तन-मन की सुध भुलाए बस फिर उनका मन, हर मौसम, हर उत्सव में खुशी के रंग में सराबोर रहा और रंगों के उत्सव में भी उन्होंने अपने आराध्य के लिए प्रेम में पगे फाग के तराने ही गाए, फिर चाहे वो सूरदास हों, मीरा बाई हों या अमीर खुसरो.आप भी इस साल की होली में हमारे संग भावों के रंगों से भीगी कविताओं और पदो का आनंद लीजिए.

कृष्ण कन्हैया के बृज से तो होली का अटूट नाता है और उनकी भक्ति में लीन भक्तों ने अपने प्रेम भावों का रंग पदो और छंदों से अपने आराध्य पर लगाया.16 वीं सदीं के कृष्णभक्ति में पगे संत सूरदास जी के होली पर अपने आराध्य के लिखे गए पदों के बिना होली के रंग कैसे खिल सकते हैं भला.  

चिरजीयो होरी को रसिया चिरजीयो.

ज्यों लो सूरज चन्द्र उगे हैं, तो लों ब्रज में तुम बसिया चिरजीयो.
नित नित आओ होरी खेलन को, नित नित गारी नित हंसिया चिरजीयो.

सूरदास प्रभु तिहारे मिलन को, पीत पिछोरी कटि कसिया चिरजीयो.

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कृष्ण की भक्ति में मीराबाई की बात न हो तो हर रंग फीका सा लगता है. वो तो कृष्ण के रंग में ऐसी रंगीं थीं कि अपनी सुध-बुध गवां बैठी थीं.मीरा पूर्व मध्यकाल की कवयित्री हैं जो आज भी कृष्ण के लिए लिखे गए अपने पदों के लिए मशहूर हैं.  

होरी खेलनकू आई राधा प्यारी हाथ लिये पिचकरी.

कितना बरसे कुंवर कन्हैया कितना बरस राधे प्यारी.

सात बरसके कुंवर कन्हैया बारा बरसकी राधे प्यारी.

अंगली पकड मेरो पोचो पकड्यो बैयां पकड झक झारी.

मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर तुम जीते हम हारी.

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राग होरी सिन्दूरा

फागुन के दिन चार होली खेल मना रे.

बिन करताल पखावज बाजै अणहदकी झणकार रे.

बिन सुर राग छतीसूं गावै रोम रोम रणकार रे.

सील संतोखकी केसर घोली प्रेम प्रीत पिचकार रे.

उड़त गुलाल लाल भयो अंबर, बरसत रंग अपार रे.

घटके सब पट खोल दिये हैं लोकलाज सब डार रे.

मीराके प्रभु गिरधर नागर चरणकंवल बलिहार रे.

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चन्द्रसखी उत्तर मध्यकाल के कृष्ण भक्त कवि थे.मीरा की तरह ही सांसारिक बंधनों से आजिज आकर उन्होंने श्रीकृष्ण की शरण ली और अपने काव्य के जरिए भक्ति के रंग में रंग गए.कृष्ण के संग उन्होंने अपनी रचनाओं के संग होली खेलने को साकार किया.  

बाबा नन्द के द्वार मची होरीबाबा नन्द के द्वार मची होरी.कै मन लाल गुलाल मंगाई, कै गाड़ी केशर घोरी.दस मन लाल गुलाल मंगाई, दस गाड़ी केशर घोरी.कौन के हाथ कनक पिचकारी, कौन के साथ रंग की पोरी.कृष्ण के हाथ कनक पिचकारी, मनसुख हाथ रंग की पोरी.कै री बरस के कुंवर कन्हैया, कै री बरस राधा गोरीसात बरस के कुंवर कन्हैया, पांच बरस की राधा गोरी.घुटुवन कीच भई आंगन में, खेलैं रंग जोरी जोरीचन्द्रसखी भजु बालकृष्ण छवि बाबा नंद खड़े पोरी.

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प्रेम में क़ैद सईद इब्राहीम उर्फ रसखान ने वृंदावन और मथुरा को ही अपना आशियाना बना लिया था. उनकी रचनाओं को कई आलोचक और विद्वान सूरदास की रचनाओं के बराबर मानते हैं. कृष्ण के साथ होली को उन्होंने अपने सवैया और कवित्व से रंग दिया है.  

सवैया

फागुन लाग्‍यो जब तें तब तें ब्रजमंडल धूम मच्‍यौ है.

नारि नवेली बचैं नहिं एक बिसेख यहै सबै प्रेम अच्‍यौ है.

साँझ सकारे वही रसखानि सुरंग गुलाल लै खेल रच्‍यौ है.

को सजनी निलजी न भई अब कौन भटू जिहिं मान बच्‍यौ है.

कवित्‍त

आई खेलि होरी ब्रजगोरी वा किसोरी संग.

अंग अंग अंगनि अनंग सरकाइ गौ.

कुंकुम की मार वा पै रंगति उद्दार उड़े,

बुक्‍का औ गुलाल लाल लाल बरसाइगौ.

छौड़े पिचकारिन वपारिन बिगोई छौड़ै,

तोड़ै हिय-हार धार रंग तरसाइ गौ.

रसिक सलोनो रिझवार रसखानि आजु,

फागुन मैं औगुन अनेक दरसाइ गौ.

रीतिकाल के खत्म होते- होते नज़्म के पिता कहें जाने वाले नज़ीर अकबराबादी का कृष्ण प्रेम मिसालें पेश कर रहा था. उनके कृष्ण भक्ति में रचे गए काव्य की तुलना रसखान से की गई.  

जब खेली होली नंद ललन हंस हंस नंदगांव बसैयन में.

नर नारी को आनन्द हुए खु़शवक्ती छोरी छैयन में.

कुछ भीड़ हुई उन गलियों में कुछ लोग ठठ्ठ अटैयन में.

खु़शहाली झमकी चार तरफ कुछ घर-घर कुछ चौपय्यन में.

डफ बाजे, राग और रंग हुए, होली खेलन की झमकन में.

गु़लशोर गुलाल और रंग पड़े हुई धूम कदम की छैयन में.

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अबुल हसन यमीनुदीन खुसरो जो आम लोगों में अमीर खुसरो के नाम से मशहूर थे. वह सूफ़ी गायक, कवि और रहस्यवादी थे.अपने आध्यात्मिक गुरू दिल्ली के निजामुदीन औलिया की शान में उन्होंने भी होली पर सूफी रंगों में अपनी इबादत को अंजाम दिया.  

हजरत ख्वाजा संग खेलिए धमाल

हजरत ख्वाजा संग खेलिए धमाल,

बाइस ख्वाजा मिल बन बन आयो

तामें हजरत रसूल साहब जमाल.

हजरत ख्वाजा संग...

अरब यार तेरो (तोरी) बसंत मनायो,

सदा रखिए लाल गुलाल.

हजरत ख्वाजा संग खेलिए धमाल.

कविता साभार- कविताकोश और हिंदी कविता डॉट कॉम
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