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मर्द पिटने पर हंसते हैं, इसलिए इतनी आसानी से किसी को पीट भी देते हैं

Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: September 23, 2019, 3:26 PM IST
मर्द पिटने पर हंसते हैं, इसलिए इतनी आसानी से किसी को पीट भी देते हैं
प्रतीकात्‍मक चित्र

हिंसा के साथ मर्दों का जैसा रिश्‍ता है, वो यूं ही नहीं है. वो अपने पिटने पर हंस रहे हैं, इसलिए इतनी आसानी से किसी को भी पीट देते हैं. अगर खुद को चोट लगने पर आप हंस रहे थे तो किसी को चोट पहुंचाते हुए भी आप हंस ही रहे होंगे.

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  • Last Updated: September 23, 2019, 3:26 PM IST
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बहुत पुरानी बात हुई. रोज की तरह न्‍यूजरूम में सुबह की मीटिंग का वक्‍त था. जैसाकि सभी दफ्तरों की सभी मीटिंगों में होता है, ढेर सारे पुरुष और कुछ गिनी-चुनी औरतें. खबर का मजमून कुछ ऐसा हुआ कि बात बच्‍चों के साथ होने वाली हिंसा की ओर मुड़ गई. बचपन में घर या स्‍कूल में पड़ी मार, मास्‍टर जी की लंबी छड़ी, मुर्गा बनने की यादें और वो तमाम तरह की सजाएं, जिसकी कहानियां उस न्‍यूजरूम में तकरीबन सबके पास थीं.

मर्दों ने अपनी कहानियां सुनानी शुरू कीं. सुनाते हुए वो हंस-हंसकर दोहरे हुए जाते. उनकी कहानियों में काफी ह्यूमर था. कनपटी के नीचे चार चपाटे, गालों पर थप्‍पड़ तो फूलों की तरह बरस रहे थे. कान खींचकर दो झापड़ रसीद कर देना तो मामूली मजमून था. मुर्गा बनना रोज की कहानी थी. सिर फूटना, हड्डी टूटना सालाना आयोजन था. छड़ी, बेंते, जूता, चप्‍पल, झाडू तो उनकी कहानियों में चांद-सितारों की तरह सजे हुए थे. वो काफी लहालोट होकर बताते रहे कि कैसे उठते-बैठते, चलते-फिरते किसी का लपिड़याते, लतियाते चलना उनके लिए दाल-भात था. पूरे बचपन वो ऐसे ही मार खाते बड़े हुए, लेकिन मजाल है जो शैतानियों से बाज आए हों. उन्‍होंने काफी गर्व से बताया और अपने लिए ऐसे शब्‍दों का इस्‍तेमाल किया कि वो दर कमीने थे और पिटना उनका रोज का काम था.

वो काफी खुश थे कि एक बार फिर अपने बचपन में डूबकर वो यादों के ऐसे नायाब नगीने ढूंढ लाए हैं. उनका बस चलता तो छाती पर मेडल की तरह चिपकाकर चलते.
ज्‍यादातर मर्दों ने ही सुनाई अपने पिटने की कहानी और गिनी-चुनी लड़कियां, औरतें सुनती रहीं.

वो चुप ही रहीं. कुछ नहीं कहा कि बचपन में पिटकर उन्‍हें कितना मजा आया था.
एक कहानी मेरी भी थी. मैं बमुश्किल पांच लाइनों में सुनाई. वो सुनकर हंसे.
मैं सुनाते हुए भी डर रही थी, सुनाने के बाद दिल और डूब गया.वो कहानी कुछ यूं थी.



मैं दूसरी क्‍लास में रही होऊंगी. एक मास्‍टर जी थे, तुलसीराम पांडेय. क्‍लास में कुछ पढ़ा रहे होंगे. मेरा ध्‍यान उनके पढ़ाने से ज्‍यादा बगल में बैठी मेरी सहेली से बात करने में था. जाहिर हम इतनी जोर से नहीं बोल रही थीं कि क्‍लास डिस्‍टर्ब होती. हम सिर्फ आपस में खुसुर-पुसुर कर रही थीं. मास्‍टर जी ने देख लिया. उन्‍होंने मुझे इशारे से अपने पास बुलाया. मैं डरती हुई पहुंची. उन्‍होंने मुझे अपनी दोनों हथेलियां आगे बढ़ाने को कहा. उनकी कुर्सी के पाए से टिकी बेंत की लंबी सी छड़ी उठाई और मुझे मारना शुरू किया. एक-एक कर दोनों हथेलियों पर. जब उन्‍होंने पहली बेंत मारी तो मुझे गिनने को कहा. मैं चुप रही. खुद बोले एक, और दूसरी थोड़ी और जोर से मारते हुए फिर मुझे गिनने को कहा. मैं इस बार भी चुप रही. फिर उन्‍होंने तीसरी बेंत मारी और फिर गिनने को कहा. फिर चौथी. फिर पांचवी. याद नहीं, वो कौन से नंबर की बेंत थी, जो इतनी जोर से लगी कि मैंने उनकी बात मान ली और गिनना शुरू कर दिया. मुझे बस इतना याद है कि उसके बाद मैंने 41 तक गिना था. चालीसवें तक अपनी रूलाई रोके रखी थी और 41वें में फूट पड़ी. वो भी कोई जोर-जोर से फफक-फफककर रोना नहीं था. बस उतना सा रोना था, जो अपनी पूरी ताकत से रोकने, जज्‍ब कर लेने की कोशिश के बाद भी रुका नहीं. जब मैं रोने लगी तो उन्‍होंने मारना बंद कर दिया. उसके बाद क्‍या हुआ याद नहीं. बस 41 तक गिनना याद है. बेंत के हवा में सरसराने और हथेली पर पड़ने की आवाज याद है. तुलसीराम पांडेय की बेशर्म आंखें याद हैं, जिनमें जरा भी करुणा नहीं थी और याद है वो डर, जो उसके बाद से लगने लगा था. उस घटना के बाद मैं इतना डरने लगी थी कि टीचर क्‍लास में न हो तो भी किसी दोस्‍त से बात नहीं करती.

फिर वक्‍त गुजरा. मैं बड़ी हो गई और वो 41 छडि़यां भूल गई.



फिर बहुत साल बात एक बार मैं मां के साथ कहीं जा रही थी. इलाहाबाद के स्‍टैनली रोड पर अचानक एक आदमी मिला. उसने मां को नमस्‍ते किया, मां ने उसे. मैं पहचान नहीं पाई. मां ने कहा, अरे पहचाना नहीं, तुलसीराम जी. तुम्‍हें पढ़ाया है.

जैसे ही मैंने उसे पहचाना, अचानक बहुत असहज हो गई. 22-23 साल उमर रही होगी. उस घटना को बहुत साल बीत चुके थे. अब मैं उमर, देह, बल सब में बड़ी थी. हथेलियों में ज्‍यादा ताकत थी. विरोध की भाषा थी. कोई कुछ गलत कहे, करे तो बोल पाती थी, पलटकर जवाब दे पाती थी. मैं देह और मन दोनों से ज्‍यादा बलवान हो गई थी और भूल भी गई थी उन 41 बेंतों को. लेकिन अचानक उस आदमी को देखकर जाने क्‍या हुआ कि मैं बुरी तरह घबरा गई. मुझे डर लगा, लेकिन मैंने कहा नहीं. मैं असहज हुई लेकिन जाहिर नहीं होने दिया. मुझे लगा था कि मैं भूल गई हूं, लेकिन वो डर इतने सालों बाद भी मेरे अवचेतन में कहीं था. आज भी है. वो आदमी कहीं दिख जाए तो शायद मैं आज भी सहज न हो पाऊं.

मेरी कहानी किसी को इतनी भी दुखदायी नहीं लगी, जितनी उसकी याद भर मुझे आज भी लगती है.
मेरा दिल आज भी ये सोचकर डूबने लगता है कि उस बच्‍ची का अपराध क्‍या था कि उस 41 बेंते मारी गईं. ये कि वो क्‍लास में सहेली से बतिया रही थी. मुझे डर लगता है ये सोचकर कि मुश्किल से 20 किलो वजन वाली 7 साल की बच्‍ची के नाजुक हाथों ने 41 बेतें कैसे खाई होंगी. कैसे उसने उस तकलीफ को, आंसुओं को दबाया होगा. क्‍लास के बाकी बच्‍चे क्‍या सोच रहे थे उस वक्‍त, जब वो पिट रही थी. सबके सामने इस तरह मार खाने से उसके आत्‍मसम्‍मान का क्‍या हुआ. वो कितना आहत, कितना अपमानित महसूस कर रही होगा. उसने अपने डर का क्‍या किया. कैसे सहा, कैसे सहा अकेले.
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सालों पुरानी सुबह की उस मीटिंग का जिक्र मैंने इसलिए नहीं किया कि बता सकूं कि मर्दों की कहानी और मेरी कहानी में क्‍या फर्क है. मैंने ये जिक्र इसलिए किया कि बता सकूं कि हिंसा को देखने की उनकी नजर और मेरी नजर में क्‍या फर्क है.

बात सिर्फ इतनी नहीं है कि हिंसा को हमने कैसे देखा, कैसे समझा, कैसे याद रखा. बात ये है कि हमने जैसे देखा, जैसे समझा, जैसे याद रखा, उसने हमें वो बनाया, जो हम हैं. अगर खुद को चोट लगने पर आप हंस रहे थे, या उस चोट को सहने का ये तरीका आपने सीखा और सिखाया कि हंसो और हंसी में उड़ा दो तो किसी को चोट पहुंचाते हुए भी आप हंस ही रहे होंगे. हिंसा के साथ मर्दों का जैसा रिश्‍ता है, वो यूं ही नहीं है. वो अपने पिटने पर हंस रहे हैं, इसलिए इतनी आसानी से किसी को भी पीट देते हैं. किसी पर हाथ उठा देना, मुंह से अपमानजनक बात कह देना, किसी का दिल दुखा देना, असंवेदनशील ढंग से बात करना, कुछ भी कह देना, बिना इस बात की परवाह किए कि इससे तकलीफ पहुंच सकती है, उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं. ये यूं ही नहीं है कि मर्द औरतों के मुकाबले ज्‍यादा असंवेदनशील और कठोर होते हैं. वो ऐसे हैं क्‍योंकि वो ऐसे होने को देख ही नहीं पा रहे. या ऐसा होना ही उनके लिए सहज होना है.
और पता है, इस पूरे होने की सबसे दुखद बात क्‍या है.

इस होने ने सबसे ज्‍यादा नुकसान उन्‍हीं का किया है और ये बात उन्‍हें पता भी नहीं.
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First published: September 19, 2019, 2:33 PM IST
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