आपकी ससुराल कश्मीर में नहीं, मंगल ग्रह पर होनी चाहिए

370 हटने के वृहत्तर राजनीतिक अर्थ क्या होंगे, ये एक अलग सवाल है, लेकिन फिलहाल गोबर पट्टी के मर्दों की नजर जिन दो चीजों पर टिकी है, जोरू और जमीन, उसके वृहत्तर अर्थ को डिकोड करने की जरूरत है.

Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: August 8, 2019, 11:58 AM IST
आपकी ससुराल कश्मीर में नहीं, मंगल ग्रह पर होनी चाहिए
प्रतीकात्मक चित्र
Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: August 8, 2019, 11:58 AM IST
औरतों ने खामखा मर्दों के खिलाफ सिर पर पहाड़ उठा रखा है, वरना जितना दिलोजान उन पर लुटाने को मर्द तैयार बैठे हैं, उतना कौन ही लुटाएगा. पान की हर पीक पर पाकिस्तान के नाम को गालियां निकालने वाले प्रतापगढ़ के एक मर्द को एक बार कहते सुना था कि मुसलमानों से बदतर कौम दुनिया में दूसरी नहीं, लेकिन उनकी औरतों के क्या कहने. ऐसी नर्म-मुलायम जैसे मक्खन का लोंदा. उनकी मानें तो आसमान तक पहुंचने वाली एक बड़ी सी जेसीबी मशीन से पूरे पाकिस्तान को खोदकर जमींदोज कर देने से पहले वो उनकी औरतों को वहां से निकाल लाते क्योंकि ऐसी खूबसूरत चीजें ऐसे दोजखी अंत के लायक नहीं. वो अब तक अपने मर्दों की आबरू थीं, अब हम अपनी बना लेंगे.

पान की पीकों से रंगे ऐसे मंसूबे पालने वाले वो जनाब अकेले नहीं हैं दुनिया में. दिल्ली के भोगल इलाके में मैंने पान वालों, दुकान वालों, सब्जी वालों और यहां तक कि सो कॉल्ड पढ़े-लिखे मर्दों को भी वहां पर थोक के भाव नजर आने वाली अफगानी औरतों को हरसत से निहारते देखा है. बल्कि यूं कहूं कि उन्हें देखकर पूरी बेशर्मी से लार टपकाते देखा है. और सिर्फ पाकिस्तान-अफगानिस्तान ही नहीं, ईरान-इराक-सीरिया और फलस्तीन तक के मुसलमानों के नाम को रोने वाले हिंदुस्तानी मर्द वहां की औरतों के नाम पर ऐसे नहीं रोते, बल्कि औरत नाम के जिक्र भर से उनकी बांछें खिल जाती हैं.

कश्मीर के नाम को रोने वाले भी उनकी औरतों के नाम को कब रोए. गुलमर्ग की वादियां और वहां की औरतों की हसीन सूरत के कायल तो वो हमेशा से थे. इसलिए अनुच्छेद 370 हटने के बाद से फेसबुक स्टेटस से लेकर ट्विटर के मीम्स तक में वहां की औरतों को लेकर मर्दों ने जैसे-जैसे अरमान निकाले हैं, उसे देखकर आपको दुख हो सकता है, अचंभा तो बिलकुल नहीं होगा.

संसद में बिल पास होते ही सोशल मीडिया पर लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि अब उनके भाई की ससुराल कश्मीर में होगी. पूरा कश्मीर ही फैसले के दौरान नजरबंद था, लेकिन उत्तर भारतीय सपूतों का कलेजा उनकी लड़कियों के नाम को कराहने लगा. बोले, “महबूबा मुफ्ती को रखिए नजरबंद, लड़कियों को तो नजरबंद मत कीजिए.” अरमानों की बाढ़ आ गई. ऐसे-ऐसे मंसूबे कि कहने ही क्या.



इस नए सियासी फैसले से दरअसल हुआ ये है कि पूरे उत्तर भारत की मर्दानगी को अपना सुनहरा भविष्य अब कश्मीर की वादियों में दिखाई दे रहा है. सबके मन में इस बात के लड्डू फूट रहे हैं कि अब वो कश्मीरी लड़की से शादी कर पाएंगे, जैसेकि अब तक संविधान में लिखा था कि शादी करना मना है. ये हाल उनका है, जिनकी अम्मा जात बाहर वालों का थाली-लोटा भी अलग रखती हैं. जिनकी अम्मा अगर थोड़ी उदार हुईं तो कहती हैं कि “बेटा, चाहे जिससे बियाह कर लेना, मुसलमानी और क्रिस्तानी से न करना.” हरियाणा के अरमानों को तो ऐसे पंख लगे हैं कि उनका रॉकेट चंद्रयान की स्पीड से सीधा पहलगाम जा पहुंचा है. अपनी मर्जी से जात बाहर शादी कर लेने पर अपनी लड़कियों को जिंदा जमीन में गाड़ देने और पेड़ पर लटका देने वाले हरियाणा-पंजाब में एक गाना तेजी से पॉपुलर हो रहा है, जिसमें वो कहता है कि 370 हट गई, अब कश्मीरी छोरी ब्याहकर लाऊंगा. अपनी लड़कियों को पेट में और दुनिया में मारकर सारा जेंडर रेश्यो बिगाड़ रखा है. अब इनकी नजर कश्मीर पर है.

370 हटने के वृहत्तर राजनीतिक अर्थ क्या होंगे, ये एक अलग सवाल है, लेकिन फिलहाल गोबर पट्टी के मर्दों की नजर जिन दो चीजों पर टिकी है, जोरू और जमीन, उसके वृहत्तर अर्थ को डिकोड करने की जरूरत है. कश्मीर के बाहर पूरा देश और खासतौर पर उत्तर भारत इस वक्त जिस एहसास में डूबा है, वो है जीत का एहसास. जैसे किसी को हराकर उस पर कब्जा कर लिया हो.
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याद करिए इतिहास के युद्ध और लड़ाइयां. कभी ऐसा नहीं हुआ कि विजयी पक्ष ने पराजित पक्ष की औरतों और बच्चों को भी दुश्मन समझकर मार दिया हो. मर्द मारे जाते थे और औरतें विजयी सम्राट के हरम में भर दी जाती थीं. औरतों और बच्चों को मारने का काम पहली बार नाजियों ने किया. उसकी वजह दूसरी थी. वो पूरी यहूदी कौम को ही मिटा देना चाहते थे. ये जेनेटिक श्रेष्ठता का मसला था. वरना मार-काट से इंसानों की मुहब्बत का आलम तो ये है कि 16वीं सदी से ये युद्ध में मुब्तिला हैं. चाहे यूरोप में कैथलिक और प्रोटेस्टेंट के बीच सत्ता की लड़ाई हो, चाहे ईसाइयत और इस्लाम की लड़ाई हो, ईसाइयों और यहूदियों की लड़ाई हो, यहूदियों और मुसलमानों की लड़ाई हो या फ्रांस, स्पेन, जर्मनी और अमरीकियों के अपने घर में समय-समय पर छिड़ी लड़ाई यानी सिविल वॉर हो. सारी लड़ाइयां मर्दों की आपसी लड़ाइयां थीं, जिसका मकसद था दूसरे मर्द की जमीन, उसकी सत्ता, उसकी ताकत, उसकी दौलत और उसकी औरत पर कब्जा करना.

ये कहावत यूं ही नहीं बनी कि दुनिया की हर लड़ाई की जड़ में है जर और जोरू क्योंकि इन दोनों ही चीजों पर मर्दों का मालिकाना हक है. हम जिसे जीत लेंगे, उसकी संपत्ति पर मालिकाना हक हमारा होगा.
कश्मीर की औरतों को लेकर निकले सारे उद्गारों के पीछे भी यही मानसिकता काम कर रही है. अब तुम्हारी जमीन हमारी, तुम्हारी औरतें हमारी.



कश्मीर की औरतें उत्तर भारत के आदमी का पहला निशाना नहीं हैं. दुनिया में जहां कहीं, जो भी औरत है, ये सबको एक ही नजर से देखते हैं. औरतों को जहां पा जाएं, ऐसे ही लार टपकाते घूमते हैं. मुंबई में मरीन ड्राइव, बैंड स्टैंड और यहां तक कि जुहू और वर्ली सी फेस जैसे पब्लिक प्लेस पर भी लड़के-लड़कियों का बांहों में बांहे डालने बैठना, चूमना बहुत आम है. लेकिन फिलहाल आप उसे मत देखिए. आप उस जोड़े को ताड़ रहे लोगों को देखिए. ऐसा कुछ भी देखकर उनकी आंखें उस दृश्य से ऐसे चिपक जाती हैं, जैसे इमरती पर चींटा चिपक जाए. मर जाएगा, लेकिन इमरती छोड़ेगा नहीं. और ये सारी नजरें एक खास तरह के मर्दाने चरित्र की नुमाइंदगी कर रही होती हैं. सब वही उत्तर भारतीय लंपट, जो इस वक्त कश्मीर के नाम को बौराए हैं.

मर्दानगी का असली चेहरा यही है. हर जगह, हर वक्त औरत इनके निशाने पर है. ये अपनी लड़कियों को संदूक में बंद करके रखते हैं, दूसरे की लड़कियों को अपना माल समझते हैं. ये मनोरोगी हैं. ये अपनी ही औरतों के लायक नहीं, दुनिया की और किसी भी औरत के क्या लायक होंगे.

वैसे इन्होंने ये नहीं बताया कि सिर्फ अपनी ही ससुराल चाहते हैं कश्मीर में या बहन की भी चलेगी. सीता संग सज्जाद. बारात फ्रॉम देवरिया टू सोनमर्ग. वैसे ये दूसरा वाला आइडिया बुरा नहीं है.

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First published: August 7, 2019, 5:50 PM IST
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