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जितना मिल जाए, पर कम क्यों लगने लगता है पैसा ?

जितना मिल जाए, पर कम क्यों लगने लगता है पैसा ?

जीने के लिए कितना पैसा चाहिए?

जीने के लिए कितना पैसा चाहिए?

सवाल ये कि जीने के लिए पैसा तो चाहिए, लेकिन कितना चाहिए? आप कहेंगे, ‘पर्याप्त पैसा.’ लेकिन कितना पैसा ‘पर्याप्त पैसा’ होता है?

    "पैसा एक नई तरह की दासता है. पुरानी गुलामी की नजर से इसे ऐसे समझिए कि मालिक और दास के बीच कभी इंसानियत का रिश्ता नहीं होता."
    - लिओ तोल्स्तोय

    पैसा किसे नहीं चाहिए? हवा, पानी के बाद तीसरी सबसे बड़ी जरूरत यही है. रोटी नहीं कह रही, क्योंकि वो भी पैसे से आएगी. और शुक्र है कि हवा और पानी, दोनों फिलहाल मुफ्त हैं.

    तो सवाल ये कि जीने के लिए पैसा तो चाहिए, लेकिन कितना चाहिए?
    आप कहेंगे, ‘पर्याप्त पैसा.’
    लेकिन कितना पैसा ‘पर्याप्त पैसा’ होता है?

    18वीं सदी के ब्रिटिश दार्शनिक और अर्थशास्त्री जॉन स्टुअर्ट मिल की एक प्रसिद्ध थियरी है- “थियरी ऑफ यूटिलिटी.” आपने स्कूल में पढ़ी होगी. मेरे स्कूल की इकोनॉमिक्स की किताब हिंदी में थी और उस किताब में इस थियरी को हिंदी में लिखा गया था- “तुष्टिगुण का सिद्धांत” और उसे कुछ यूं समझाया गया था. मान लीजिए आपको आम खाने का मन है. आप एक आम खाते हैं और उससे आपको बहुत सारा तुष्टिगुण मिलता है. समझने की सुविधा के लिए उससे मिलने वाले तुष्टिगुण को एक नंबर दे देते हैं-10. तो पहला आम खाने से 10 तुष्टिगुण मिला. फिर दूसरा आम खाया तो उससे 12 क्योंकि एक खाने के बाद आपकी खाने की इच्छा और बढ़ गई. फिर तीसरा खाया तो 8 क्योंकि अब तक पेट थोड़ा भर चुका है. फिर चौथा खाया तो 5 क्योंकि अब पेट और मन दोनों भर रहा है. फिर पांचवा खाया तो 2. इस तरह अब आगे के आमों से मिलने वाला तुष्टिगुण कम होता जाएगा. तुष्टिगुण यानी उससे मिलने वाला संतोष और खुशी.
    क्या यही बात पैसों पर भी लागू नहीं होती?

    कोरा पर किसी ने सवाल पूछा था कि जीने के लिए हमें कितना पैसा चाहिए. उसमें से एक जवाब को न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपने लेख में छापा. वो जवाब कुछ यूं था-

    1 - फर्ज करिए आप साल में एक लाख रु. कमाते हैं. इतने कम पैसों में तो आप न ढंग के घर में रह सकते हैं, न ढंग का खाना खा सकते हैं. जिंदगी की बाकी जरूरतें पूरी करना भी मुश्किल है. आपकी जिंदगी अच्छी नहीं. आपको और पैसों की जरूरत है.

    2 - अब फर्ज करिए कि आप साल में 10 लाख रु. कमा रहे हैं. इतने पैसों में आप सम्मानजनक ढंग से जीवन गुजार सकते हैं. आलीशान नहीं, लेकिन आरामदायक घर में रह सकते हैं, अच्छा खा सकते हैं और जीवन की सारी बुनियादी जरूरतें बहुत सहजता से पूरी कर सकते हैं.

    3 - अब फर्ज करिए कि आप साल में 50 लाख कमाते हैं. ये आरामदायक जिंदगी से कहीं ज्यादा आराम की बात है. ये लक्जरी की बात है.

    4- और अगर आप साल के 100 लाख कमा रहे हैं तो इनसैनिटी की तरफ बढ़ रहे हैं.

    हम इनमें से क्या होना, क्या पाना चाहते हैं- सहजता, आराम, लक्जरी, इनसैनिटी?

    कितना पैसा मतलब ‘पर्याप्त पैसा’?
    कितना पैसा मतलब ‘पर्याप्त पैसा’?


    कितना पैसा?
    कितना पैसा मतलब पर्याप्त पैसा?
    कितना पैसा मतलब जीवन में खुशी?

    पैसों के साथ मेरा रिश्ता उतना ही टेढ़ा रहा है, जितना मुहब्बत के साथ. नहीं होता तो लगता है कि नहीं है, जब होता है तो लगता है, होकर भी क्या उखाड़ लिया.

    15 साल पहले जब मुझे 8,000 रु. की पहली नौकरी मिली तो मेरा पहला रिएक्शन ये था कि इतने सारे पैसे खर्च कैसे होंगे. लेकिन पैसों ने हाथ में आते ही खर्च होने के रास्ते भी ढूंढ लिए. अपने आप. जैसे उनके पैर लगे थे और उनकी आत्मा थी, जो अपनी राह खुद ढूंढ लेती थी. जब वो खुद-ब-खुद हाथ से निकल भागने लगे तो ऐसा हुआ कि मेरा उन पर बस नहीं रहा. वो न सिर्फ खर्च हुए, बल्कि कम भी पड़ने लगे. महीने के अंत में हाथ तंग होता. फिर साल गुजरते-गुजरते मुझे लगने लगा था कि बस थोड़े से और मिल जाते तो आराम ही आराम होता.

    तभी मैंने तोल्स्तोय की वो कहानी पढ़ी थी- “डेथ ऑफ इवान इल्यीच.” उसमें वो लिखते हैं, “और जैसाकि सभी मध्यवर्गीय परिवारों में होता है, उन्हें लगता है कि बस इससे थोड़ा सा और होता तो सारी जरूरतें आसानी से पूरी हो सकती थीं. इल्यीच परिवार को भी यही लगता था कि अगर मि. इल्यीच ने थोड़ी और मेहनत करके थोड़े और पैसे कमाए होते तो परिवार बहुत आराम से जीवन गुजार सकता था.”

    मेरा हाल उस इल्यीच परिवार की तरह था. मुझे बहुत ज्यादा नहीं, बस थोड़ा सा और चाहिए था. मैं खुद से कहती, मैं कोई टाटा-बिड़ला थोड़े बनना चाहती हूं. मैं तो बस थोड़ा सा और चाह रही हूं. फिर जब तंख्वाह बढ़कर 12000 हो गई तो बकौल जॉन स्टुअर्ट मिल उससे मिलने वाला तुष्टिगुण भी बढ़ गया. वो एक संतुष्टि का क्षण था. लगा कि बस, यही तो चाहिए था जीवन में. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. हमें लगता है, ये जीवन और इसके सारे फैसले हमारे अपने हैं, बिलकुल स्वायत्त. आजाद और अपने ‘स्व’ में अवस्थित. लेकिन शायद पैसे को भी यही लगता है. वो हमें ऐसे चलाता है मानो उसकी अपनी एक स्वायत्त सत्ता है, शरीर है, आत्मा है, उसका अपना बल है. उसके बाद से लेकर अब तक विवेक और संतुलन की सारी कवायदों के बाद भी कब मैं उसे चलाती रही हूं और कब वो मुझे, फर्क करना मुश्किल है. जरूरतें कब और कैसे बढ़ती गईं, पता ही नहीं चला.

    बेहतर घर, बेहतर कपड़े, बेहतर सामान, बेहतर खाना, बेहतर लाइफ स्टाइल, सबकुछ वक्त के साथ बेहतर होता गया है. लेकिन अब भी पता नहीं कि कितना बेहतर दरअसल बेहतर होता है क्योंकि इस बेहतरी में अब भी बेहतर होने की बेतरह गुंजाइश है.



    पैसों से खुशी नहीं खरीदी जा सकती. दुनिया के सारे दर्शन यही कहते पाए जाते हैं, लेकिन मैंने जिंदगी से उकताए, ऊबे हुए लोगों को अपनी ऊब मिटाने के लिए क्रेडिट कार्ड की शरण में जाते देखा है. कॉलेज के जमाने में मेरे हॉस्टल की लड़कियां अकसर ऊबती रहती थीं. पैसे वाली लड़कियां ज्यादा ऊबती थीं. उस सारी उकताहट के बीच अगर किसी दिन कोई बहुत खुश नजर आए तो समझ जाओ कि वो शॉपिंग वाला दिन था. एक नया डियो या एक मामूली सा नेल पेंट तक पाकर उस उकताहट को अलविदा कहा जा सकता था. लेकिन कितनी देर? पांच हजार रु. की शॉपिंग पांच दिन भी उस उकताहट को दूर नहीं रख पाती. आपको फिर कुछ नई चीज, नया सामान चाहिए होता ताकि आप जिंदगी से ऊबें नहीं.

    आप ऊबे हुए होते हैं, इसलिए शॉपिंग करते हैं. और शॉपिंग करते हैं, इसलिए ऊब जाते हैं. उस ऊब में हाथ में स्मार्ट फोन लिए विंडो शॉपिंग कर रहे होते हैं और बस यूं ही कुछ खरीद बैठते हैं. मैंने एक बार यूं ही झक्क में की अपनी रैंडम ऑनलाइन शॉपिंग की लिस्ट बनाई थी और पाया कि उसमें से 90 फीसदी चीजें ऐसी थीं, जिसकी मुझे कोई जरूरत नहीं थी. और जो आने के बाद भी घर के किसी कोने में पड़ी धूल खा रही थीं. मैंने वो सब सिर्फ इसलिए खरीदा क्योंकि मैं बोरियत की मारी थी और किस्मत से मेरे क्रेडिट कार्ड में पैसे थे.

    ये पैसे से हम जो भी हासिल कर रहे हैं, वो प्लेज़र है और प्लेज़र किसे नहीं चाहिए? महंगे कपड़े, महंगे रेस्त्रां में डिनर, शॉपिंग मॉल, मल्टीप्लेक्स में फिल्म, सबकुछ पैसे को प्लेज़र में बदल रहा है, लेकिन उस प्लेज़र की उम्र कितनी छोटी है. वो सिर्फ उतनी देर का खेल है, जितनी देर आप मॉल में हैं या रेस्त्रां में खा रहे हैं या सिनेमा हॉल में फिल्म देख रहे हैं. वो खुशी इतनी भी स्थाई नहीं कि अगले दिन सुबह तक टिक पाए. अगली सुबह पिछली रात के प्लेज़र की कोई स्मृति नहीं होती. कुछ तो पेंच होगा कि इतना पैसा खर्च करके भी खुशी मिल नहीं रही.



    आज हिंदुस्तान के बड़े महानगरों में आलीशान तंख्वाहों पर नौकरी कर रहे हिंदी प्रदेश के लोग अपने पिताओं की सरकारी नौकरी से दस गुना ज्यादा पैसे कमा रहे हैं. आखिर ग्लोबलाइजेशन ने ये जो इतना सारा पैसा दिया, उसका हुआ क्या? कंपनियों ने मोटी तंख्वाहें दीं तो बैंकों ने मोटा लोन. फिर सैलरी तो आई, लेकिन टिकी नहीं. सब बैंकों के पास चली गई. बाकी बची लाइफ स्टाइल के नाम हो गई. कभी ऐसे सोचकर देखिए, ये जो हर वीकेंड मॉल जाने में खर्च होता है, वो आपकी गाढ़ी मेहनत का पैसा है, जो आपने चमकीली दीवारों वाली एक इमारत में जाकर दे दिया, जहां ढेर सारी चमकीली दुकानें थीं. ढेर सारा ऐसा सामान, जिसकी दरअसल आपको कोई जरूरत भी नहीं थी. और दोबारा फिर वही सब करने के लिए आप मुंह अंधेरे उठकर दफ्तर जाते हैं और रात गए लौटते हैं. इन सबमें जिंदगी कहां है, पता नहीं.

    खेल सारा ये है कि कितना भी पैसा आ जाए, पैसा टिक नहीं रहा. वो कहीं चला जा रहा है. फिर और कमाने के लिए और मेहनत करनी पड़ रही है. फिर और जो आ रहा है, वो भी कहीं चला जा रहा है. कितनी मेहनत करनी पड़ेगी इस बात के लिए कि जो आए, वो कहीं जाए नहीं. गहरा कुचक्र है. कोई कोशिश कारगर नहीं.

    पैसों की बात चले तो मुझे डैनियल और रोमी की कहानी याद आती है. स्विटजरलैंड के बारे में मुझे लगता था कि वहां तो लोगों के पास बहुत पैसा होता होगा. और वैसे भी विदेश घूमने कोई खाली जेब तो नहीं जाता. लेकिन बात शायद पैसे होने से ज्यादा पैसों को बरतने की है. डैनियल और रोमी इंडिया घूमते हुए पब्लिक ट्रांसपोर्ट में सफर करते, सस्ती डॉरमेटरी और गेस्ट हाउस में रुकते और सस्ते ठिकानों पर खाना खाते. मुझे लक्जरी वाला आलीशान रिसोर्ट नहीं चाहिए. हम तो नदी, पानी, जंगल घूमने आए हैं न कि एसी और एलईडी वाले कमरे में सोने. और जहां तक खाने की बात है तो बस वो साफ होना चाहिए. इतनी ही शर्त है न. 100 रु. की प्लेट 500 रु. में क्यों खाना, सिर्फ इसलिए कि एंबियंस बड़ा कमाल है. मुझे कहीं खाने से पहले खाने का दाम चेक करने में शर्म आती, लेकिन उन्‍हें नहीं. ये संभलकर, देखकर, हिसाब से पैसे खर्च करना, ये विदेशी भी करते हैं, मैंने पहली बार जाना. वो ये करते थे ताकि छह महीने नौकरी करें और बाकी के छह महीने अपने मन का काम. वो दोनों अब तक जॉन स्टुअर्ट मिल का नंबर दो वाला आम ही खा रहे हैं. तुष्टिगुण 12 है.

    आप कौन से नंबर वाले आम पर हैं?
    कहीं ऐसा तो नहीं कि पेट और मन दोनों भरा है, बस आम खाने की आदत है कि जाती नहीं.

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