बच्‍चों के साथ यौन अपराध की घटनाएं कैसे घटती हैं ?

कठुआ केस इस बात का सबसे मौजूं उदाहरण है कि इंसान के मनोविज्ञान, समाज, सत्‍ता, कानून और ताकत का कैसा गठजोड़ इस तरह की पीडोफाइल क्रिमिनल एक्टिविटी में मददगार होता है.

News18Hindi
Updated: April 29, 2018, 11:17 AM IST
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Updated: April 29, 2018, 11:17 AM IST
(हमने एक नई सीरीज शुरू की है. इस सीरीज का मकसद बाल यौन अपराधी यानी पीडोफाइल के मनोविज्ञान के विभिन्‍न पहलुओं की पड़ताल करना है. आज आप इस सीरीज की तीसरी किश्त पढ़ रहे हैं. लंदन स्थित प्रतिष्ठित मनोचिकित्‍सक डॉ. द्रोण शर्मा इस सीरीज में पीडोफाइल के मनोविज्ञान के विभिन्‍न पहलुओं पर प्रकाश डालेंगे. आठ भागों में चलने वाली यह सीरीज आप रोज दोपहर 2 बजे news18hindi पर पढ़ सकेंगे. अगर आपके मन में कोई सवाल है तो आप इस पते पर हमें भेज सकते हैं – ask.life@nw18.com.) 

 इस सवाल के जवाब को कठुआ केस के उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं. एक व्‍यक्ति, जिसे ये लग रहा था कि उसे सेक्‍सुअल अर्ज है और वह उसे उसे संतुष्‍ट करना है, उसके लिए उसने निशाना बनाया एक छोटी 8 साल की बच्‍ची को. अब इस बात को अपने मन में स्‍वीकार करना है कि इसमें कुछ भी गलत नहीं है. इसे अपने मन में सही साबित करने के लिए अपराधी खुद को यह तर्क देता है कि यह लड़की एक ऐसे समुदाय से आती है, जिसे मैं पसंद नहीं करता हूं. जब आप किसी को पसंद नहीं करते या किसी व्‍यक्ति या समुदाय को अपना दुश्‍मन मानते हैं तो दिमाग अपने भीतर यह तर्क बुन लेता है कि दुश्‍मन के साथ किया गया हर गलत काम भी जायज है. वह दुश्‍मन व्‍यक्ति या समुदाय कोई भी हो सकता है.



इस तरह वह व्‍यक्ति अपने मन को इस बात की इजाजत दे देता है कि उसका काम सही है, जायज है. दूसरे व्‍यक्ति ऐसे काम करने के लिए कोई ऐसा शिकार ढूंढता है, जो विरोध न कर सके. यानी वह शारीरिक रूप से कमजोर हो. बच्‍चे, शारीरिक और सामाजिक, दोनों रूपों में कमजोर और वलनरेबल स्थिति में होते हैं. वह अपने साथ हो रही गलत चीज का पूरी ताकत से प्रतिरोध नहीं कर पाते. लेकिन कठुआ केस में उन्‍होंने पीडि़त व्‍यक्ति की तरफ से होने वाले प्रतिरोध को रोकने के लिए एक कदम और उठाया. उन्‍होंने उस बच्‍ची को दवा भी खिला दी, ताकि थोड़े-बहुत प्रतिरोध की जो संभावना हो सकती थी, वह भी खत्‍म हो गई. तो सबसे पहले उन्‍होंने अपने आपको इस बात के लिए तैयार किया कि इस तरह का काम ठीक है. फिर उन्‍होंने प्रतिरोध की संभावना को खत्‍म किया.



यहां पोर्नोग्राफी की भी भूमिका हो सकती है. हो सकता है कि उन्‍होंने स्‍नफ वीडियो देखे हों. स्‍नफ वीडियो पोर्नोग्राफी का ही एक प्रकार है. इस पोर्न में यह दिखाया जाता है कि जो रेप का शिकार हुआ है, उसे मार दिया जाए. यह बहुत ही घृणित किस्‍म के वीडियो हैं. अब इस तरह की चीजों को देखने वाले व्‍यक्ति का दिमाग भी यह स्‍वीकार करने लगता है कि यह होता है और इसमें कुछ भी गलत नहीं है.

इसके पीछे अपनी असीमित शक्ति को एंजॉय करने का मनोविज्ञान भी काम करता है. अपनी ताकत का फायदा उठा रहा व्‍यक्ति यह सोचता है कि वह शक्तिशाली है और अपने शिकार पर उसका इस हद तक नियंत्रण है कि उसने उसे मार डाला.

एक चीज होती है एम्‍पैथी या संवदेना. जब भी हम किसी के साथ कुछ गलत करते हैं तो मन का एक हिस्‍सा यह संवदेना महसूस करता है कि इससे उस व्‍यक्ति को तकलीफ महसूस हो रही होगी. लेकिन रिसर्च और अध्‍ययनों में यह देखा गया है कि पीडोफाइल एक्टिविटी में शामिल होने वाले लोगों में एम्‍पैथी या संवेदना वाला हिस्‍सा बहुत कमजोर होता है. अकसर वह दूसरे की तकलीफ को महसूस कर पाने में सक्षम नहीं होते या फिर उसके प्रतिरोध को कम करने के लिए दूसरे तरीके अपनाते हैं. जैसेकि कठुआ वाले मामले में अपराधियों ने उस बच्‍ची को नशे की दवाइयां दे दीं ताकि उसकी चीख-पुकार और प्रतिरोध को दबाया जा सके.
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इसके अलावा कई बार ऐसे अपराध सामूहिक रूप से भी किए जाते हैं. अगर किसी की पीडोफाइल प्रवृत्ति है तो वह सामान्‍य लोगों के साथ उठने-बैठने या घुलने-मिलने की बजाय ऐसे लोगों के साथ घुलना-मिलना ज्‍यादा पसंद करता है, जो उन्‍हीं के जैसी प्रवृत्ति का हो. इससे मनोवैज्ञानिक रूप से आपके दिमाग को एक तर्क और मदद मिलती है कि आप अकेले नहीं हैं. आपके जैसे और भी लोग हैं और चूंकि बहुत सारे लोग यह कर रहे हैं तो ऐसा करना ठीक है.

कठुआ मामले में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला, जहां यह क्राइम किसी एक व्‍यक्ति ने नहीं, बल्कि कई लोगों ने मिलकर सामूहिक रूप से किया. इस काम में उन्‍होंने ऐसे लोगों को भी शामिल किया, जो कानून या सत्‍ता से जुड़े हुए थे. यह भी अपने दिमाग को अपने क्राइम के बचाव में एक तर्क देने की कोशिश है. जब कोई ताकतवर लोगों के साथ मिलकर ऐसे क्राइम को अंजाम देता है तो वह सोचता है कि जब कानून से जुड़े लोग ही मेरे साथ हैं तो फिर इसमें गलत क्‍या है. अगर ये लोग भी मेरा साथ दे रहे हैं और वही कर रहे हैं, जो मैं कर रहा हूं तो फिर यह सही है.

कठुआ केस इस बात का सबसे मौजूं उदाहरण है कि इंसान के मनोविज्ञान, समाज, सत्‍ता, कानून और ताकत का कैसा गठजोड़ इस तरह की पीडोफाइल क्रिमिनल एक्टिविटी में मददगार होता है.

पहला भाग - पीडोफाइल होने का क्‍या अर्थ है?

दूसरा भाग - एक पीडोफाइल या बाल यौन अपराधी का मनोविज्ञान क्या होता है
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