'मैं बार में नाचती थी, लेकिन मेरी मर्जी के खिलाफ कोई मर्द मुझे क्‍यों हाथ लगाता'

कहते हैं प्यार जीवन में खुशी और सुरक्षा लाता है, लेकिन प्यार उसे डांस बार में ले आया. बार में नाचना भी उसने स्वीकार किया लेकिन जबरन किसी के साथ सोना उसे स्वीकार नहीं था. ये कहानी है जबर्दस्‍ती वेश्यावृत्ति में ढकेली गई शरवरी सोनावणे की, जिसने नियति के आगे सिर झुकाने की बजाय लड़ने का फैसला किया

Manisha Pandey
Updated: September 6, 2018, 11:49 AM IST
Manisha Pandey
Updated: September 6, 2018, 11:49 AM IST
आम्रपाली की कहानी पढ़ी है आपने.

आम्रपाली एक राज गणिका थी. राज्‍य के समस्त धनी, बलशाली पुरुष उसके पास अपना दिल बहलाने आते, लेकिन वो हर पुरुष में अपना पति ढूंढती. लेकिन सच तो ये है कि पुरुष एक वेश्या में पत्नी नहीं ढूंढता. वो रात के अंधेरे में उसके पास अपना दिल बहलाने जाता है, लेकिन दिन के उजाले में अपनी पत्नी को ही बगल में खड़ा करता है.

आम्रपाली के पास संसार का सारा वैभव, रूप, धन था, लेकिन प्रेम नहीं था. वो बुद्ध से मिलने गई. बुद्ध के शिष्य आनंद ने उनसे पूछा, ये तो एक वेश्या है, नीच स्त्री. आप इससे कैसे मिल सकते हैं. बुद्ध ने कहा था, वो नीच नहीं है. नीच है उसे वेश्या बनाने वाला समाज, उसके पास जाने वाले पुरुष.

बुद्ध तक ने ये कहा था कि आम्रपाली गंदी स्त्री नहीं है, फिर दुनिया कौन होती है ये कहने वाली कि शरवरी एक गंदी औरत है. मैं पिछले सात सालों से नासिक के इस छोटे से गांव में अकेली रह रही हूं. मेरे घरवालों ने मेरा साथ छोड़ दिया. भाई ने कहा कि ये वापस आएगी तो गांव में हमारी क्या इज्जत रह जाएगी. मैंने तय किया, मैं वापस जाऊंगी ही नहीं. उमराव जान के भाई ने भी तो ऐसे ही किया था. जिस भाई को उंगली पकड़कर चलना सिखाया, जब उसकी बारी आई तो उसने घर से निकाल दिया क्योंकि उसकी बहन बार में नाचने वाली थी.

मैं 17 साल की थी. पिता कभी पुलिस में थे, लेकिन अब काफी समय से बीमार थे. घर के आर्थिक हालात ठीक नहीं थे. मैं एक लड़के से प्रेम करने लगी थी. मुझे लगता था कि वो मुझसे शादी करेगा, मुझे घर देगा, प्यार देगा, सहारा देगा, लेकिन उसने मुझे बर्बाद कर दिया. मेरे साथ सोया और फिर शादी भी नहीं की. हालात ने मुझे डांस बार के दरवाजे पर ला पटका. कोई लड़की बार में जाकर इतने सारे भूखे मर्दों के सामने नाचना नहीं चाहती. आम्रपाली भी कभी गणिका नहीं बनना चाहती थी. वो तो शादी करना चाहती थी. लेकिन अगर कोई लड़की गरीब है, पढ़ी-लिखी नहीं तो उसके पास और रास्ता ही क्या है कि वो चार पैसे कमा ले और जिंदा रह सके. मैंने वही किया जो मुझे मिला. मैं एक्‍ट्रेस बनना चाहती थी, लेकिन नियति मुझे डांस बार में ले गई.

मुंबई के बार में नाचते हुए दो साल ही हुए थे कि मुझे सउदी जाने का ऑफर मिला. वहां पैसे भी अच्छे थे. जीवन नाम का एक एजेंट था. उसने मुझे प्रिया बंगालन नाम की औरत से मिलवाया. उसने बताया कि मस्‍कट के होटल पाम में डांस शो करने के लिए उसे लड़कियां चाहिए. पैसे भी अच्‍छे थे. उसने मुझे 20,000 रु. एडवांस दिए और मेरा पासपोर्ट ले लिया.



वहां जाने के बाद कुछ दिन तो सब ठीक रहा. वहां ढेर सारी लड़कियां थीं. हम होटल में डांस करते, हिंदी, मराठी और दक्षिण भारतीय गानों पर. मुझे लगता था कि मुझे बस होटल में नाचना है और इस काम के अच्‍छे पैसे मिलेंगे. लेकिन मैं गलत थी. हमें नाचने के बहाने धोखे से वेश्‍यावृत्ति में ढकेला जा रहा था.

एक दिन प्रिया बंगालन ने बार बंद होने के बाद रात को मुझे अपने घर बुलाया. वही हमें पैसे देती थी. हमारा पासपोर्ट भी उसी के पास रखा था. मैं उसके घर गई तो वहां उसका पति, एक अमीर शेख और दो और आदमी शराब पी रहे थे. प्रिया ने मुझे भी पीने को कहा, मैंने मना कर दिया. इसके पहले कई बार प्रिया मुझे ऑफर कर चुकी थी कि ज्‍यादा पैसे कमाने हैं तो शेख के साथ जाओ. हर बार मैं गुस्से में इनकार कर देती. मैं डांसर थी, रंडी नहीं. लेकिन उस रात प्रिया मुझे धोखे से एक कमरे में ले गई और दरवाजा बाहर से बंद कर दिया. उस कमरे में शेख पहले से मौजूद था. मैं बहुत रोई, चीखी-चिल्लाई, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. उस रात शेख ने जबर्दस्ती मेरे साथ रेप किया. मैं मुर्दा की तरह पड़ी रही.

प्रिया बंगालन कहती थी कि इतना तमाशा क्यों कर रही है. तू कौन सी सती-सावित्री है कि तेरी इज्जत लुट गई. इज्जत क्या सावित्री की ही होती है. बार में नाचने वाली लड़की की कोई इज्जत नहीं. उसकी हां, उसकी ना का कोई मायने नहीं.

हां, मैं बार में नाचती हूं, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि मेरी मर्जी के खिलाफ कोई मेरे शरीर को हाथ लगाए. औरत की मर्जी के खिलाफ तो उसके पति को भी उसे हाथ नहीं लगाना चाहिए. एक गैर मर्द कैसे छू सकता है. मैं अपनी मर्जी, अपनी खुशी से किसी के भी साथ जाउं, लेकिन मेरी मर्जी नहीं है तो जबर्दस्ती नहीं कर सकते.



लेकिन मर्द के हाथ में बल है. उसके पास देह का बल है, पैसे का बल है, पुलिस उसकी जेब में है. प्रिया बंगालन जैसी औरतें खुद औरत होकर दूसरी औरतों को पैसे के लिए बेच देती हैं. मुझे भी उस रात प्रिया ने 50,000 रु. के लिए उस शेख को बेच दिया.

मैं एक बार बिकी तो बिकना मेरी मजबूरी हो गई. इतनी बड़ी दुनिया में कोई नहीं था, जिससे मदद मांग सकती, जिससे कहती कि मुझे बचा लो. जिसके घरवालों ने उसे छोड़ दिया, जिसका प्रेमी उसे धोखा देकर चला गया, दुनिया उसका क्‍या साथ देती. उस अनजान मुल्‍क में मेरे जैसी बेसहारा, अकेली लड़कियां ही एक-दूसरे का सहारा थीं. रोने को हम ही एक-दूसरे का कंधा थे. इस नरक से कोई बचा नहीं था. शो खत्‍म होने के बाद लड़कियां चली जातीं और दिन चढ़े लौटतीं. प्रिया बंगालन उन सबको शेखों के पास भेजती थी. वो लौटतीं तो थककर चूर हो चुकी होतीं. किसी के शरीर पर चोट के निशान होते. अमीर मर्द जैसे चाहते, वैसे इस्‍तेमाल करते थे. वहां तुम्‍हारी मर्जी के कोई मायने नहीं थे कि तुम्‍हें दर्द हो रहा है या तुम्‍हें तकलीफ है. वो गंदी-गंदी पोर्न फिल्‍में दिखाते और फिर उन फिल्‍मों की लड़कियों जैसे काम करने को बोलते. मना करने पर मारते. जो पैसे देकर तुम्‍हारा जिस्‍म खरीद रहा है, वो तुम्‍हें प्‍यार करने के लिए नहीं खरीद रहा. एक लड़की थी हसीना. उसके एक कस्टमर ने एक बार उसके वेजाइना में शराब की टूटी हुई बोतल डाल दी थी. उसकी वहीं मौत हो गई. इतनी सारी लड़कियां रोज दुबई, मस्‍कट, बहरीन में जाकर मर रही हैं. उन्‍हें कोई पूछने वाला नहीं.

मैं फंस चुकी थी, मेरा पासपोर्ट प्रिया बंगालन के पास था. मैं पुलिस के पास गई लेकिन कोई मदद नहीं मिली. मेरे जैसी ढेर सारी लड़कियां थीं जो गरीबी और मजबूरी के चलते यहां आ गई थीं और अब चंद रुपयों के लिए अमीर, गंदे मर्दों को अपना जिस्म बेचने को मजबूर थीं. प्रिया बंगालन और उसका पति इन लड़कियों को रंडी कहकर बुलाते थे. कोई जाने से मना करती तो उसे मारते भी थे. रोज लड़कियां मर रही थीं, रोज नई मजबूर लड़कियां उस देश में धोखे से लाई जा रही थीं. अपने इज्जतदार घरों और शादियों में बैठी औरतों को तो अंदाजा ही नहीं है कि इस दुनिया में औरतों के साथ क्या-क्या होता है.



मैंने जीवन में बहुत अच्‍छा वक्‍त भी देखा था, बहुत बुरा वक्‍त भी देखा. मैं और मेरे जैसी लड़कियां रंडी थीं, लेकिन उनका सौदा करने वाले, उनका शरीर नोचने वाले समाज में इज्‍जतदार लोग थे. मैं हर रोज खुद को अपमानित महसूस करती. आम्रपाली को तो बुद्ध मिल गए थे, मेरे पास तो कोई बुद्ध भी नहीं था. मैं किसी तरह वहां से भागकर भारत आई और फिर मैंने उन सारे लोगों के खिलाफ पुलिस में एफआईआर दर्ज की, जिन्‍होंने मुझे बेचा था. सबको जेल हुई, लेकिन सब अपने पैसे और ताकत के बल पर जमानत पर रिहा हो गए. सात साल हो गए, केस अभी भी चल रहा है. मेरे पास अब कोई काम नहीं, कमाई का कोई जरिया नहीं. जो गहने पैसे थे, सब इस मुकदमे में बिक गए.

मेरी क्‍या गलती थी. हां मैं बार में नाचती थी, लेकिन अपनी देह की मालकिन मैं खुद थी. आम्रपाली को भी कोई राजा उसकी मर्जी के खिलाफ नहीं छू सकता था, इन भड़वों की इतनी हिम्‍मत कैसे हो गई कि ये बिना मर्जी के मुझे हाथ लगा लें.

मैं इसी हक के लिए तो लड़ रही हूं कि नाचने वाली लड़की की भी इज्‍जत होती है. उसकी मर्जी न हो तो उसे कोई छू नहीं सकता.
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