Human Story: व्हीलचेयर पर होना इतने दुख की बात भी नहीं है

आपने फिनिक्स पक्षी की कहानी सुनी होगी जो हर बार अपनी राख़ से उठता है. हमारे आसपास भी कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनकी कहानी दरअसल उस फिनिक्स के पक्षी जैसी होती है जो टूटना नहीं जानते. जब हमें लगेगा कि इनकी पिक्चर खत्म हो गई, दरअसल वहीं से इनकी पिक्चर शुरू होती है. विराली मोदी की कहानी भी कुछ ऐसा ही है.

Kalpana Sharma | News18Hindi
Updated: December 5, 2018, 3:52 PM IST
Kalpana Sharma | News18Hindi
Updated: December 5, 2018, 3:52 PM IST
मेरा नाम विराली मोदी है, मैं व्हीलचेयर पर हूं लेकिन ऐसा बचपन से नहीं था. मैं एक्टर बनना चाहती थी, मैं थिएटर करना चाहती थी, मेरे सपने थे लेकिन 2006 में मैं पैरेलाइज़ हो गई. मेरी रीढ़ की हड्डी की नसें दब गई हैं. तमाम तरह के इलाज करने के बाद भी मैं अभी भी व्हीलचेयर पर हूं. और इन चार पहियों पर आने के बाद ही मुझे भारत की एक ऐसी तस्वीर देखने को मिली जिसके बारे में वो लोग नहीं सोच सकते जिनके हाथ पैर ऊपर वाले की दया से सलामत है. यह अनुभव उसी को समझ आ सकता है जो मेरी तरह चाहता तो है आत्मनिर्भर होना लेकिन समाज और देश ने उसके लिए दूसरों पर निर्भर होने के अलावा कोई चारा नहीं छोड़ा है.

मैं मुंबई से दिल्ली जा रही थी, ट्रेन से. क्योंकि मैं अमेरिका में पली पढ़ी थी इसलिए मुझे लगा वहां की तरह भारत में भी दिव्यांग के लिए ट्रेन में रैंप लगा होता होगा. लेकिन यहां ऐसा कुछ नहीं था. जब मैं और मेरी माँ स्टेशन पहुंचे तो ट्रेन में चढ़ने के लिए मेरे पास कोई तरीका ही नहीं था. माँ ने दो कुलियों को बुलाया जिन्होंने मुझे उठाकर ट्रेन में मेरी सीट तक पहुंचाया. एक ने मुझे पैरों से पकड़ा औऱ एक कुली ने मेरे बगल से मुझे पकड़ा. दोनों मुझे सीट की तरफ ले जाने लगे लेकिन इस बीच उनमें से एक कुली मुझे ग़लत तरीके से छूने लगा. जब तक मैं अपनी सीट पर नहीं पहुंची, उसने मुझे बार बार छुआ. मैं कुछ नहीं कर पा रही थी क्योंकि मुझे लगा अगर मैंने शोर मचाया तो यह मुझे वहीं गिरा देंगे. मैं इतनी लाचार थी कि सब कुछ सहन किया और जब उन्होंने मुझे अपनी सीट पर पहुंचाया तो मैंने उन्हें ‘शुक्रिया’ भी बोला, मैंने कहा – आपने मेरी इतनी मदद की उसके लिए शुक्रिया.



आप सोच सकते हैं कि मैंने ऐसा क्यों किया लेकिन उस दिन मुझे ख़ुद पर बहुत तरस आ रहा था. मुझे लगा कि मैं यहां कितनी मजबूर हूं कि मुझे ऐसे आदमी से मदद लेनी पड़ रही है. इसके बाद ट्रेन से जब-जब मैं गई, मेरे साथ ऐसी हरकतें हुई. फिर तीसरी बार यह सब कुछ झेलने के बाद मैंने अपनी मां से कहा कि अब मैं ट्रेन से कहीं नहीं जाऊंगी, लेकिन मैं यहीं नहीं रुकी. मैंने ट्रेन में अपने इन अनुभवों के बारे में एक लंबी फेसबुक पोस्ट लिखी जिसमें मैंने पीएमओ और रेलमंत्री को उसमें टैग किया. पर कोई जवाब नहीं आया. फिर मैंने पीएमओ को एक चिट्ठी लिखी कि किस तरह भारत में दिव्यांगजनों के लिए सार्वजनिक जगहों और सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करना बिल्कुल भी सरल और सुगम नहीं है. लेकिन इस चिट्ठी से भी बात नहीं बनी. आखिरकार मैंने #MyTrainToo अभियान की शुरूआत की जिसके तहत मैंने आवाज़ उठाई कि ट्रेन सिर्फ आम लोगों की नहीं है, ट्रेन उसकी भी है जो बोल नहीं सकता, उस की भी है जो सुन नहीं सकता, जिसके हाथ नहीं है, या जिसके पैर नहीं है. ट्रेन हम सबकी है औऱ इसलिए इसका आसान और सरलता से इस्तेमाल करने का हक़ भी हम सबका है.

इस अभियान में एक लाख से ज़्यादा लोग जुड़े हुए हैं. केरल के रेल अधिकारी को तो यह अभियान इतना अच्छा लगा कि उन्होंने मुझसे संपर्क किया और हमने केरल के कुछ स्टेशनों को दिव्यांग के लिए सुगम और सरल बनाया. हमने वहां पोर्टेबल रैंप लगाए जिन्हें लगाया और हटाया जा सकता है. यानि जब किसी दिव्यांग व्यक्ति को इसका इस्तेमाल करना हो तो उसे लगा दिया जाए और फिर हटा दिया जाए. इस कैंपेन के ज़रिए हम भारत के अलग अलग रेल्वे स्टेशनों को दिव्यांग के लिए एक्सेसेबिल बनाना चाहते हैं.



हालांकि बात सिर्फ रेलवे की नहीं है, भारत में कोई भी सार्वजनिक जगह पर जाने से पहले हम लोगों को दस बार सोचना पड़ता है. एक बार मैं और मेरी मां पिक्चर देखने गए थे, वहां भी रैंप नहीं होने की वजह से मुझे बहुत दिक्कत पेश आई. फिल्म छूटने के बाद मेरे लिए बाहर जाने का तरीका नहीं था, थिएटर वालों के पास कोई सुविधा ही नहीं थी, ऐसे में कुछ लोगों ने मेरी मदद करनी चाही लेकिन जैसे ही वो मुझे मेरे व्हीलचेयर के साथ सीढ़ियों से उतारने लगे तो मैं गिर गई. उस दिन मुझे बहुत शर्म आई और गुस्सा भी आया. लगा क्या हम बाहर निकलना ही छोड़ दें. रेस्त्रां में नहीं जा सकते, फिल्म देखने नहीं जा सकते, ट्रेन में नहीं चढ़ सकते. दुकान वालों से या रेस्त्रां वालों से कहो कि एक रैंप बनवा लीजिए तो कहते हैं आप लोग आते तो है नहीं, हम रैंप बनवाकर क्या करेंगे. मैं कहती हूं, अरे आप बनवाइए, तभी तो हम आ पाएंगे. हम तो आत्मनिर्भर बनना चाहते हैं, लेकिन यह ढांचा हमे बनने नहीं दे रहा. वैसे तो सरकार ने 2015 में Accessible India Campaign शुरू किया था, फिर दिव्यांग अधिकार अधिनियम, 2016 भी आया लेकिन इन सबसे भी कोई फर्क नहीं पड़ा.
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फिर लगता है कि शायद बात अधिकारों की नहीं, बात सोच बदलने की है. जब तक लोगों की सोच नहीं बदलेगी, कितने भी कानून ले आओ, कोई फर्क नहीं पड़ेगा. जैसा कि मैंने बताया मुझे एक्टिंग का शौक है, मैं मॉडलिंग भी करती हूं लेकिन मेनस्ट्रीम मॉडलिंग के लिए मुझे अभी भी धक्के खाने पड़ते हैं. मुझसे कहा जाता है जब आप चलने लगे तो हमसे संपर्क कीजिए, आपको मौका देंगे. मैं कहती हूँ क्यों मेरे चलने तक का इंतजार करना है आपको. मॉडल की तस्वीरें आपने देखी होंगी, वो ज़्यादातर मिडिल शॉट ही होते हैं. इसमें कहां पता चलता है कि कोई व्हीलचेयर पर है या नहीं. मैंने एक प्रोडक्शन कंपनी के लिए नवरात्री के वक्त फोटो शूट करवाया था, उस तस्वीर को देखकर कोई नहीं कह सकता कि यह लड़की व्हीलचेयर पर बैठी है. लेकिन ऐसे मौके औऱ ऐसी सोच कम ही दिखती है. फिल्मों में भी आप व्हीलचेयर पर अपने हीरो या हीरोइन को दिखा सकते हैं, अभी ज़ीरो फिल्म में भी अनुष्का को दिखाया है. लेकिन क्यों नहीं ऐसा कोई रोल किसी व्हीलचेयर पर बैठे अभिनेता या अभिनेत्री को दिया जाता. चलिए लीड रोल मत दीजिए, उसका दोस्त तो बना सकते हैं, जब मेरे दोस्त चलने फिरने वाले हो सकते हैं, तो फिर चलने फिरने वालों का दोस्त व्हीलचेयर पर क्यों नहीं हो सकता.



लेकिन आप यह सब कुछ नहीं समझ पाएंगे. आप हम पर सिर्फ दया दिखा सकते हैं जिसकी हमें बिल्कुल ज़रूरत नहीं है. आपको लगता है व्हीलचेयर पर होना बहुत दुख की बात है लेकिन सच कहूं, इतनी भी दुख की बात नहीं है. यकीन मानिए यह हमारे लिए तनिक भी दुखी होने वाली बात नहीं होगी अगर हमें सरकार, जनता औऱ समाज से थोड़ा सा सहयोग मिल जाए, आप अपनी सोच औऱ जगहों को सुगम बना दीजिए, रास्ता हम ख़ुद निकाल लेंगे.

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