#HumanStory: मेट्रो ब्रिज के नीचे चलता है स्कूल, झुग्गियों के 300 बच्चे पा रहे मुफ्त एजुकेशन

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Updated: September 18, 2019, 10:45 AM IST
#HumanStory: मेट्रो ब्रिज के नीचे चलता है स्कूल, झुग्गियों के 300 बच्चे पा रहे मुफ्त एजुकेशन
यमुना बैंक मेट्रो डिपो के पास चलता है फ्री स्कूल अंडर द ब्रिज (फोटो- प्रतीकात्मक)

जो ख्वाब खुले आसमान के नीचे देखे जाएं, उनके मुकम्मल होने की गुंजाइश ज्यादा होती है. फ्री स्कूल अंडर द ब्रिज (free school under the bridge) - एक ऐसा ही ख्वाब था. परचून की दुकान करने वाले राजेश कुमार शर्मा (rajesh kumar sharma) ने झुग्गी के दो बच्चों (slum children) को पढ़ाने से इसकी शुरुआत की. आज 300 बच्चे ब्रिज के नीचे पढ़ रहे हैं.

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दिल्ली मेट्रो (delhi metro) की एक आम सुबह...वक्त पर स्कूल-कॉलेज-दफ्तर पहुंचने की जल्दबाजी में एक-दूसरे को धकियाते लोग. मेट्रो के बंद होते कपाट को हाथ-पैरों से रोकने की कोशिश करते लोग. स्टेशन के नीचे सज रहे खोमचे-गुमटियां. इस भागमभाग के बीच करीब ही एक जगह वक्त ठहरा हुआ है. यमुना बैंक (yamuna bank) मेट्रो डिपो के पास पहुंचें तो एक अंडरब्रिज (under bridge) दिखेगा और दिखेंगे ढेर सारे बच्चे.

आसपास की तमाम हबड़-तबड़ से बेखबर ये बच्चे किताबें खोले हुए हैं. पास ही दरम्यानी उम्र और कदकाठी का एक शख्स बैठा है जिसकी नजर हर बच्चे पर है. पढ़े, मामूली जिंदगी जीते हुए आसमानी ख्वाब देखने और उन्हें पूरा करने की कोशिश करते राजेश की कहानी.

बचपन याद करता हूं तो बस्ता याद आता है, कॉपियों और पेन-पेंसिल से भरा हुआ, बीच-बीच में इक्का-दुक्का किताबें झांकती हुईं. नई क्लास में पहुंचता तो पिछली क्लास के बच्चों से आधी कीमत पर किताबें ले लेता या फिर क्लास में ही दूसरे बच्चों के साथ पढ़ लेता. किताबों की बांटा-बांटी के बीच वक्त गुजरता रहा और आखिरकार साल 1989 में मुझे पढ़ाई छोड़नी पड़ी. आज भी सपना आता है कि मैं किताबों से भरा बस्ता लेकर स्कूल जा रहा हूं. वही मलाल मुझे झुग्गियों में रहते बच्चों के चेहरों पर दिखता है.

परचून की दुकान करने वाले राजेश कुमार शर्मा ने झुग्गी के दो बच्चों को पढ़ाने से शुरुआत की


राशन की दुकान करता हूं, सुबह शटर उठाता हूं तो शाम को दुकान बढ़ाने तक नमक, चायपत्ती, बेसन, चावल, माचिस सुनता रहता हूं. मौका मिलता तो इंजीनियर बन सकता था. नहीं चाहता कि बच्चे भी ऐसी ही किसी कसक के साथ जिएं.

साल 2006 की बात है. काम को लेकर परेशान था. गुस्से में घर से निकला. सड़क पर टहल रहा था कि तभी दो बच्चे दिखे. धूल में अटे हुए. चेहरे पर पसीने और धूल के घुलेमिले धब्बे. वो पैरों से धूल उड़ाते इत्मीनान से घूम रहे थे जैसे किसी का इंतजार कर रहे हों. पास ही मेट्रो का काम चल रहा था. समझ गया कि इनके मां-बाप पास ही होंगे. मैं देर तक उन्हें देखता रहा. अपना बचपन गुनने लगा. मेरा बचपन अभावों में ही सही, लेकिन इन भटकते बच्चों से बेहतर था. किताबें भले कम हों लेकिन पढ़ने को एक स्कूल तो था. मैंने बच्चों के मां-बाप से बात करने की सोची. इंतजार करता रहा.

राजस्थान के बंजर इलाके से कमाने-खाने को गांव के गांव दिल्ली आए थे. मैंने बच्चों को पढ़ाने की बात कही. उन्हें कोई ऐतराज नहीं था. अगली रोज सुबह पहुंचा. टीचर और बच्चे तैयार थे. बस, स्कूल तैयार करना था. मैंने एक खेत की मेड़ साफ-सूफ की- ये मेरी कुर्सी थी. नीचे घर से लाई एक चादर बिछाई- इसपर स्टूडेंट बैठे. स्कूल चल निकला.
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मेरा बचपन अभावों में ही सही, लेकिन इन भटकते बच्चों से बेहतर था (फोटो- प्रतीकात्मक)


अब रोज तड़के ही मैं घर से निकलता. पहले बच्चों को पढ़ाता और फिर दुकान जाता. पत्नी नाराज रहने लगी. उसे लगता था कि अपने बचपन को बिसूरता उसका पति अपना बिजनेस डूबो देगा. आएदिन चिकचिक होती. कई बार पढ़ाना छोड़नी की सोची लेकिन बचपन का अपना फटा हुआ बस्ता और कभी पूरा नहीं हो सकेगा, वो सपना याद आता. मैं अगली सुबह दोबारा वहीं रहता.

खेत वाला स्कूल दिक्कत देने लगा था. बारिश में छुट्टी करनी पड़ती. धूप ज्यादा हो तो पढ़ते हुआ आंखें मिचमिचातीं. नए स्कूल की खोज शुरू हुई जो ब्रिज के नीचे पहुंचकर रुकी. यहां पहुंचे तो कई तब्दीलियां हुईं. बढ़े हुए बच्चों के आने-जाने पर नजर रखने के लिए एक रजिस्टर मेंटेन किया. हर नए बच्चे का इसमें रिकॉर्ड रखता.

बच्चे बढ़ने लगे थे. 4 साल से लेकर 15 साल के बच्चे ब्रिज के इस कोने के उस कोने तक बैठे रहते. सबके अलग-अलग सवाल. हर सवाल मेरी तरफ आता. कई बच्चे इतने 'शार्प' थे कि मुझे लगता, अब उन्हें यहां न होकर स्कूल में होना चाहिए.

4 साल से 15 साल के बच्चे ब्रिज के इस कोने के उस कोने तक बैठे होते हैं


पास के एक सरकारी स्कूल पहुंचा. वहां प्रिंसिपल से मिलकर सब बताया. उन्होंने पूछा, किस NGO की तरफ से आए हैं? मैंने कहा किसी की तरफ से नहीं. कितनी फीस लेते हैं? मैंने कहा- कुछ नहीं. प्रिंसिपल ने उबासी भरी. ये मुझे जाने का इशारा था. जाते-जाते मैं रुका और एक बार फिर कहा- सर हर चमकती चीज सोना नहीं होती और न ही हर धुंधली चीज पीतल. आप एक बार मेरे बच्चों को परखें तो.

अगली रोज वे आए. और दो दिनों बाद ब्रिज के नीचे की 'भीड़' से एकसाथ 70 बच्चों का स्कूल में एडमिशन हो गया.

अब यहां आसपास की झुग्गियों से लगभग 300 बच्चे आ रहे हैं. अब मैं अकेला नहीं. मेरे साथ कई लोगों ने इस सपने को बांट लिया है. कोई इंजीनियर आता है, कोई होममेकर आती है, कोई NGO वाला आता है. रोज 4 से 5 लोग होते हैं जो साथ मिलकर पढ़ाते हैं. बच्चों ने अपने स्कूल को रंग-रोगन भी कर दिया है. खेत की मेड़ से शुरू हुए एक अनाम सपने का अब एक नाम है- फ्री स्कूल अंडर द ब्रिज.

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First published: August 22, 2019, 12:53 PM IST
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