Human Story : 'किसी मर्द में बच्चे के साथ ड्यूटी करने की हिम्मत है'

कॉन्स्टेबल अर्चना की एक तस्वीर हाल ही में वायरल हुई. तस्वीर में अर्चना के साथ उनकी 6 महीने की बेटी अनिका दिख रही है. अर्चना वर्दी में बैठी अपना काम निपटा रही है और पास में टेबल पर उनकी बेटी सो रही है. अर्चना को समझ नहीं आ रहा कि उन्होंने ऐसा क्या कर दिया कि तस्वीर वायरल हो गई.

Kalpana Sharma | News18Hindi
Updated: November 5, 2018, 11:44 AM IST
Kalpana Sharma | News18Hindi
Updated: November 5, 2018, 11:44 AM IST
 अब तक लोगों की इस तथ्य पर जा पाई बिल्कुल दृष्टि नही,

नर सब कुछ है कर सकता, पर कर सकता है सृष्टि नहीं.’

गोपाल प्रसाद व्यास की ‘अनारी नर’ कविता की यह पंक्तियां है. यह ब्रह्मांड की उस हकीकत को बयान करती है जो हमारे सामने होते हुए भी हम न देख पाते हैं और न समझ पाते हैं.

जब कोई नया जीवन रचा जाता है तो भले ही वो औरत और आदमी के योग से होता है लेकिन उस रचना को साकार देने के लिए औऱत का गर्भ ही ज़रिया बनता है. क्योंकि औरत ही इस रचना के भाव को समझती है. हमने दुर्गा का रूप गढ़ा हो या लक्ष्मी का, हर रूप में हमने औरत के कई हाथ बनाए हैं, जो दिखाती है उसका एक साथ कई कामों का संभालना. उसे घर भी संभालना है, उसे परिवार भी देखना है, अब विकास की नई बयार में कंधे से कंधा चूंकि उसे ही मिलाना है तो उसे नौकरी भी संभालनी है.

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इन सबके बीच बच्चा भी उसे ही संभालना है क्योंकि बच्चे की शुरूआती ज़रूरतें तो आदमी पूरी कर ही नहीं सकता है. कभी आप इसे ईश्वर की औऱत पर ज्यादती भी समझ सकते हैं, कभी इसे उसकी योग्यता मानकर मन भी बहलाया जा सकता है. इन्हीं तमाम जिजीविषाओं से जूझते हुए जब वो अपने गर्भ से किसी को जन्म देने के साथ साथ खुद के जन्म को भी सार्थक बनाने की कोशिश करती है तो अर्चना की कहानी जन्म लेती है.
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अर्चना, कॉन्स्टेबल हैं और उनकी झांसी में पोस्टिंग है


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मैं अर्चना हूं, पेशे से कॉन्स्टेबल औऱ प्रकृति से मां. मैं तो कई दिनों से दोनों रूप निभा रही थी लेकिन एक दिन ये रूप किसी के कैमरे में कैद हो गया औऱ फिर एक फोटो वायरल हुई जिसने झांसी जैसे छोटे शहर में रहते हुए भी मुझे चर्चा में ला दिया. पिछले एक महीने से मैं अपनी छह महीने की बच्ची अनिका के साथ ड्यूटी पर जा रही थी. मेरे पति गुड़गांव में नौकरी करते हैं, सास ससुर कानपुर में है, उन्हीं के साथ मेरी बड़ी बेटी रहती है औऱ मैं यहां झांसी में पोस्टेड हूँ.

तो उस दिन भी बाकी दिनों की तरह मैं अनिका को अपने साथ काम पर लेकर गई थी. उसे ज़ुकाम हो रहा था औऱ एसी चल रहा था इसलिए मैंने उसे अपने पास टेबल पर ही सुला दिया औऱ अपना काम निपटाने लगी. तभी पता नहीं किसने वो तस्वीर खींच ली और थोड़े वक्त बात मुझे पता चला कि ये तो वायरल हो गई है. मुझे व्हाट्सएप पर भी ये तस्वीर अलग अलग लोग भेजने लगे. मुझे समझ नहीं आया कि इसमें वायरल होने जैसा क्या है, ऐसा क्या है कि अखबारों और समाचारों में इसकी चर्चा हो रही है. ये काम तो मैं कई दिनों से कर रही हूं. मेरे घरवाले भी नहीं समझ पा रहे थे कि इसमें क्या नया हो गया. अर्चना तो हमेशा ही सब कुछ संभालती है, घऱ भी, बच्चे भी, नौकरी भी. सालों से कर रही है. अभी भी आपसे बात करने से पहले मैं पोछा लगा रही थी. बात करने के बाद ड्यूटी जाऊंगी.

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अर्चना ने अपनी बेटी के साथ मेले में नाइट ड्यूटी भी की है


वैसे बच्ची के साथ ड्यूटी करना आसान नहीं है. लेकिन क्या करूं मजबूरी है. लगता है कि कोई दफ्तर में ये न कह दे कि क्यों बच्ची को साथ में लाती हो. लगता है किसी को मेरे कारण तकलीफ तो नहीं होगी. लेकिन शुक्र है कि मेरे साथ औऱ अफसर मेरी परेशानी को समझते हैं. किसी ने आज तक नहीं कहा कि बच्ची को काम पर मत लाओ. बल्कि सबने मदद ही की है. साथियों की मदद के बगैर बच्ची को एक महीना क्या, एक दिन भी संभाल पाना मेरे लिए मुश्किल होता. अनिका को लेकर मैंने अलग अलग जगह ड्यूटी दी है. कभी दफ्तर में ही रहती थी तो कभी बाहर भी ड्यूटी लगती थी. जैसे एक बार परीक्षा हॉल में ड्यूटी लगी थी. तब भी अनिका को साथ लेकर गई थी. फिर एक बार हफ्ते भर के लिए मेले में ड्यूटी लगी. वहां मेरे साथ दोस्त ममता की भी ड्यूटी लगी थी. हम बारी बारी करके अनिका को संभालते थे. कभी वो उसे लेकर बैठती औऱ मैं काम करती, फिर मैं लेकर बैठती औऱ वो काम करती. लोग भी जब मेरी बच्ची को साथ देखते तो कहते – आज गुड़िया भी ड्यूटी पर आई है, अब तो डबल सैलेरी मिलेगी.

एक बार तो नाइट ड्यूटी लगी मेले में. तब मुझे बहुत दिक्कत हुई थी. अनिका को सोना था लेकिन शोर इतना था कि नींद नहीं आ पा रही थी औऱ चिड़चिड़ा रही थी. ऐसे में मैंने पुलिस जीप के दरवाज़े बंद किए औऱ फिर उसे सुलाया. बस इसी तरह सबके सहयोग से मैनेज हो रहा है.

लेकिन यह भी सच है कि इतने छोटे बच्चे की मां के लिए दफ्तर में अलग से प्रावधान होने चाहिए. माँ प्रायवेट या सरकारी नौकरी में हो या घर पर हो, इतने छोटे बच्चे को उसे समय देना पड़ता है. ऐसे में दफ्तर में थोड़ा सोचना चाहिए. या तो महिला की लीव बढ़ाएं, उसे काम में सहूलियत दें या फिर उसके काम करने के घंटों में थोड़ी कमी कर दें. कुछ तो करें. हालांकि मेरी वो तस्वीर जब अफसरों ने देखी तो मुझे शाबाशी ही दी. कहा तुम इस परिस्थिति में भी काम कर रही हो, बहुत अच्छी बात है. अभी तक हमें इस बारे में पता नहीं था, अब पता चल गया. मुझे लगता है चलिए मेरे ज़रिए ही सही, मेरी तस्वीर के ज़रिए ही सही, शायद आने वाले समय में बाकी औरतों के बारे में सोचा जाएगा.

मेरे पति ने तो यह तस्वीर देखकर कहा कि मुझे तुम पर गर्व है. लेकिन फेसबुक पर लोग मेरी तस्वीर को देखकर सवाल उठा रहे हैं, अजीब से कमेंट कर रहे हैं. उनका कहना है कि इतनी परेशानी के साथ नौकरी करने की क्या जरूरत है. घर बैठकर बच्चा संभालिए, पति है नौकरी करने के लिए. क्यों आप निकल पड़ी हैं. लेकिन मैं कहना चाहती हूं कि इस मंहगाई के ज़माने में दोनों के काम करने से ही घर चलता है. ऊपर से क्या हम किसी से पीछे रहने वाली हैं. ये हिम्मत शायद पुरुषों में नहीं है इसलिए ऐसे कमेंट ज्यादातर पुरुष ही कर रहे हैं. अगर औरत बहुत सारे काम एक साथ कर सकती है तो वो इसलिए क्योंकि वो जिम्मेदार है. उसे अपनी जिम्मेदारी का एहसास है. लेकिन क्या पुरुष ऐसा कर सकते हैं. कुत्ते भौंकते रह जाते हैं. मेरे लिए जो लोग बातें बना रहे हैं, मैं उनसे यही कहना चाहती हूं, क्या पुरुष में हिम्मत है इतने छोटे से बच्चे के साथ ड्यूटी पर जाने की?

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