#HumanStory: अब्बू के इंतकाल के बाद पहली बार उन्हें गले लगाया था

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: August 19, 2019, 10:13 AM IST
#HumanStory: अब्बू के इंतकाल के बाद पहली बार उन्हें गले लगाया था
खुद कम पढ़े-लिखे अब्बू को अपनी औलादों को पढ़ाने का भारी शौक था

अब्बू की आंखें खुली थीं. काले पड़ चुके होंठ मुंदे हुए. लंबे-चौड़े मेरे अब्बू पोटली की तरह गुड़ी-मुड़ी हुए बिस्तर पर पड़े थे मानो कोई बच्चा सोया हो. देर तक देखता रहा और फिर अब्बू की लाश को कसकर बांहों में भींच लिया. अपनी याद में पहली बार उन्हें गले लगाया था. पहली बार ही खुलकर रो रहा था.

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(हारून... उस औलाद की कहानी जो पिता से 'आदतन ' नाराज रहा, हर मुमकिन वजह पर. फिर चाहे वो बिन मां के बचपन बिताना हो या फिर पिता के अनाड़ी हाथों पके गोश्त का कुछ कम लजीज होना.)

अब्बू... याद करता हूं तो जो सबसे पहली बात जहन में आती है, वो है उनकी बड़ी-बड़ी मूंछें और लंबा-चौड़ा शरीर. बच्चों से लाड़ का अलग ही तरीका था. गोद में उठाकर हमारे फूले-फूले गालों से अपने गाल सटाते. दाढ़ी-मूंछ गड़ती. अब्बू जैसे ही हमें नीचे उतारते, हम दौड़कर उनकी नजरों से ओझल हो जाते. लेकिन बस नजरों से ही... उनकी हंसी दूर तक हमारे पीछे दौड़ती रहती.

पांचवे दर्जे में था, जब अब्बू के जिक्रभर से खौफ जागने लगा. वो इल्म पर खूब जोर देते. जिस दौर में हमारे गली-मुहल्ले के दूसरे बच्चों के पास स्कूल की किताबें होती थीं, हमारे पास किस्म-किस्म की किताबें होतीं. कोई भी मौका हो, वो तोहफे में किताबें लाते.

भूरे जिल्द में लिपटा पैकेट लेकर जैसे ही अब्बू गली के मुहाने पहुंचते, आसपास के बच्चे चिल्लाने लगते- हारून, तेरे अब्बा एक और किताब लाए हैं. एक और किताब!

एक कमरे के मकान में एक-एक कोना हमने रसोई, पढ़ाई के कमरा और सोने के कमरे की तरह बना रखा था. ऐसे में किताबों के लिए जगह कैसे होगी! मैं भुनभुनाता. बहन झुंझलाती. अब्बू चुपचाप काम करते रहते. लगता कि अब वो समझ चुके हैं. थोड़े ही दिन बाद काम से लौटते अब्बू दोबारा भूरा पैकेट लिए आते दिखते.

खुद कम पढ़े-लिखे अब्बू को अपनी औलादों को पढ़ाने का भारी शौक था. सोचता हूं तो मलाल होता है- कितनी किताबें कभी खुली तक नहीं.

खुद कम पढ़े-लिखे अब्बू को अपनी औलादों को पढ़ाने का भारी शौक था (प्रतीकात्मक फोटो)

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अम्मी के इंतकाल की खास याद नहीं, सिवाय इसके कि पहलवानों की तरह लंब-तड़ंग मेरे अब्बू को कई लोग संभाल रहे थे. मैं एक कोने में औरतों से घिरा बैठा था. एक की गोद में मेरी छोटी बहन थी. उस रोज बच्चों की तरह सिसकते अब्बू ने कभी अम्मी का कोई जिक्र नहीं किया.

अम्मी की याद जैसे उनके दिल के संदूक की सबसे कीमती चीज हो. वो उसे छिपाए-लुकाए घूमते. संदूक आधी रात को ही खुलता होगा क्योंकि तभी अब्बू की पीठ सिसकती लगती थी.

एक सुबह आवाजों से नींद खुली. देखा तो घर पर रिश्तेदार आए हुए थे. मैं और छोटी बहन खूब खुश हुए. लगा, कुछ दिनों के लिए अब्बू की कच्ची-पक्की रसोई से निजात मिलेगी. यही हवाला वे नातेदार भी दे रहे थे. 'दूसरी ले आओगे तो बच्चे यूं रूसे-रूसे नहीं डोलेंगे. रसोई की तकलीफ भी नहीं रहेगी.' अब्बू की भी हल्की-हल्की आवाज आ रही थी. क्या कहा, क्या सुना- कुछ पता नहीं लेकिन धीरे-धीरे अब्बू की दूसरी शादी का जिक्र कम होने लगा और फिर खत्म हो गया.

अब्बू ने रसोई ठीक ढंग से संभाल ली थी. रोज सुबह अजान की आवाज के बाद रसोई से अब्बू की खिटिर-पिटिर सुनाई देती. हमारे जागते तक आधी रसोई बन चुकी होती.

वक्त बदला. अब्बू की खिचड़ी दाढ़ी में अब उतना जोर नहीं रहा. आंखों के नीचे स्याह धब्बे दिखने लगे. कंधे ढल गए थे. मेरा कद अब्बू पर गया था लेकिन आदतें उनसे एकदम उलट. स्कूल के बीच ही पढ़ाई छोड़ दी थी. दिनभर बाहर फिरता. यहां तक कि अब्बू के पैसे चुराने लगा था. पहले थोड़े-बहुत चुराता. ऐसे कि उन्हें पता न चले. रात में नशे में लौटता तो पैर सीधे रखने की कोशिश करता. बाद में ये लिहाज भी चला गया.

अब्बू की खिचड़ी दाढ़ी में अब उतना जोर नहीं रहा था (प्रतीकात्मक फोटो)


मैं अब्बू पर नाराज रहता- कम उम्र में बिन मां के पलने पर. कच्ची-पक्की रोटियों पर. तेज नमक वाले गोश्त के चलते. 1 कमरे के घर में रहने की वजह से. अपने पढ़ाई में दिल न लगा पाने की वजह से. अब्बू को लानतें देने के लिए मेरे पास वजहों की कोई कमी नहीं थी. खराब मौसम की तोहमत भी मैं अब्बू पर लगा सकता था.

दोपहर का वक्त था. मैं घर पर था, बगैर किसी नशे के पूरे होशोहवास में. अचानक अब्बू पास आए, मेरे कंधे पर हाथ रखा और कहा- शादी कर लो. कंधे पर थमे हाथ लरज रहे थे.

सालों बाद पहली बार गले में कुछ अटका-सा लगा. मैंने हां में सिर हिला दिया. शादी हुई. अब्बू ने खूब देख-भालकर निहायत प्यारी और नाजुकख्याल लड़की चुनी थी अपने बेटे के लिए. आते ही उसने सब संभाल लिया- अब्बू का बुढ़ापा, बहन का अकेलापन और शौहर की लापरवाहियां.

अब्बू के इंतकाल के कुछ ही रोज बाद मुझे एक औलाद हुई. लाल-फूले गालों और मिचमिची आंखों वाला मेरा बेटा! पास जाता हूं तो चट से मेरा अंगूठा पकड़कर चूसने लगता है. उसे देखता हूं तो अब्बू की बेइंतहा याद आती है. अब जाकर समझ सका कि पिता होना क्या होता है.

दिल का एक हिस्सा अब्बू की यादों से भरा है. बचपन में दाढ़ी-मूंछें गड़ाने वाले अब्बू. मुझे और बहन को गोद में लेकर हवा में उछालने वाले अब्बू. हर चौथे रोज भूरे लिफाफे में किताबें लाने वाले अब्बू. नशे में लड़खड़ाती औलाद के सिरहाने रात बिताते अब्बू. शक्लोसूरत से खौफ जगाने वाले लेकिन असल में बकरी के बच्चे की तरह मासूम अब्बू.

मलाल होता है. काश, एक बार जीते-जी मैं अब्बू को गले लगा पाता.

(हारून की ये कहानी थोड़े फेरबदल के साथ news18 ने gmbakash की इजाजत से ली है.)

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First published: August 19, 2019, 10:13 AM IST
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