#HumanStory: गोश्त पर भैंस की थोड़ी-सी खाल लगी रहने देते हैं वरना मार दिए जाएंगे

वो अपने सबसे बेहतर कपड़ों में है. साफ लेकिन नए-पुराने खून के धब्बों से भरा हुआ. सिर के ठीक ऊपर ट्रॉफियों की तरह गोश्त लटका हुआ है. करीब ही एक पुराने और मजबूत पेड़ का तना है, जिसपर ढाई किलो वजनी उस्तरा रखा हुआ है. शाकाहारियों के लिए मोहम्मद शादाब किसी डरावने ख्वाब से कम नहीं. 

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: August 12, 2019, 10:32 AM IST
#HumanStory: गोश्त पर भैंस की थोड़ी-सी खाल लगी रहने देते हैं वरना मार दिए जाएंगे
स्लॉटर हाउस से माल लाते हैं तो एहतियात बरतते हैं कि गोश्त पर थोड़ी-सी भैंस की खाल लगी रहे (प्रतीकात्मक फोटो)
Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: August 12, 2019, 10:32 AM IST
आधी जिंदगी गोश्त की दुकान पर बिता चुके कसाई मोहम्मद शादाब का एक ही सपना है- बच्चों को कभी उनका छुरा न संभालना पड़े. पढ़ें, उत्तर-पूर्वी दिल्ली के शाहदरा के मीट-मार्केट की कहानी. 

(नोट: मोहम्मद शादाब का ये इंटरव्यू बकरीद के मौके पर दोबारा दिया जा रहा है.)

दरम्यानी उम्र के शादाब ने पहली बार गोश्त की दुकान में कदम रखा, तब वे 10 बरस के थे. याद करते हैं, उत्तरप्रदेश के छोटे से गांव में रहा करते. गरीब थे. मदद के लिए मामू ने दिल्ली बुला लिया. उन्हीं की मीट-शॉप से काम की शुरुआत हुई. बच्चा था. तब झाड़ू और साफ-सफाई का जिम्मा मिला.

शुरुआती वक्त को लेकर शादाब की कोई खास याद नहीं. सपाट लहजे में बताते हैं, आंख खुलते ही जानवरों को कटते देखा तो दिल को धक्का जैसा कुछ नहीं लगा. मजबूरी थी तो काम करने लगा. मामू ने ही काम सिखाया. जब बाजुओं में ताकत आ गई तो छुरा चलाना सीख लिया.

ढाई किलो का छुरा संभालना आसान नहीं
मेहनत का काम है. बड़ी मेहनत का काम है. रोज गोश्त के छोटे-छोटे टुकड़े होते देखता. पहली बार छुरा हाथ में उठाया तो उसे गिराने में ताकत लगी. और उसके बाद उठाना. ताकत से टुकड़े काटना. कंधे दर्द करते हैं. ऊंगलियां थक जाती हैं. एक हाथ से काटना होता है. यही अकेली तकलीफ नहीं.

लोग हमारी दुकान पर मीट लेते आते हैं. चाव से पकाते-खाते हैं. लेकिन बर्दाश्त नहीं कर पाते अगर हम उनके साथ बैठ जाएं या उनके पड़ोस में रहें. पड़ोसी शिकायत करते हैं कि तुम्हारे कारण मक्खियां आती हैं. तुम गंदे लोग हो.
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डर पेशे का हिस्सा बन चुका है
गाय के मांस के शक में बीते कुछ वक्त में कई जानें गईं. कई कसाई और ट्रांसपोर्टर बुरी तरह से जख्मी हुए. इसका असर शादाब के काम पर भी दिखता है. वे अब मांस लाते- ले जाते हुए ज्यादा ख्याल रखते हैं. कहते हैं, भैंस और गाय का गोश्त लगभग एक-सा लगता है. हम स्लॉटर हाउस से माल लाते हैं तो एहतियात बरतते हैं कि गोश्त पर थोड़ी-सी भैंस की खाल लगी रहे. पूरा साफ नहीं करवाते हैं. फिर माल लाते हुए कोई पकड़ ले तो हम दिखा पाते हैं. लहजे में हल्की कड़वाहट के साथ कहते हैं- अगर हम निशानी नहीं छोड़ेंगे तो मार ही दिए जाएंगे. जबतक जांच की रिपोर्ट गाय या भैंस साबित करेगी, हम कसाई तो खत्म ही हो जाएंगे. इसलिए एहतियात जरूरी है.

रोटी गोश्त में डुबोकर खाने वाले भी कसाई की जिंदगी को हिकारत से देखते हैं.
शादाब का अनुभव भी इससे अलग नहीं. जो आता है, एतराज करता है. कभी गंदगी पर. कभी तरीके पर. कहते हैं, ये गंदा काम है. हम गंदे लोग हैं. वे ये नहीं सोच पाते कि उनके हिस्से की क्रूरता भी हमें लेनी होती है ताकि हमारा पेट पल सके. पुश्तैनी काम करना वैसा ही है जैसे मैकेनिक के बच्चे का मैकेनिक और डॉक्टर के बच्चों का डॉक्टर बनना.

बच्चों की बात करते हुए शादाब की आवाज में मुलायमियत दोबारा लौट आती है. 2 बच्चों के पिता शादाब का एक ही सपना है. चाहता हूं, बच्चे डॉक्टर बनें. ये मेरी दूसरी शादी है. पहली पत्नी के गुर्दे खराब हो गए थे. डायलिसिस कराने के पैसे नहीं जुटा सका. उसका इंतकाल हो गया. चाहता हूं, दोनों बच्चे पढ़-लिख जाएं. गरीबों का इलाज करें. फिर किसी और शादाब की बीवी उसके सामने पैसों की तंगी से दम नहीं तोड़ेगी.
बच्चे छोटे हैं. नाजुक दिल है उनका. उन्हें कभी काम की जगह पर बुलाना तो दूर, घर पर इस बारे में बात तक नहीं करता.

ईद के वक्त वे वैसे भी मुझसे खफा हो जाते हैं. कुर्बानी के लिए घर में बकरे पालते हैं. बच्चे उनका नाम रख देते हैं. उनके साथ खेलते-दौड़ते हैं. हम भी उन्हें खिलाते हैं. लगाव हो जाता है. ऐसे में हलाल करते हुए बच्चों के साथ हम भी रोते हैं. बच्चे दिनों तक नाराज रहते हैं. हाल में घर पर 5 जानवर पल रहे हैं. उनसे बच्चों जैसा लगाव हो गया है. लेकिन काम पर होते हैं तो ये लगाव घर छोड़ जाते हैं वरना बच्चे भूखे मरेंगे.

काम छोड़ दूंगा तो घरवाले क्या खाएंगे
गोश्त के शौकीनों से लेकर गोश्त की झलक न देख सकने वालों की हिकारत सहते, गंदगी में दिन का बड़ा हिस्सा बिताते शादाब के लिए इस पेशे में बने रहने से अलग कोई विकल्प नहीं. हम क्या करेंगे. रिक्शा चलाएंगे. सड़कों पर झाड़ू लगाएंगे. इससे क्या गुजारा चल सकेगा.

आधी से ज्यादा उम्र बीत गई, थोड़ी बाकी है, उसमें बच्चों को बनता देख लें. फिर कोई मलाल नहीं.

सुबह 9 से दोपहर 3 बजे तक शाहदरा के मीट मार्केट में बैठे शादाब के पास रोज तकरीबन 50 ग्राहक आते हैं. किसी ग्राहक के आते ही वे फटाफट एक साफ तौलिए से हाथ पोंछते हैं और फिर एहतियात से गोश्त के टुकड़े सौंपते हैं. पास में मक्खी भगाने की मशीन चलती रहती है. कोई कारीगर सफाई करता होता है. गोश्त के भारी शौकीन भी न तो गंदगी बर्दाश्त कर पाते हैं और न ही क्रूरता. वे ग्राहक हैं. हम उनकी पसंद का ख्याल रखते हैं.

मेरा पेशा ही मेरा अकेला हुनर है. अपनी ओर से मैं काम में कोई कोताही नहीं बरतता.

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First published: August 12, 2019, 10:32 AM IST
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