#HumanStory: 'शेतकरी नवरा नको जी बाई... किसान पति नहीं चाहिए! 3 साल में 8वीं बार सुनी ‘न’

तीन साल से रिश्ते आ रहे हैं, लेकिन कभी ताला पड़े टॉयलेट, तो कभी सूखे बर्तन देखकर चले जाते हैं. अब तक मुझे किसी लड़की के घर जाने का मौका नहीं मिला. लड़कीवालों को कुछ भी चलेगा, सिर्फ हल चलाने वाला दूल्हा नहीं.

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: June 13, 2019, 6:54 PM IST
Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: June 13, 2019, 6:54 PM IST
पिछले महीने लड़कीवाले आए. दोपहर का वक्त था. खा-पीकर सब तसल्ली से बैठे थे. मुझे लगा, इस बार बात बन जाएगी. तभी पानी का टैंकर आ गया. पानी भरने की जो होड़ मची कि हम सब भूल गए. लौटे तो मेहमानों के चेहरे उतरे हुए थे. सौंफ-पान खाए बिना वो चले गए. मैं इंतजार करता रहा. फोन नहीं आया.

तीन सालों में ये आठवां मौका है जब लड़कीवालों ने बिना कहे 'ना' कह दिया. मराठवाड़ा के 'अक्षय' अकेले नहीं. पानी की तंगी की वजह से हजारों लड़के शादी की आस में बैठे हैं. पढ़िए, थेरगांव के अक्षय सुदर्शन सरोदे को.



कुछ साल पहले रिश्तेदारी में हैदराबाद जाना हुआ. क्या ही खूबसूरत शहर है! ऊंची इमारतें. चौड़ी-फैली सड़कें. भले लोग. शानदार खाना.

साथ के लोग शहर घूम रहे थे लेकिन मेरा मन कहीं और अटका था. मैं जी -भरकर नहाना चाहता था. एक-दो-तीन बार. मैंने यही किया. लंबे-चौड़े अहाते जैसे बाथरूम में खूब नहाया. जानता था कि वापस लौटने पर पानी की हर बूंद हिसाब से खर्च करनी है. खासकर नहाने को कई-कई दिनों में एक बार पानी मिलेगा, वो भी ज्यादा से ज्यादा एक बाल्टी.

अक्षय के लिए जी-भरकर नहाना भी 'लग्जरी' है जिसे वे कहानी की तरह याद करते हैं
अक्षय के लिए जी-भरकर नहाना भी 'लग्जरी' है जिसे वे कहानी की तरह याद करते हैं


गलती से पानी गिर जाए तो सब ऐसे देखते हैं मानो जुर्म किया हो.

6 सालों में चौथा सूखा देख रहा हूं. हरदम हरा-भरा रहने वाला गांव सूखकर सांवला पड़ गया है. दरारें पड़ी मिट्टी. ठूंठदार पेड़ जो धूल से अटे हुए हैं. बचपन का गांव एकदम अलग था. गर्मियों में मीठी इमली के पेड़ होते. सर्दियों में सारे मौसमी फल. हम बच्चों की टोलियां बावड़ी (कुआं) के आसपास खेला करती.
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बावड़ी पानी से ऐसी लबालब थी कि बच्चे भी पानी खींच पाते थे. अब मामला दूसरा है. कुएं, सरकारी बावड़ी, नल, जमीन सब सूखी पड़ी है.

हर चौथे दिन पानी का टैंकर आता है. हम ऐसे इंतजार करते हैं जैसे कोई खास मेहमान आ रहा हो. पानी के ड्रम धोकर सुखाए जाते हैं. पहले ही पक्का हो जाता है कि घर पर कौन-कौन रहेगा. टैंकर जैसे ही गांव में पहुंचता है, हल्ला मच जाता है. हर घर अपना-अपना ड्रम संभालकर दरवाजे के बाहर रख लेता है. कई घंटे इंतजार के बाद टैंकर हमारे दरवाजे पहुंचता है. ड्रम में 200 लीटर पानी भरता है और लौट जाता है. यही 200 लीटर पानी अब घर के 4 सदस्यों के लिए अगले चार दिनों का सहारा है. इसी में नहाना है, इसी से पकाना है, इसे ही पीना है.

गांव की बावड़ी में तले पर पानी है, जिसे निकालने के लिए बाल्टी के साथ खींचनेवाले को भी भीतर उतरना होता है


एक-एक बूंद का हिसाब होता है. किसी को भी उसके हिस्से से ज्यादा नहीं मिलता.

पानी नहीं है इसलिए टॉयलेट पर ताला लटका रखा है. बहुत सालों से टॉयलेट का इस्तेमाल कर रहे थे. सूखे के बाद हालात बदल गए हैं. सुबह उजाला टूटने से पहले 'मैदान' जाते हैं. घर में मां हैं. दादी हैं. वो लगभग आधी रात में चली जाती हैं. फिर शाम होने का इंतजार करती हैं.

गर्मी में ज्यादा पानी पीने को कहा जाता है. हमारे पास न पीने को पानी है और न फारिग होने को टॉयलेट. मर्द लोग जैसे-तैसे एडजस्ट कर लेते हैं. नहीं पता, औरतों पर क्या बीतती होगी. 

कई बार सोचा कि बाहर किसी शहर चला जाऊं. वहां पानी होगा. शादी हो सकेगी. लेकिन फिर मन नहीं मानता. यहां छोटा ही सही, अपना घर है. जमीन का एक टुकड़ा है जो फिलहाल सूखा है. घरवाले हैं. दोस्त हैं. इन सबको छोड़कर जाना भी चाहूं तो शहर में मकान-भाड़ा बहुत ज्यादा है. किराया देने की बजाए यहीं अपने गांव में इंतजार करूंगा. कभी तो ऊपरवाले का दिल पसीजेगा.

हरे-भरे खेत और मौसमी फलों के बाग उजाड़ पड़े हैं
हरे-भरे खेत और मौसमी फलों के बाग उजाड़ पड़े हैं


गांव में ज्यादातर लड़कों की 21 के बाद शादी हो जाती हैं. मैं 27 का हूं.

तीन साल से रिश्ते आ रहे हैं, लेकिन कभी ताला पड़े टॉयलेट, तो कभी सूखे बर्तन देखकर चले जाते हैं. अब तक मुझे किसी लड़की के घर जाने का मौका नहीं मिला. कोई बुलाता ही नहीं है, बस देखकर लौट जाते हैं. एकाध लड़कीवालों ने साफ कहा- पानी नहीं, तो लड़की नहीं. बाकियों ने फोन तक नहीं किया. हम इंतजार करते रहे, फिर खुद ही समझ गए.

यार-दोस्तों के भी यही हाल हैं. गांव की आबादी लगभग 4000 है. तीन सौ के लगभग लड़के शादी की उम्र के हैं और इंतजार कर रहे हैं. कईयों की उम्र 30 पार हो चुकी है. ऐसे लड़कों के घर रिश्ते आने बंद हो रहे हैं. सिर्फ सरकारी नौकरी वाले बाहर रह रहे लड़कों का घर बस रहा है.

अक्षय अपने किसान साथियों के साथ सड़क बनाने के बीच सुस्ताते हुए
अक्षय अपने किसान साथियों के साथ सड़क बनाने के बीच सुस्ताते हुए


हालात इतने खराब हैं कि हम जैसों पर गाना बन चुका है. 'शेतकरी नवरा नको जी बाई... यानी किसान पति नहीं चाहिए!' लड़कीवालों को कुछ भी चलेगा, सिर्फ हल चलाने वाला दूल्हा नहीं.

एक वक्त था, जब खेत मौसमी फसलों से लहलहाता था. अब मिट्टी सूखकर फटने लगी है. देखकर कलेजा फटता है. घर चलाना है इसलिए सड़क बनाने का काम कर रहे हैं. गांव के सारे किसान अब यही कर रहे हैं. एक वक्त था, जब हाथों में हल होता था. अब फावड़ा चलाते हैं. दोपहरों में पेड़ के नीचे नहीं, सड़क किनारे रोटी खाते हैं.

कई लड़के घरवालों को छोड़कर पुणे, मुंबई जा रहे हैं. सूखे ने दिलों को भी बंजर बनाना शुरू कर दिया है.

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