#HumanStory: सूखे ने मेरी बेटी की जान ले ली, सुसाइड नोट में लिखा- खेत मत बेचना

जिस पानी को उलीचते हुए हममें से ज्यादातर लोग जरा भी नहीं हिचकते, उसी की किल्लत मराठवाड़ा और देश के कई हिस्सों में सैकड़ों जानें ले रही है. 20 साल की मोहिनी भी इन्हीं में एक है. बेटी की मौत के बाद मां की दुनिया उसके सलोने चेहरे के इर्द-गिर्द ठहर गई है.

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: June 30, 2019, 11:50 AM IST
Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: June 30, 2019, 11:50 AM IST
चार महीने बाद पीएम नरेंद्र मोदी ने मन की बात की. इस दौरान उन्होंने जिस बात पर सबसे ज्यादा जोर दिया, वो है पानी बचाने की अपील. देश के ज्यादातर हिस्सों में पानी को लेकर जो हाहाकार मचा हुआ है, उसे फोकस करते हुए पीएम ने जल संरक्षण पर जन आंदोलन चलाने की अपील की. news18 ने देश में बढ़ते जलसंकट पर बाकायदा एक मुहिम छेड़ी हुई है, जिसमें सूखाग्रस्त इलाकों में रहने वालों का दर्द उन्हीं के लफ्जों में बताने की कोशिश की गई है. पढ़िए, इसी सीरीज़ की चुनिंदा कहानियां...

वो ऐसी सुंदर थी कि देखते आंखें न थकें. मक्खनी रंग. बड़ी-बड़ी स्लेटी आंखें. काम करते हुए दो लंबी चोटियां डोला करतीं. पाहुने देखने आते तो मेरा हार पहनकर एक बिंदी लगा लेती. और कोई सिंगार नहीं. उस रोज एक बढ़िया रिश्ता आया. उसे फूल-पान थमाया. अब शादी की तैयारियां होनी थीं. 5 सालों से सूखे पड़े खेत को बेचने की सोचने लगे. उसी शाम उसने फांसी लगा ली. साथ में एक चिट्ठी थी- पापा, खेत मत बेचना.

लगभग 18 मिनट की बातचीत में दरम्यानी उम्र की कांता पांडुरंग बिशे बार-बार रो पड़ती हैं. कांता वो मां हैं, मराठवाड़ा के सूखे ने जिनकी बेटी को छीन लिया. कहती हैं- बदहाली ने मेरी सोने-सी बेटी को मार डाला.



गहरी गुलाबी दीवारों वाला माचिसनुमा कमरा. एक कोने में लोहे के स्टैंड पर गैस चूल्हा और दो-चार बर्तन-भाड़े हैं. पास ही लोहे की टूटहल अलमारी में रसोई के बाकी साजो-सामान हैं. सटी हुई एक साइकिल, जिसे बेटा चलाता है. वहीं दीवार की छोटी-सी आड़ में कांता और पूरा परिवार नहाता-धोता है.

पुणे शहर में किराए का ये कमरा कांता को गांव के खुले मकान की याद दिलाता है. हालांकि अब वापसी मुमकिन नहीं.

कांता कहती हैं- वहां थे तो बार-बार लगता, वो आसपास है. इस कमरे में सोती थी. यहां पढ़ती थी. ये काम करती. रसोई में ऐसे मदद करती थी. गायों को चारा खिलाती. भाई-बहनों को डांटती-पुचकारती. हर कोने में उसकी याद थी. मैं बीमार रहने लगी. मोहिनी के पिता सुस्त पड़े रहते. भाई-बहन रोते.
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तब एक रोज हमने गांव छोड़ा और लातूर चले आए. कारखाने के पास एक कमरे का मकान भाड़े पर लिया. चाहे जितना साफ करो, उसकी दीवारें धूल से अटी रहतीं. धुएं से हर वक्त खांसी आती. कारखाने के साइरन के साथ-साथ हमारी जिंदगी चलने लगी. उसी से सोते, उसी की आवाज से दोपहर का खाना खाते और उसी भोंपू के साथ सोने की तैयारियां करते.

सब बदल गया था. पहले गाय-गोरू की आवाज से नींद खुलती. उनके लौटने पर गांव की औरतें के साथ मैं भी संझा-बत्ती करती.

अब यहां पति कारखाने में काम करने लगे और उसी के इर्द-गिर्द हमारी दुनिया चलने-रुकने लगी. फिर लातूर में भी हमारे जैसे कई लोग आ गए. काम मिलना कम होने लगा. तब हमने वो शहर भी छोड़ दिया और पुणे चले आए. जिसने एक बार घर छोड़ दिया हो, अब उसके लिए क्या लातूर और कोई और शहर!



कांता की आवाज में उसकी बेटी का अक्स है. उसे याद करती मां हर बार ये बताना भी नहीं भूलती कि वो कितनी सुंदर थी.

नाम मोहिनी था और थी भी वो वैसी ही. सबका मन मोह लेती. पढ़ाई में होशियार. कहती- आई, मैं सिस्टर (नर्स) बनूंगी. पांच सालों के सूखे के बाद हम एकदम पस्त हो गए थे. दो छोटे भाई-बहन थे. हमने आगे पढ़ने को मना किया और वो तुरंत मान गई. घर पर रहने लगी. छोटे भाई-बहन को पढ़ाती. मेरी मदद करती. बापू का चिलम तैयार कर देती. उम्र होने पर गांव की दूसरी लड़कियों से पहले उसके लिए रिश्ते आने लगे.

जो भी आता, चट से पसंद कर लेता. लेकिन फिर बात अटक जाती. सालभर पहले ही बड़ी बेटी को ब्याहा था. मोहिनी के पीछे दो और भाई-बहन हैं. पांच सालों से खेत में कोई अनाज नहीं उपजा. भंडारघर सूखा पड़ा है. ऐसे में शादी की तैयारियां कैसे हों!

खाली हाथ बेटी बिदा नहीं हो सकती. हालात देखकर लड़केवाले चुप कर जाते.



उस बार बहुत अच्छे घर से रिश्ता आया था. हम रुक नहीं सकते थे. मैं और मोहिनी के पिता बात करने लगे. मैं रसोई में थी. वे भी वहीं कोने में बैठे हुए. मोहिनी दूसरे कमरे में टीवी देख रही थी, आवाज तेज थी. हम इत्मीनान से मश्वरा करने लगे. आखिर में तय हुआ कि खेत बेच दें. इससे मोहिनी की शादी भी हो जाएगी और गांठ में थोड़े पैसे हो जाएंगे.

ये वही खेत है, जिसने हमें पाला-पोसा था. जब अच्छी बारिश होती, वहां गन्ना-धान-फली सब खूब उपजा करते थे. 

मौसम आने पर पूरा घर खेत में काम करता. फसल कटती तो जैसे त्योहार आ जाता. सबकी फरमाइशें पूरी होतीं. मोहिनी को जरीदार दुपट्टा मिलता और कांच की चूड़ियां. अब वो खेत बिकने वाला था. हमें भनक भी नहीं पड़ी कि दूसरे कमरे तक हमारी आवाज जा रही है.



साल 2016 की 20 जनवरी. उस साल गांव में खूब ठंड थी. शाम को अलाव तापने लोग घरों से बाहर बैठते. उसी शाम उसने फंदा लगा लिया. पास में दो पन्नों की चिट्ठी. बेटी थी लेकिन मां की तरह समझाइश दी थी. 'खेत मत बेचना. किसान का घर है. आगे बारिश होगी तब फसल लहलहाएगी. भाई-बहन को खूब पढ़ाना. मेरे जाने का अफसोस मत करना. सब मिलकर रहना'...आपकी मोहिनी.

मराठी में लिखे खत का हिंदी तर्जुमा करती मां फफककर रो दी. 'उसकी आखिरी निशानी है वो चिट्ठी. जहां जाती हूं, साथ रखती हूं. इतनी समझदार थी कि मरते हुए भी मां-बाप को परेशानी से बचाने के लिए पुर्जा लिखा और नीचे दस्तखत भी किए.'

उसके जाने की खबर पर पूरा गांव इकट्ठा हो गया. सबके पास उसकी कोई न कोई याद थी. सब तसल्ली देते. मुझे संभालते. खाना खिलाते. धीरे-धीरे लोग जाने लगे, घर खाली होने लगा. फिर हम वहां नहीं रह सके.

खेत नहीं बेचेंगे, उसके लिए बेटी ने अपनी जान दे दी. लेकिन जिस घर की छत ने उसकी जान ली, उसके नीचे हम नहीं रह सकते.

अब यहां शहर में एक कमरे में रहते हैं. उसी में रसोई, उसी में नहानघर और वहीं भगवान का आला. एक तारीख आते ही मकान मालिक खड़ा हो जाता है. पति रोजी पर काम करते हैं. मैं घरों में बर्तन-भाड़े करती हूं. यहां खाने-नहाने को भरपूर पानी है. पानी देखती हूं तो बंजर पड़ा खेत याद आता है. फिर बेटी का खिलखिलाता चेहरा तिरने लगता है. क्या पता, दम तोड़ते हुए उसने घुटे गले से मुझे पुकारा भी हो!

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First published: June 30, 2019, 11:47 AM IST
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