#HumanStory: हमने अपनी आंखों के सामने घरों को टूटते-बहते देखा

घर पानी में डूब चुका है. गांव भी. हमने अपनी आंखों के सामने अपने घरों, जानवरों और मुर्दा शरीरों को बहते देखा. अब हर जगह पानी है, सिवाय हमारी आंखों के.

News18Hindi
Updated: August 8, 2019, 12:45 PM IST
#HumanStory: हमने अपनी आंखों के सामने घरों को टूटते-बहते देखा
बाढ़ से जान बचाकर निकले लोग रिलीफ कैंपों में भी आदर्श हालातों में नहीं रह रहे (प्रतीकात्मक फोटो)
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Updated: August 8, 2019, 12:45 PM IST
यहां 5 दिनों से लगातार बारिश हो रही है. हर चीज पानी में समा चुकी है. हम खाना नहीं पका सकते. पकाने को न तो राशन है, न रसोई और न ही हिम्मत. बाढ़ में घर खो चुकी शाहिदा कहती हैं- अपनी भूख तो फिर भी मार लूंगी लेकिन परिवार को भूखा कैसे देख सकूंगी!

बाढ़ में घर खो चुके हजारों लोगों की तरह ही शाहिदा भी रिलीफ कैंप में रह रही हैं. साड़ियों, पॉलिथिन और चादरों को घेर-घारकर तंबुओं की शक्ल दी गई है.

जान बचाकर भागते हुए चादर को भी कीमती सामान मानकर साथ रखने की दूरंदेशी दिखाई है तो नीचे चादर बिछा लें या फिर खुरदुरी जमीन पर ही पड़े रहें.

बाढ़ प्रभावित इलाकों के आसपास बसे इन कैंपों में लाखों औरत-मर्द-बच्चे-बुजुर्ग हैं. पास ही लाशें जल रही हैं. ये वो लाशें हैं जो पानी में बहते हुए किनारे लग गईं. पड़ी रहेंगी तो सड़ती रहेंगी. पहचाने जाने का इंतजार नहीं किया जा सकता इसलिए लाशें जलाई जा रही हैं. शाहिदा याद करती हैं- कैंप के आसपास लगातार बदबू आती रहती है. वहीं लाशें जल रही हैं. वहीं लोग रहते हैं. लेकिन कोई मना भी कैसे करे.

साड़ियों, पॉलिथिन और चादरों को घेर-घारकर तंबुओं की शक्ल दी गई है (प्रतीकात्मक फोटो)


सबका कोई न कोई खोया हुआ है. क्या पता, जो लाशें जल रही हैं, उन्हीं में से कोई किसी का घरवाला हो, कोई किसी का बच्चा.

लगभग एक लाख लोगों के लिए डेढ़ सौ कैंप लगे हैं. शाहिदा बताती हैं- ढोर-डंगर की तरह सब ठुंसकर भरे हुए हैं. खुले में शौच जाते हैं. घर था तो अपने पोते-पोतियों को साफ-सफाई के लिए डांटती. खुद अपने हाथों से उनकी कंघी-चोटी करती. अब वे कितने दिनों से बाल उलझाए, कहां फिर रहे हैं- इसका कोई होश नहीं. कपड़ों के जिस जोड़े में जान बचाकर भागे थे, वही पहने हुए हैं.
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पिछली रात डेढ़ बजे के लगभग खाना मिला था. दाल-भात. उससे पहले परसों सुबह खाया था. कैंप में कई औरतें पेट से हैं. कई बच्चों को दूध पिलाती हैं. उन्हें भी खाना नहीं मिल रहा. खुद मेरे पोते-पोतियां भी खाने के लिए यहां-वहां भटकते रहते हैं.

ये वही बच्चे हैं जो सब्जी जरा भोथरी कट जाए तो नाक-मुंह चढ़ा लेते थे.

हमें कहीं लौटने की जल्दी नहीं (प्रतीकात्मक फोटो)


बाढ़ ने घर, गाय-गोरू के साथ छोटे-छोटे बच्चों के नखरे भी लील लिए- थकी आवाज में शाहिदा कहती हैं.

पिछली रात लेटी हुई थी तभी कुछ सरसराहट हुई. कैंप में कुछ कीमती तो है नहीं, जो चोरी होगी. आंखें खोलने में वक्त लगा. देखा तो सामने एक सांप बैठा हुआ है. मैं हिली- न डुली. टक लगाकर देखती रही. सांप भी फन काढ़े बैठा रहा और फिर एक ओर चला गया. बड़ी देर तक मुझे नींद नहीं आई. घर होता तो अब तक शोर मच गया होता. पास-पड़ोस के लोग भी लट्ठ संभालते सांप भगाने आ जाते. अब किसी को कोई सुध नहीं. सुबह उठकर मैंने ये वाकया बताया तो किसी को डर नहीं लगा. सबकुछ गंवा चुके लोग डरते जरा कम ही हैं.

कैंप में हमारी जरूरत जानने आए लोग शाम होते-होते हड़बड़ा जाते हैं. सबको घर लौटने की जल्दी होती है. हमारा घर बह गया. अब हमें कहीं लौटने की जल्दी नहीं. पानी उतरेगा तो लौटेंगे. फिलहाल तो हम सारे लोग खुले आसमान के नीचे कैदी बने हुए हैं.

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First published: August 8, 2019, 12:45 PM IST
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