#HumanStory: दादा ने दी थी 'इंदिरा' के कातिलों को फांसी, अब पोता है जल्लाद

संगीत के साजोसामान के लिए ख्यात मेरठ की सुबह किसी भी आम शहर से अलग नहीं. नाश्ते की दुकानों पर सब्जी-पूरियां तलने की महक. जल्दबाजी में एक-दूसरे को धकियाते लोग. मंदिरों को जाते झुर्रीदार चेहरे. धूप-लोबान और मौसमी फूलों की खुशबू. दफ्तर की हबड़तबड़ में घरों की रुटीन किचकिच. सड़कों पर भीड़ बढ़ रही है. इसी भीड़ का हिस्सा है ये फेरीवाला. कपड़ों का गट्ठर साइकिल के पीछे रख आवाज लगा रहा है. सुबह की आपाधापी से फुर्सत पा चुकी औरतें उसे बुलाती हैं. वो चाव से कपड़े दिखाता हुए एक-एक कपड़े की खासियत बखानता है. उसे घेरकर खड़ी भीड़ को शायद ही अंदाजा हो कि ये फेरीवाला देश के चंद जल्लादों में से है.

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: June 25, 2019, 4:34 PM IST
Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: June 25, 2019, 4:34 PM IST
किसी को फांसी देते हुए कैसा लगता है, जानें, मेरठ जेल के इस जल्लाद से...

फांसीघर में डॉक्टर और सुपरिंटेंडेंट तेजी से टहल रहे हैं. पास ही सादे कपड़ों में एक शख्स फांसी के तख्त के पास खड़ा है. सुईपटक सन्नाटे के बीच अपराधी को लाया जाता है. वो पुलिसवालों से घिरा है. तख्त के पास खड़ा शख्स मुस्तैद हो जाता है. उसे नकाब डालता है. पैर बांधता है और गले में रस्सी डाल देता है. सारी कवायद के बीच ध्यान रखता है कि किसी भी हाल में अपराधी से आंखें न मिलें.

सुपरिंटेंडेंट का इशारा मिलते ही झटके से लीवर खींच दिया जाता है. थोड़ी-बहुत छटपटाहट के बाद पैर हवा में झूलने लगते हैं. इधर फंदे से शरीर उतारा जा रहा है, उधर वो शख्स बाहर निकल रहा है. मिलिए, पवन कुमार जल्लाद से. फांसी देना इनका 'खानदानी पेशा' है.

चौथी पीढ़ी का जल्लाद हूं. परदादा का नहीं पता लेकिन दादा और पिताजी का खूब याद है. तब घर पर अक्सर फांसी का जिक्र हुआ करता. वो इनका 'फुलटाइम' पेशा था. मैं पास ही खेल रहा होता लेकिन ध्यान उनकी बातों पर रहता. कैसे-कैसे मामले! एक से बढ़कर एक खूंखार अपराधी फांसी के तख्त पर बकरी जैसे हो जाते. भगवान का नाम लेने लगते. कुछ इतने घाघ कि इन हालातों में भी अपने निर्दोष होने की फरियाद करते.

जिन अपराधियों को मासूमों का कत्ल या बलात्कार करते कलेजा नहीं कांपा, वो इंसानियत की दुहाई देते.

पवन कुमार जल्लाद के लिए उनका पेशा पुण्य का काम है (तस्वीर- प्रतीकात्मक)


बड़ा हुआ तो दादाजी अपने साथ जेल ले जाने लगे. मैं देखता कि पुलिस अमला दादाजी की कितनी इज्जत करता है. धीरे-धीरे भीतर जल्लाद बनने का सपना पलने लगा. साल 1987 की बात है. दादा के पास इंदिराजी के कातिलों को फांसी चढ़ाने का जिम्मा आया. मैंने उनसे कहा कि मैं भी साथ चलूंगा. उन्होंने मना कर दिया. मैं पीछे लगा रहा. तब वो मुझे साथ लेकर गए. ऐन वक्त पर कातिलों की फांसी आगे बढ़ गई. ऐसा लगातार तीन बार हुआ. भड़के हुए दादाजी ने चौथी दफे मुझे ले जाने से इन्कार कर दिया. उन्हें तभी फांसी हो गई.
पहली फांसी जयपुर में दी थी. वैसे तो दादा के साथ हर फांसी पर जाया करता लेकिन अपने बूते करने का ये पहला मौका था. मैंने 'डमी' तैयार की. कैदी के वजन से लगभग डेढ़ गुना भारी डमी में रेत भरी होती है और गर्दन की जगह सीमेंट. उसपर फंदा लगाया जाता है. बार-बार प्रैक्टिस होती है ताकि हाथ न कांपे. दिल न घबराए.

आखिरी वक्त तक कलेजा इतना पक्का हो जाता है कि असल इंसान और डमी में कोई फर्क नहीं रह जाता. फांसीघर पहुंचा और इशारा पाते ही फटाक से लीवर खींच दिया. बंधे हुए पैर लगभग 15 मिनट तक छटपटाते रहे और फिर ठंडे पड़ गए. संतरियों ने शरीर उतारा. जेल के डॉक्टर ने चेकअप कर उसे मुर्दा घोषित कर दिया. तब जाकर मैं लौट सका.

दिल में कोई मलाल नहीं था क्योंकि मरनेवाला एक बलात्कारी था. जुर्म पता चल जाए तो जान लेना आसान हो जाता है.

फांसी के लिए रस्सी बिहार की बक्सर जेल से तैयार होती है (तस्वीर- प्रतीकात्मक)


फांसी के फंदे में आम रस्सी से क्या अलग होता है? अजी, सबकुछ अलग होता है- तपाक से पवन कहते हैं. वो आपके घर जैसा 'नॉर्मल' रस्सा नहीं होता.

बहुत मजबूत होता है. 110 किलो वजनी आदमी आराम से झूल जाए. बिहार की बक्सर जेल के कैदी ये रस्सा तैयार करते हैं. बनाने के बाद इसपर मक्खन लगाया जाता है. पका हुआ केला रगड़ते हैं ताकि मरनेवाले के गले पर गहरे निशान न पड़ें. मारते वक्त भी नरमी से पेश आना होता है क्योंकि कई बार फांसीघर के बाहर कैदी के घरवाले इंतजार कर रहे होते हैं.

फांसी चढ़ाने के बाद अगर फंदा टूट जाए तो अपराधी को दोबारा फांसी नहीं दी जा सकती. इसलिए रस्सी की तैयारी एकदम पक्की रखनी होती है. और भी कई बातें हैं, जिनकी एहतियात इस पेशे में जरूरी है.

कैदी के पैर बांधते हुए ध्यान रखते हैं कि किसी भी हाल में न उससे बात हो और न आंखें मिलें. ऐसा होने पर फांसी लगाते हुए दिल कमजोर पड़ सकता है या कोई चूक हो सकती है.

58 साल का हूं. परदादा-दादा-पिताजी को यही काम करते देखा-सुना. लोग कहते हैं- फलां काम हमारा खानदानी पेशा है. हम खानदानी मिस्त्री हैं...पंडित हैं...नेता हैं. हम कहते हैं 'हम खानदानी जल्लाद हैं'. कोई मामला आए तो जेल प्रशासन पहले ही बता देता है. तैयारियां शुरू हो जाती हैं.

जैसे हर पेशे में रियाज होता है, जल्लाद भी प्रैक्टिस करते हैं. उम्र हो रही है. हाथ, नजर या जिगर कुछ भी कांपा तो खूंखार अपराधी की मौत टल जाएगी.

फांसी देने से पहले जल्लाद एक डमी पर इसकी प्रैक्टिस करते हैं (तस्वीर- प्रतीकात्मक)


नियत दिन मैं नहा-धोकर फांसीघर पहुंचता हूं. अपराधी लाया जाता है. उसके पैर बांधता हूं. ये सारी कवायद सुबह 4 बजे से शुरू रहती है. जैसे ही घड़ी के कांटे 6 पर पहुंचते हैं, सुपरिंटेंडेट सिर्फ ऊंगलियों से इशारा करता है, कोई आवाज नहीं. मैं फटाक से लीवर खींच देता हूं. घर लौटकर दोबारा नहाता हूं और पूजा-पाठ कर कपड़े बेचने निकल जाता हूं.

जल्लाद का जिक्र सबको डराता है. बहुतों के लिए ये गाली है. मेरे नाम के साथ 'जल्लाद' लगा है. यही मेरी पहचान है. मैं बुरा नहीं मानता. जल्लाद होना सबके बस की बात नहीं. हर कोई कर सकता तो आज देश में सैकड़ों जल्लाद होते.

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