#HumanStory: सेक्सोलॉजिस्ट का क़बूलनामा: पहचान छिपाने को मरीज हेलमेट पहन आते और मर्ज़ बताते हैं

मेरे पास 15 से लेकर 80 बरस के भी लोग आते हैं. एक दफे एक मरीज की उम्र दर्ज करते हुए रिशेप्सनिस्ट की आवाज ऊंची हो गई- 87 साल! मैंने उसे ट्रेनिंग दी. अब चाहे कुछ हो, वो अपनी हैरानगी चेहरे या आवाज में नहीं आने देता. पढ़ें, भोपाल में दो दशकों से भी ज्यादा वक्त से सेक्सोलॉजिस्ट बतौर काम कर रहे डॉक्टर एजाज खान को.

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: August 13, 2019, 10:20 AM IST
#HumanStory: सेक्सोलॉजिस्ट का क़बूलनामा: पहचान छिपाने को मरीज हेलमेट पहन आते और मर्ज़ बताते हैं
हमारे पेशे में जिस बात की सबसे ज्यादा कद्र है, वो है प्राइवेसी और सीक्रेसी (प्रतीकात्मक फोटो)
Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: August 13, 2019, 10:20 AM IST
किसी भी नए-पुराने शहर के बस-स्टॉप या रेल्वे स्टेशन से गुजरें तो रहने-खाने के ठियों और पेशाबघरों के अलावा जो एक चीज कॉमन दिखेगी- वो है शफाखानों के इश्तिहार. यौन रोग के इलाज का दावा करते इन इश्तिहारों पर अक्सर किसी रुआबदार शख्स की तस्वीर होती है जो मर्दाना ताकत लौटाने या बढ़ाने का वादा करता है.

शहर से वाकफियत हो तो देखेंगे कि ये क्लिनिक पुराने शहर की किसी निहायत तंग बस्ती का सबसे तंग कमरा होता है, जिसपर पुराने किस्म का पानी खाया फर्नीचर होगा और जहां मरीज एक-दूसरे से मुंह छिपा रहे होंगे.

हमारे पेशे में जिस बात की सबसे ज्यादा कद्र है, वो है प्राइवेसी और सीक्रेसी. हाल ही की ही बात लें. एक शख्स आया. हेलमेट लगाए हुए था. जांच से पहले मैंने हेलमेट उतारने को कहा. उसने मना कर दिया. आवाज में इतनी उदासी और इस कदर सख्ती थी कि मैंने दोबारा नहीं कहा. उसने बताया- डॉक्टर, मेरी शादी टूटने को है. मैंने जांच की. वो फिजिकली एकदम फिट था. लेकिन मन वहमों से भरा हुआ. सालों से मार्केटिंग का काम कर रहा ये मरीज काफी कम उम्र से सेक्सुअली एक्टिव था.

वो उस बीमारी के इलाज के लिए भटक रहा था, जो असल में उसे थी ही नहीं (प्रतीकात्मक फोटो)


शादी तय हुई तो करीबी दोस्त मजाक करने लगे. नतीजा- उसपर इतना दबाव बन गया कि वो गलत-सही तरीके अपनाने लगा. यहां तक कि उनसे भी मिला जो दूसरे राज्यों से आकर तंबू डालकर रहते और बिना किसी जानकारी के तेल और जड़ी-बूटियां बेचते हैं. वो उस बीमारी के इलाज के लिए भटक रहा था, जो असल में उसे थी ही नहीं. बातचीत की. धीरे-धीरे वो खुला. हेलमेट भी हटा. अब उसे काउंसलिंग की कोई जरूरत नहीं. फिर मैंने खुद ही आने से मना कर दिया.

कई बुजुर्गवार आते हैं. वे किसी मर्ज का इलाज लेने नहीं, बस खुद को कमजोर बूढ़ा मानने से बचने के लिए आते हैं.

उनकी तसल्ली के लिए फिजिकल जांच करता हूं. अक्सर विटामिन की दवाएं देता हूं लेकिन उनका असल इलाज है तसल्ली से उन्हें सुना जाना. एक बड़ा ही दिलचस्प मरीज मेरे पास पहुंचा. छिपते-छिपाते आया था. उसने बताया कि मेनोपॉज के बाद उनकी बेगम ज्यादा आजादखयाल हो गई हैं. इतनी कि वे उनसे ताल नहीं मिला पा रहे. निहायत संजीदगी से वो ये बात कह रहे थे. मैंने सुना, दवाएं दीं. और सलाह भी कि थोड़े वक्त के लिए वे दोनों कहीं घूम आएं.
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उसके बाद वे नहीं आए. मेरा ख्याल है कि मामला काबू में होगा- हंसते हुए खान कहते हैं.

अक्सर ये क्लिनिक तंग गली में बिना रोशनदान के होते हैं (प्रतीकात्मक फोटो)


तंग गली में बिना रोशनदान वाले क्लिनिक में दिन के कई घंटे बिता रहे डॉक्टर खान के पास नए शहर में खुला मकान है. यौन रोग विशेषज्ञों के यूं छिपकर काम करने के बारे में उनकी सोच में कोई उलझन नहीं. अधिकतर सेक्स समस्याएं मनोवैज्ञानिक होती हैं. खुद को 'साबित' करने का दबाव काफी रहता है. मेरे पास आने वाले 90 प्रतिशत मरीज अपने साथी से भी खुलकर बात नहीं कर पाते हैं. ऐसे में वे चोरी-छिपे इलाज चाहते हैं तो यही सही. वक्त के साथ लोग खुलेंगे तो हमारे क्लिनिक भी पोशीदा नहीं रहेंगे.

सारा मसला दरअसल यही है कि हमारे यहां रिश्तों और खासकर जिस्मानी रिश्तों को लेकर सोच उबली हुई सेवइयों के माफिक है. उलझी हुई.

ज्यादातर लोगों को जानकारी नहीं के बराबर है. चुपके से आते हैं, इलाज पाते हैं और ऐसे ही एक रोज गायब हो जाते हैं. पहले हम रजिस्टर 'मेंटेन' किया करते. अब कंप्यूटर पर खाता दर्ज करते हैं. लेकिन मुझे नहीं पता कि कितने मरीज सही पहचान बताते होंगे!

गए वक्त एक फंक्शन में जाने का मौका मिला. सब अपने पेशे की मुश्किलात सुना रहे थे. जैसे ही मेरी बारी आई, सबके चेहरों पर दबी मुस्कान थी. ये कोट-टाई से लैस अंग्रेजीदां चेहरे थे. उस अधइंची मुस्कान के मायने हर सेक्सोलॉजिस्ट समझता है.

लोगों को लगता है कि हमारा पेशा अजीब है. हम दिनभर उसी तरह की बातों और उन्हीं ख्यालों से भरे होते हैं.

अल्टरनेटिव इलाज करवाते हैं और मामला बिगड़ जाए तो हमारे पास आते हैं (प्रतीकात्मक फोटो)


किसी-किसी को मैं समझाता भी हूं कि ये भी डॉक्टरी, लेखकी, ठेकेदारी जैसा ही काम है. मरीज को सुनते हुए हम उसे इमैजिन नहीं करते, बल्कि फैक्ट की तरह सुनते हैं. और इलाज देते हैं.

इस पेशे में लगभग 20 साल हुए. आज तक मेरे पास एक भी जनाना मरीज नहीं आई. मर्द खूब आते हैं, भले ही लुकते-छिपते आएं. सेक्सुअल सेहत अब भी जिस्मानी सेहत से अलग मुद्दा है, खासकर औरतों के मामले में.

बहुतेरे सेक्सोलॉजिस्ट्स की तरह मेरे क्लिनिक पर भी डॉल्स हैं. मेल और फीमेल- दो तरह के पुतलीनुमा स्ट्रक्चर. नए जमाने के मरीजों को इन डॉल्स और गूगल की मार्फत समझाता हूं. किसी-किसी को कोई अच्छी किताब पढ़ने की सलाह भी देता हूं. तजुर्बे ने सिखाया कि बस, सुनभर लें तो मरीज आधा सेहतमंद हो जाता है.

(नोट: पहचान गुप्त रखने के अनुरोध पर डॉक्टर का नाम और चेहरा छिपाया गया है.)

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First published: August 13, 2019, 10:20 AM IST
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